रियासतकाल में मारवाड़ी भाषा का दरबारी महत्व
मारवाड़ी भाषा, जो बारहमासा की तरह हर ऋतु और परिस्थिति में उपयुक्त थी, रियासतकालीन न्याय-व्यवस्था की आत्मा मानी जाती...

मारवाड़ में मारवाड़ी भाषा का दरबारी महत्व अत्यंत गहन था। यह केवल सत्ता की नहीं, बल्कि संवेदनाओं और संस्कृति की भी भाषा थी। न्यायालयों से लेकर फरमानों तक, हर दस्तावेज़ इसी भाषा में तैयार होता था— जनता के मन की सीधी अभिव्यक्ति। इतिहास साक्षी है कि 4 जुलाई 1914 और 30 दिसंबर 1917 को महाराजा ने विशेष राजाज्ञाएं जारी कीं, जिनमें प्रशासनिक व न्यायिक कार्यों में मारवाड़ी भाषा के प्रयोग का निर्देश था—और वह भी शुद्ध नागरी लिपि में।
ये भी पढ़ें-
जोधपुरी ब्रिचीज़: घोड़े की पीठ से फैशन की दुनिया तक – राजस्थान टुडे
ये आदेश केवल भाषायी निर्णय नहीं थे, बल्कि सांस्कृतिक स्वाभिमान की घोषणा थे।यह भाषा इतनी सहज, प्रभावी और जीवंत थी कि युद्धकालीन प्रचार से लेकर प्रशासनिक संवाद तक, जब भी जनचेतना को जगाने की आवश्यकता पड़ी, मारवाड़ी को ही चुना गया। इसकी स्पष्टता और आत्मीयता वह पुल थी जो शासक और प्रजा के बीच संवाद की राह बनाती थी।मारवाड़ी भाषा, जो बारहमासा की तरह हर ऋतु और परिस्थिति में उपयुक्त थी, रियासतकालीन न्याय-व्यवस्था की आत्मा मानी जाती थी। इसकी मुड़िया नागरी लिपि केवल अक्षरों की शैली नहीं थी, वह मरुभूमि की आत्मा की लेखनी थी—जिसमें रजवाड़ों का गौरव, जनता की वेदना और न्याय का वचन एक साथ प्रवाहित होते थे।






No Comment! Be the first one.