नई दुल्हन, नया भारत
शादी के बाद घर की चारदीवारी तक सिमट जाने वाली महिलाओं की कहानी अब पुरानी हो गई है। आज की नई दुल्हनें न केवल घर और परिवार को बखूबी संभाल रही हैं, बल्कि अपने करियर और सपनों को भी नई पहचान दे रही हैं।...

परम्परा और आधुनिकता का संगम, शादी के बाद भी सपनों की उड़ान
डॉ. मधु बैनर्जी
वरिष्ठ पत्रकार
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‘पहले मेरी ज़िंदगी घर की चारदीवारी तक सीमित थी, अब मैं ख़ुद अपनी राह चुनती हूं।’ यह जोधपुर की 28 वर्षीय साक्षी की कहानी है, जो आज हज़ारों महिलाओं की आवाज़ बन गई है। राजस्थान की परम्पराओं में शादी को जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि माना जाता रहा है, जहां दुल्हन की भूमिका घर और परिवार तक ही सीमित होती थी। लेकिन आज की नई दुल्हनें सिर्फ़ पत्नी या बहू की पहचान तक सीमित नहीं रहना चाहतीं। साक्षी ने शादी के दो साल बाद ही डिजिटल मार्केटिंग में नौकरी शुरू की और यह साबित कर दिया कि शादी किसी महिला के सपनों का अंत नहीं है। वह कहती हैं, ‘शादी मेरी पहचान नहीं, मेरा करियर मेरी पहचान है। अब मैं अपनी राय ख़ुद बना सकती हूं और परिवार में भी समान रूप से सम्मान पा रही हूं।’ आज की महिलाएं यह संदेश दे रही हैं कि शादी किसी महिला के सपनों और महत्वाकांक्षाओं का अंत नहीं है, बल्कि यह एक नई शुरुआत है।
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एक नई पहचान की तलाश
नए भारत की महिलाएं अब आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनने पर ज़ोर दे रही हैं। राजस्थान के शहरों में महिलाएं अब सिर्फ़ गृहणी नहीं, बल्कि बैंकर, टीचर, इंजीनियर और उद्यमी भी बन रही हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में भी महिलाएं सिलाई, हस्तशिल्प और ऑनलाइन व्यवसाय के माध्यम से आत्मनिर्भर बन रही हैं।
गुड्डू देवी, एक महिला उद्यमी, बताती हैं, ‘हमारी हस्तशिल्प की कारीगरी अब सिर्फ़ घर तक सीमित नहीं है। अब हम इसे ऑनलाइन बेचकर अपने परिवार को भी आर्थिक रूप से मज़बूत कर रही हैं। यह स्वतंत्रता हमारी सबसे बड़ी ताक़त है।’
सामाजिक दृष्टि से यह बदलाव पारम्परिक सोच के लिए एक चुनौती भी है। कई परिवार अभी भी ‘घर संभालो और नौकरी छोड़ दो’ जैसी मानसिकता रखते हैं। लेकिन शिक्षा और मीडिया के प्रभाव से यह सोच धीरे-धीरे बदल रही है।
सामाजिक बदलाव और सक्रिय भागीदारी
शादी और करियर के अलावा, महिलाएं अब सामाजिक मुद्दों पर भी सक्रिय हो रही हैं। शिक्षा और क़ानूनी जागरूकता के कारण वे घरेलू हिंसा, लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण जैसे मुद्दों पर खुलकर आवाज़ उठा रही हैं।
ममता देवी, जो तीन बच्चों की मां हैं, कहती हैं, ‘मैं अब सिर्फ़ मां या बहू नहीं हूं, बल्कि अपने गांव की पंचायत में निर्णय करने वाली भी हूं। यह पहचान मेरे लिए सबसे बड़ी जीत है।’
राजस्थान की महिलाएं न केवल परिवार के भीतर बल्कि समाज में भी अपनी सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म, सोशल मीडिया और महिला संगठनों की मदद से वे अपने अधिकारों और सपनों के लिए मुखर हो रही हैं।
सपनों की उड़ान में बाधाएं कम नहीं
बदलाव के बावजूद, चुनौतियां कम नहीं हैं। पारिवारिक दबाव, सामाजिक रूढ़िवाद और लैंगिक भेदभाव अभी भी महिलाओं की राह में रोड़े हैं। कई महिलाओं को करियर और पारम्परिक ज़िम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाना मुश्किल लगता है। साक्षी बताती हैं, ‘कभी-कभी लगता है कि समाज मुझे सिर्फ़ दुल्हन या पत्नी के रूप में ही देखता है। लेकिन मैं चाहती हूं कि मेरी पहचान मेरे करियर और मेरे फ़ैसलों से भी हो।’
परम्परा और आधुनिकता का संगम
नई दुल्हन से नए भारत की महिला तक का सफ़र केवल व्यक्तिगत बदलाव नहीं, बल्कि एक सामाजिक परिवर्तन की कहानी है। राजस्थान की महिलाएं परम्परा का सम्मान करते हुए भी अपनी स्वतंत्र पहचान बना रही हैं। वे शादी को जीवन की समाप्ति नहीं, बल्कि अपने सपनों और करियर की शुरुआत के रूप में देख रही हैं।
आज की महिला सिर्फ़ घर की देखभाल करने वाली नहीं, बल्कि करियर में सक्षम, समाज में मुखर और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन रही है। राजस्थान में शादी के बाद महिलाएं न केवल पारम्परिक घरेलू भूमिकाओं में संलग्न हैं, बल्कि वे रोजगार और व्यवसाय के क्षेत्र में भी सक्रिय रूप से भाग ले रही हैं।
एक बदलाव की तस्वीर
राजस्थान में शादी के बाद महिलाओं के रोजगार और व्यवसाय में भागीदारी के आंकड़े दर्शाते हैं कि महिलाएं परम्परागत घरेलू भूमिकाओं से बाहर निकलकर आर्थिक रूप से सक्रिय हो रही हैं।
स्वतंत्र रोजगार : राजस्थान में 2022-23 में महिलाओं द्वारा चलाए गए सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) इकाइयों की संख्या 29,500 से बढ़कर 75,900 हो गई, जो एक वर्ष में लगभग 157 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है।
नौकरी में भागीदारी : राजस्थान में महिलाओं की श्रम बल भागीदारी दर (एलएफपीआर) 37 प्रतिशत है, जो राष्ट्रीय औसत 23 प्रतिशत से अधिक है। हालांकि, इनमें से केवल 6.6 प्रतिशत महिलाएं नियमित वेतनभोगी नौकरियों में कार्यरत हैं।
स्व-रोजगार : महिलाओं की अधिकांश भागीदारी स्व-रोजगार के रूप में है, जिसमें वे खुद का व्यवसाय चला रही हैं।
यह यात्रा बताती है कि नई दुल्हन से नए भारत की महिला तक का सफर स्त्री सशक्तिकरण और सामाजिक बदलाव की एक मिसाल है।






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