जर्सी विदेशी, जड़ें ‘देसी’
सॉफ्टवेयर इंजीनियर से स्टंप्स उखाड़ने वाले सौरभ नेत्रवलकर हों या न्यूजीलैंड की टीम में ‘सचिन-राहुल’की विरासत समेटे रचिन रवींद्र, आज विश्व क्रिकेट के मानचित्र पर एक ‘अदृश्य भारत’खेल रहा है। आखिर क्या...

विश्व क्रिकेट के मानचित्र पर उभरता ‘अदृश्य भारत’
प्रतिभा जब सीमाओं की बेड़ियां तोड़कर ग्लोबल हो जाती है, तब पहचान का व्याकरण बदल जाता है। आज का क्रिकेट सिर्फ दो देशों के बीच की जंग नहीं, बल्कि उस ‘ग्लोबल इंडियन टैलेंट’का उत्सव है जो दुनिया की हर दूसरी टीम की रीढ़ बन चुका है। जब हम आज आईसीसी के बड़े टूर्नामेंटों को देखते हैं, तो एक दृश्य बार-बार हमारी आंखों के सामने आता है। मैदान पर दो अलग देशों की टीमें भिड़ रही होती हैं, राष्ट्रगान अलग बजते हैं, जर्सियों के रंग जुदा होते हैं, लेकिन स्कोरबोर्ड पर दर्ज नाम किसी परिचित ‘देसी’ गली या मोहल्ले की याद दिला देते हैं। यह दृश्य क्षण भर के लिए दर्शक को ठिठकने पर मजबूर कर देता है। जर्सी भले ही नीली न हो, लेकिन खिलाड़ी के खेलने के अंदाज़, उसकी कलाई के जादू और दबाव में ‘कूल’ रहने की क्षमता में भारत की मिट्टी की महक साफ़ महसूस की जा सकती है। यह हमारे समय की सबसे बड़ी खेल-कहानी है, जो बताती है कि प्रतिभा का कोई भूगोल नहीं होता।
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जब सपनों ने भरी उड़ान
यह प्रवृत्ति कोई रातों-रात पैदा हुई घटना नहीं है, बल्कि पिछले कई दशकों के सामाजिक और आर्थिक बदलाव का परिणाम है। 20वीं सदी के अंत और 21वीं सदी की शुरुआत में लाखों भारतीय परिवार बेहतर भविष्य की तलाश में अमेरिका, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों में जा बसे। इन परिवारों ने नई धरती पर जड़ें तो जमा लीं, लेकिन वे अपने साथ क्रिकेट का वह ‘जुनून’ भी ले गए जो हर भारतीय के डीएनए में रचा-बसा है। वहां की दूसरी पीढ़ी ने जन्म विदेशी धरती पर लिया, लेकिन घर के आंगन में पिता के साथ प्लास्टिक की गेंद से क्रिकेट का ककहरा सीखा। जब इन बच्चों ने वहां के स्थानीय क्रिकेट क्लबों और अकादमियों में प्रवेश किया, तो उनके पास भारतीय क्रिकेट का पारंपरिक ज्ञान और विदेशी प्रणालियों का आधुनिक अनुशासन का एक घातक मिश्रण था। परिणाम हमारे सामने है कि आज सौरभ नेत्रवलकर (अमेरिका), रचिन रवींद्र (न्यूजीलैण्ड), और केशव महाराज (दक्षिण अफ्रीका) जैसे नाम विश्व क्रिकेट के नए पोस्टर बॉय बन चुके हैं।
सॉफ्टवेयर से स्टंप्स तक का सफर
अगर हम आज के दौर के सबसे प्रेरणादायक उदाहरण की बात करें, तो अमेरिका केसौरभ नेत्रवलकरका नाम सबसे ऊपर आता है। कभी मुंबई की गलियों में पृथ्वी शॉ के साथ क्रिकेट खेलने वाला यह लड़का उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका जाकर सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनता है, लेकिन उसका क्रिकेट प्रेम कम नहीं होता। जब वह टी-20 वर्ल्ड कप में रोहित शर्मा और विराट कोहली जैसे दिग्गजों को अपनी गेंदों से परेशान करता है, तो दुनिया को समझ आता है कि ‘इंडियन टैलेंट’कितना लचीला है। इसी तरह, न्यूजीलैंड केरचिन रवींद्रकी कहानी भी अद्भुत है। उनके नाम में ‘रा’(राहुल द्रविड़) और ‘चिन’(सचिन तेंदुलकर) का मेल है। जब वह बेंगलुरु के मैदान पर शतक लगाते हैं, तो पूरा स्टेडियम यह भूल जाता है कि वह एक विदेशी टीम के लिए खेल रहे हैं। दर्शकों को लगता है कि यह तो ‘अपना ही लड़का’है जो कीवी जर्सी पहनकर कमाल कर रहा है।
स्पिन का जादू और कलाई की कला
