सड़कों से स्टेडियम तक पहुंचीं धुनें
कभी कैसेट और रेडियो में सिमटा संगीत अब खुले मंचों पर सांस ले रहा है। गलियों से निकली रैप की आवाज़ और स्टेडियमों में उमड़ती भीड़ बता रही है कि लाइव म्यूजिक आज सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि नई पीढ़ी की...

नई पीढ़ी की धड़कन बना लाइव संगीत
मधुलिका सिंह,
वरिष्ठ पत्रकार
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कभी संगीत घरों की चारदीवारी में कैसेट और रेडियो तक सीमित था। फिर वह मोबाइल की स्क्रीन में सिमट गया। अब वह फिर बाहर निकल आया है। खुले मैदानों, स्टेडियमों, रेस्त्रां, कैफे और फेस्टिवल स्टेजों पर। भारत में लाइव म्यूजिक एक बार फिर केंद्र में है। फर्क बस इतना है कि अब यह शौक नहीं, अनुभवों से होकर गुजरने वाले युवाओं की संस्कृति और तेज़ी से बढ़ती इकोनॉमी बन चुका है।
वहीं, संगीत का हिस्सा बना रैप भारत में किसी म्यूजिक कंपनी की योजना नहीं था। यह गली-मोहल्लों की उपज है, जहां असमानता, संघर्ष और सपनों की बात सीधे, बिना सजावट कही जाती है। पिछले कुछ वर्षों में हिप-हॉप और रैप ने युवाओं को ऐसा मंच दिया, जहां वे अपनी पहचान खुद गढ़ सकें। छोटे शहरों में उभरते रैपर्स मानते हैं कि यह संगीत नहीं, बयान है। कम साधनों में रिकॉर्ड हुए ट्रैक्स लाखों तक पहुंच रहे हैं। ऐसे में म्यूजिक का जो ट्रेंड कभी विदेशों तक सीमित माना जाता था, वह अब भारत में पूरी मजबूती से स्थापित हो चुका है। लाइव कॉन्सर्ट अटेंड करना आज के युवाओं के लिए केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक लाइफस्टाइल स्टेटमेंट बन गया है।
कॉन्सर्ट कल्चर ने भारत में जमाए पैर
जनवरी 2025 में मुंबई में हुए ब्रिटिश म्यूजिकल बैंड कोल्डप्ले के शो का क्रेज ऐसा था कि टिकट बिक्री शुरू होते ही वेबसाइट क्रैश हो गई और कुछ ही दिनों में सारे टिकट सोल्ड आउट हो गए। इससे पहले अक्टूबर 2024 में पंजाबी गायक-अभिनेता दिलजीत दोसांझ के दिल-इल्युमिनाटी टूर ने भी युवाओं के बीच जबरदस्त उत्साह पैदा किया था। इन दोनों आयोजनों ने साफ कर दिया कि जो लाइव कॉन्सर्ट कल्चर कभी विदेशों तक सीमित माना जाता था, वह अब भारत में पूरी तरह पैर जमा चुका है।
गली-मोहल्लों से माइक तक
रैप और हिप-हॉप भारत में किसी बड़े म्यूजिक लेबल की देन नहीं रहे। यह सीधे ज़मीन से उपजा है, गलियों, कॉलेज कैंपस और छोटे शहरों से। स्थानीय रैपर्स कहते हैं कि रैप ने उन्हें वह मंच दिया, जहां बिना लाग-लपेट अपनी बात रखी जा सके। डीजे आर्टिस्ट अजयसिंह गौड़ बताते हैं, “हमारे पास महंगे स्टूडियो नहीं थे, लेकिन कहने को बहुत कुछ था। रैप ने हमें सुने जाने का हक दिया।” बेरोज़गारी, पहचान, सिस्टम से नाराज़गी और सपनों की जद्दोजहद, ये सब अब बीट्स पर उतर रहे हैं। यही वजह है कि युवा रैप से खुद को जोड़ पा रहे हैं। यह संगीत नहीं, बयान है।
