लॉक दरवाज़े… और सिसकती कहानी
गांव में जब सुबह यह खबर पहुंची, तो परिवार की चीखों से गलियां गूंज उठीं। हर बेटा अपने परिवार में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है, उसके असमय चले जाने से उस परिवार पर क्या गुजरेगी, शब्दों से बयां करना...

एक लम्हे ने छीन लीं चार परिवारों की उम्रभर की खुशियां
रात गहरी थी, सड़कें सुनसान थीं। बालोतरा के पास सिणधरी कस्बे में दाबड़ गांव के चार दोस्त घूमने निकले थे। शायद गाड़ी में संगीत बज रहा होगा, गहरे दोस्त रहे होंगे तो हंसी-ठहाके गूंज रहे होंगे। हर सफ़र की तरह यह सफ़र भी सामान्य रहा होगा, लेकिन अगले ही पल सबकुछ बदल गया। उनका वाहन अचानक सामने से आ रहे ट्रैलर से टकरा गया। टक्कर इतनी भीषण थी कि वाहन की बैटरियां फट गईं और देखते ही देखते उसमें आग लग गई। दरवाज़े ऑटो लॉक थे, खिड़कियां जाम। ट्रैलर के डीजल से आग की लपटें और विकराल हो गईं और कुछ ही सेकंड में अंदर बैठे चारों दोस्त आग की लपटों में घिर गए। आसपास के लोग वहां पहुंचे होंगे और उन्हें बाहर निकालने की भरसक कोशिशें की होंगी, लेकिन सब नाकाम। कुछ ही मिनटों में चारों ज़िंदगियां आग की भेंट चढ़कर जुदा हो गईं।
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गांव में जब सुबह यह खबर पहुंची, तो परिवार की चीखों से गलियां गूंज उठीं। हर बेटा अपने परिवार में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है, उसके असमय चले जाने से उस परिवार पर क्या गुजरेगी, शब्दों से बयां करना नामुमकिन है। गांव के लोग अब तक यकीन नहीं कर पा रहे, जो कल तक हंसते-खेलते दिखाई देते थे, वो आज चार तस्वीरों में कैद हो गए हैं। गांव के लोगों को अभी विश्वास नहीं होता कि उन चारों को एक हादसे ने लील लिया है।
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कई बार तेज दौड़ती कारों को जब भी देखते हैं, तो मन में एक सिहरन दौड़ जाती है। मान लिया कि आप सावधानी से ड्राइव कर रहे हैं, लेकिन सामने वाला भी अच्छा ड्राइवर हो, इसकी क्या गारंटी है? ऐसे में ड्राइव के दौरान हर पल चौकन्ना रहना पड़ता है।
जयपुर में भी देखा गया वही मंज़र
इससे ठीक एक दिन पहले जयपुर में भी ऐसा ही हादसा हुआ। वहां एक तेज रफ्तार कार डिवाइडर से टकराकर जल उठी। बताया गया कि टक्कर के बाद एयरबैग खुलने से दरवाज़े लॉक हो गए और भीतर सवार तीन युवक बाहर नहीं निकल पाए। जब तक लोग पहुंचे, सबकुछ आग की लपटों में समा गया। दोनों हादसों में एक जैसी पीड़ा और एक जैसा कठोर सबक छिपा है कि रफ़्तार का जुनून कभी ज़िंदगी से बड़ा नहीं होना चाहिए। आज का युवा वर्ग रोमांच और एडवेंचर के नाम पर अक्सर सुरक्षा की बुनियादी बातों को नज़रअंदाज़ कर देता है। ये वही चूक है जो एक पल में कई ज़िंदगियां निगल जाती है।
परिवारों का दर्द और समाज के लिए संदेश
इन दो हादसों में काल का ग्रास बने युवाओं के परिवारजन के चेहरों पर सिवाय मातम के कुछ भी नजर नहीं आता। मां की आंखें अब भी दरवाज़े पर लगी हैं, जैसे वो उम्मीद कर रही हों कि बेटा अभी लौट आएगा। पिता की निगाहें उस पुरानी बाइक पर अटक जाती हैं, जो अब आंगन में यूं ही खड़ी है। छोटे बच्चे आने वाली दिवाली की वजह से कुछ नया होने की उम्मीद लगाए बैठे होंगे। हादसे केवल मरने वालों की नहीं, पीछे छूट गए लोगों की ज़िंदगियां भी जला देते हैं। मौज-मस्ती जीवन का हिस्सा है, लेकिन ज़िंदगी उससे कहीं बड़ी है। सड़कें रफ्तार की नहीं, ज़िम्मेदारी की मांग करती हैं। इन युवाओं को ये नहीं पता होता कि वे तो चले जाएंगे, लेकिन अपने परिवार को पीछे क्या दे जाएंगे, इसकी कल्पना करना भी बेमानी लगती है। इससे पूर्व भी ऐसे हादसे होते रहे हैं, लेकिन आज हर युवा को इन हादसों से सबक लेना होगा, ताकि परिवारों द्वारा नाजों से पोषित जिन्दगियां व्यर्थ न जाएं।
“सड़कें सिर्फ़ मंज़िल तक पहुंचने के लिए नहीं, बल्कि समझदारी और सलामती से घर लौटने के लिए होती हैं।”





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