एआइ क्रांति में बराबरी की दावेदारी
21वीं सदी को तकनीक का युग कहा जा रहा है और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) इसकी धुरी बन चुका है। शिक्षा, स्वास्थ्य, बिज़नेस से लेकर महिला सुरक्षा तक, हर क्षेत्र में एआइ संभावनाओं की नई खिड़कियां खोल रहा...

सवाल यह है कि महिलाएं कहां खड़ी हैं?
डॉ मधु बैनर्जी,
पत्रकार एवं लेखिका
21वीं सदी को टेक्नोलॉजी का युग कहा जा रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) आज एक तकनीकी शब्द नहीं रह गया, बल्कि यह हमारे जीवन का हिस्सा बन चुका है। बैंकिंग, शिक्षा, हेल्थ सेक्टर, मीडिया, बिज़नेस, कृषि, कानून हर क्षेत्र में एआइ ने गहरी पैठ बना ली है। यह कहना गलत नहीं होगा कि भविष्य का समाज और अर्थव्यवस्था एआइ के बिना अधूरा होगा, लेकिन इस टेक्नोलॉजिकल क्रांति में सबसे बड़ा प्रश्न ये है कि महिलाओं की भूमिका इसमें क्या होगी? क्या भारतीय महिलाएं इस बदलाव में अपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित कर पाएंगी या एक बार फिर ‘पुरुष प्रधान तकनीकी जगत’ में पिछड़ जाएंगी?
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तिहास गवाह है कि जब भी नई तकनीक आई, महिलाओं को उसके इस्तेमाल और लाभ तक पहुंचने में देर लगी। चाहे वह औद्योगिक क्रांति रही हो, कम्प्यूटर का दौर रहा हो या इंटरनेट का फैलाव, महिलाओं की भागीदारी सीमित रही। सामाजिक प्रतिबंध, शिक्षा में पिछड़ापन और आर्थिक असमानता के कारण महिलाएं अक्सर तकनीकी अवसरों से वंचित रह गईं। आज भी भारत जैसे देशों में ग्रामीण और शहरी इलाकों की महिलाएं डिजिटल साक्षरता में पुरुषों से पीछे हैं। यही वजह है कि एआइ के क्षेत्र में भी महिलाओं की संख्या अभी बेहद कम है।
अवसरों की नई दुनिया
फिर भी यह मानना होगा कि एआइ महिलाओं के लिए नई संभावनाओं के द्वार खोल रहा है।
– रोजगार के अवसर: डेटा साइंटिस्ट, मशीन लर्निंग इंजीनियर, रोबोटिक्स एक्सपर्ट, एआइ ट्रेनर, डिजिटल कंटेंट क्रिएटर जैसे क्षेत्र तेज़ी से उभर रहे हैं। यदि महिलाएं इसमें कदम बढ़ाएं तो करियर की नई दिशा पा सकती हैं।
घर और काम का संतुलन:
– एआइ आधारित टूल्स और ऐप्स से महिलाएं अपने घरेलू काम आसान बना सकती हैं। ऑनलाइन शिक्षा, वर्क फ्रॉम होम और हेल्थ ट्रैकिंग सिस्टम ने कामकाजी महिलाओं की चुनौतियां कम की हैं।
– महिला सुरक्षा: एआइ से लैस स्मार्ट कैमरे, एसओएस ऐप्स और लोकेशन ट्रैकिंग फीचर ने महिला सुरक्षा के नए विकल्प दिए हैं। कई शहरों में स्मार्ट पुलिसिंग का आधार एआइ ही है।
स्वास्थ्य और मातृत्व देखभाल:
– एआइ आधारित हेल्थ ऐप्स महिलाओं को पीरियड ट्रैकिंग, प्रेग्नेंसी मॉनिटरिंग और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी उपलब्ध करा रहे हैं।
हालांकि तस्वीर केवल उजली नहीं है, इसमें कई गहरे सवाल भी हैं-
1. जेंडर गैप इन टेक्नोलॉजी
– वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की रिपोर्ट बताती है कि एआइ सेक्टर में काम करने वाले कर्मचारियों में केवल 26 प्रतिशत महिलाएं हैं। यह असमानता बताती है कि टेक्नोलॉजी का नेतृत्व अब भी पुरुषों के हाथ में है।
2. एल्गोरिद्म में भेदभाव:
– एआइ उतना ही निष्पक्ष है, जितना डेटा उसे दिया गया है। अगर डेटा में लैंगिक पूर्वाग्रह है तो परिणाम भी महिलाओं के खिलाफ होंगे। कई शोधों ने दिखाया है कि एआइ आधारित भर्ती सिस्टम अक्सर महिलाओं को कमतर आंकता है।
3. नौकरी छिनने का डर:
– एआइ ऑटोमेशन से सबसे ज़्यादा असर उन महिलाओं पर पड़ेगा जो छोटे-छोटे जॉब्स या सर्विस सेक्टर में काम करती हैं। रिसेप्शन, कस्टमर सर्विस या डेटा एंट्री जैसे क्षेत्र धीरे-धीरे मशीनों के हवाले होते जा रहे हैं।
4. साइबर सुरक्षा:
– एआइ आधारित डीपफेक टेक्नोलॉजी महिलाओं के लिए गंभीर खतरा बन चुकी है। उनकी फेक वीडियो और तस्वीरें बनाकर ब्लैकमेलिंग की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं।
भारत में महिलाएं पहले ही ‘डिजिटल डिवाइड’ यानी डिजिटल असमानता का सामना कर रही हैं। ग्रामीण महिलाओं में स्मार्टफोन और इंटरनेट का इस्तेमाल अब भी सीमित है। ऐसे में एआइ सेक्टर में उनकी भागीदारी बेहद कम है। हालांकि हाल के वर्षों में सरकार और निजी क्षेत्र ने कई कार्यक्रम शुरू किए हैं।
– ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के जरिए लड़कियों को डिजिटल शिक्षा से जोड़ने की कोशिश।
– स्टार्टअप इंडिया और महिला उद्यमिता योजनाएं महिलाओं को टेक्नोलॉजी आधारित बिज़नेस में प्रोत्साहित कर रही हैं।
– IITs और इंजीनियरिंग कॉलेजों में लड़कियों की संख्या बढ़ रही है, जो एआइ रिसर्च की दिशा में सकारात्मक संकेत है।
भविष्य की संभावनाएं: सही दिशा में कदम उठाए जाएं तो महिलाएं एआइ क्रांति की अगुआ बन सकती हैं। स्कूल और कॉलेज स्तर पर लड़कियों को कोडिंग, डेटा साइंस और मशीन लर्निंग की शिक्षा दी जानी चाहिए।
महिला-उन्मुख नीतियां: सरकार को ऐसी नीतियां बनानी होंगी, जिनसे महिलाएं एआइ स्टार्टअप्स और रिसर्च में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले सकें।
सुरक्षा और कानूनी ढांचा: डीपफेक और ऑनलाइन उत्पीड़न से महिलाओं की सुरक्षा के लिए सख्त कानून और तकनीकी समाधान जरूरी हैं।
मेंटॉरशिप और रोल मॉडल: टेक्नोलॉजी की दुनिया में सफल महिला वैज्ञानिकों और उद्यमियों की कहानियां सामने लानी होंगी, ताकि युवा लड़कियां प्रेरित हों।
एआइ केवल तकनीक नहीं, बल्कि भविष्य की सामाजिक-आर्थिक धुरी है। अगर महिलाएं इसमें बराबरी से शामिल नहीं होतीं, तो यह क्रांति अधूरी रह जाएगी। जरूरत है कि शिक्षा, नीतियों और सामाजिक सोच के स्तर पर बदलाव लाया जाए। महिलाएं केवल एआइ का उपभोक्ता न बनें, बल्कि इसके निर्माता, शोधकर्ता और नीति-निर्माता भी बनें, क्योंकि असली प्रगति वही होगी, जिसमें टेक्नोलॉजी और जेंडर इक्वेलिटी साथ-साथ चलें।






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