कॉन्सर्ट इकोनॉमी: जब अनुभव बना नई प्राथमिकता
जहां पहले युवा मोबाइल, बाइक या ब्रांडेड कपड़ों पर खर्च को अहम मानते थे, वहीं अब फोकस बदल रहा है। लाइव कॉन्सर्ट्स और म्यूजिक फेस्टिवल्स इस बदलाव का सबसे बड़ा उदाहरण हैं। युवाओं का मानना है कि “चीज़ें बदल जाती हैं, लेकिन लाइव कॉन्सर्ट की यादें हमेशा साथ रहती हैं।” कॉन्सर्ट पर खर्च सिर्फ टिकट तक सीमित नहीं रहता। यात्रा, होटल, खाना और शहर घूमना, सब मिलकर इसे एक पूरा अनुभव बना देते हैं। यही वजह है कि महंगे टिकट्स के बावजूद युवा पीछे नहीं हट रहे।
लोकल बैंड्स: अपने शहर की अपनी धुन
ग्लोबल स्टार्स के बीच लोकल म्यूजिक सीन भी चुपचाप मज़बूत हो रहा है। उदयपुर जैसे शहरों में लोकल बैंड्स और सोलो सिंगर्स कैफे, होटल और कॉलेज फेस्टिवल्स में नियमित परफॉर्म कर रहे हैं। इसमें राजस्थानी फोक को मॉडर्न फ्यूजन से जोड़ रहे हैं, इंडी म्यूजिक को नई पहचान दे रहे हैं, सोशल मीडिया के जरिए अपनी ऑडियंस खुद बना रहे हैं। इस बारे में एक बैंड के कवीश कहते हैं कि आजकल सोशल मीडिया वो काम कर देता है जो कोई नहीं कर सकता है। यह प्रचार का सबसे सस्ता और अच्छा माध्यम बन चुका है। हमारे म्यूजिक बैंड के बारे में सोशल मीडिया पर लगातार पोस्ट करते हैं। साथ ही कब, कहां परफॉर्म करेंगे ये भी बताते हैं ताकि लोग जुड़े रहें।
पिछले दो साल में भारत में हुए बड़े म्यूजिकल कॉन्सर्ट
भारत में 2024–25 के दौरान कई बड़े कॉन्सर्ट्स और फेस्टिवल्स हुए, जिन्होंने इस ट्रेंड को और मजबूत किया–
प्रमुख कॉन्सर्ट्स-
दिलजीत दोसांझ – दिल इल्युमिनाटी टूर
अक्टूबर 2024, भारत के कई शहर
टिकट: ₹1,499 से शुरू
दुआ लीपा टूर–
नवंबर 2024, मुंबई
टिकट: ₹2,999 से शुरू
ब्रायन एडम्स – इंडिया टूर
दिसंबर 2024, मुंबई, बेंगलूरू, शिलांग, कोलकाता
के-टाउन फेस्टिवल
दिसंबर 2024, मुंबई
टिकट: ₹5,000 से शुरू
लोलापलूजा इंडिया
मार्च 2025
टिकट: ₹5,999 से शुरू
इन आयोजनों ने यह साबित कर दिया कि भारतीय ऑडियंस अब इंटरनेशनल और घरेलू, दोनों तरह के लाइव शोज़ को हाथों-हाथ ले रही है।
इसलिए बढ़ रहा है कॉन्सर्ट कल्चर —
– डिजिटल दौर में रियल एक्सपीरियंस की तलाश
– सोशल मीडिया पर यादों को साझा करने की चाह
– ग्लोबल म्यूजिक से बढ़ता जुड़ाव
– युवाओं की बढ़ती खर्च करने की क्षमता
– आज का युवा मोबाइल या कपड़ों से ज्यादा, यादगार पलों पर पैसा खर्च करना चाहता है।






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