क्रिकेट में स्पिन गेंदबाजी को हमेशा से ‘भारतीय कला’माना गया है। आज दुनिया की कई टीमें इस विभाग में भारतीय मूल के खिलाड़ियों पर निर्भर हैं। दक्षिण अफ्रीका के केशव महाराजऔरतबरैज़ शम्सीने जिस तरह से प्रोटियाज टीम की गेंदबाजी को नई दिशा दी है, वह काबिले तारीफ है। नीदरलैंड्स की टीम मेंआर्यन दत्त औरविक्रमजीत सिंहजैसे नाम इस बात का प्रमाण हैं कि यूरोपीय देशों में भी क्रिकेट को जीवित रखने में भारतीय मूल के खिलाड़ियों का कितना बड़ा योगदान है। न्यूजीलैंड केईश सोढ़ीहों या ऑस्ट्रेलिया केतनवीर संघा, इन सभी ने विदेशी पिचों पर वह ‘देसी स्पिन’का तड़का लगाया है, जिसने पावर-हिटर बल्लेबाजों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया है। यह केवल एक खेल कौशल नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक विरासत का हस्तांतरण है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ रहा है।
जब दिल और दिमाग टकराते हैं
एक भारतीय प्रशंसक के लिए यह स्थिति बड़ी जटिल और भावनात्मक होती है। जब कोई भारतीय मूल का खिलाड़ी किसी अन्य देश के लिए भारत के खिलाफ खेलता है, तो दर्शक के मन में विरोधाभासी भाव पैदा होते हैं। एक तरफ अपनी राष्ट्रीय टीम की जीत की चाहत होती है, तो दूसरी तरफ उस खिलाड़ी की व्यक्तिगत सफलता पर एक ‘अदृश्य गर्व’भी होता है। यह स्थिति हमें सिखाती है कि आधुनिक पहचान अब एकरेखीय नहीं रही। व्यक्ति की जड़ें एक स्थान से जुड़ी हो सकती हैं, लेकिन उसका कर्तव्य और कर्मक्षेत्र किसी अन्य भूगोल से संबंधित हो सकता है। यह ‘ग्लोबल सिटीजनशिप’का सबसे बेहतरीन उदाहरण है। खेल इस जटिलता को सहजता से स्वीकार करता है और बताता है कि पहचान केवल पासपोर्ट के रंग से तय नहीं होती, बल्कि उन संस्कारों से भी तय होती है जो व्यक्ति अपने साथ लेकर चलता है।
भारतीय वर्चस्व या खेल का वैश्वीकरण?
अक्सर यह सवाल उठाया जाता है कि क्या यह किसी प्रकार के ‘वर्चस्व’का संकेत है? वास्तविकता में, इसे वर्चस्व के बजाय खेल का प्रभाव और विस्तार कहना अधिक उचित होगा। ये खिलाड़ी अपनी वर्तमान टीम के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं। वे उस जर्सी और देश के प्रति वफादार हैं जिसने उन्हें अवसर दिए। लेकिन उनके खेलने के तरीके में जो भारतीयता झलकती है, वह विश्व क्रिकेट को और अधिक समृद्ध और विविधतापूर्ण बनाती है। जब छोटी टीमें (जैसे अमेरिकाया नीदरलैंड्स) बड़ी टीमों को टक्कर देती हैं, तो उसके पीछे इन खिलाड़ियों का अनुभव और रणनीतिक सोच होती है। इसने क्रिकेट के मानचित्र को अधिक संतुलित और जीवंत बना दिया है। अब क्रिकेट केवल 5-6 पारंपरिक देशों का खेल नहीं रह गया, बल्कि यह वास्तव में एक वैश्विक खेल बनता जा रहा है।
भारतीय क्रिकेट प्रणाली के लिए संकेत और चुनौतियां
इस प्रतिभा प्रवास के पीछे भारत के लिए कुछ गहरे संदेश भी छिपे हैं। पहला यह कि हमारे देश में क्रिकेट का प्रशिक्षण इतना सुदृढ़ है कि यहां का औसत खिलाड़ी भी दुनिया की किसी भी टीम का स्टार बन सकता है। दूसरा, यह इस बात की ओर भी इशारा करता है कि यदि घरेलू ढांचा हर किसी को पर्याप्त अवसर नहीं दे पाता, तो प्रतिभा अपना रास्ता खुद तलाश लेती है। बीसीसीआई के लिए यह सोचने का विषय है कि कैसे एक ‘इनक्लूसिव स्ट्रक्चर’बनाया जाए ताकि प्रतिभा को पहचानने और उसे सही दिशा देने में कोई कमी न रहे। हालांकि, ये खिलाड़ी दुनिया भर में भारत के सांस्कृतिक राजदूत की तरह काम करते हैं, जो खेल के माध्यम से साझा समझ और आपसी सम्मान का सेतु बनाते हैं।
जर्सी का रंग, साझा अहसास
हमें ये मानना ही होगा कि आज का क्रिकेट एक साझा विरासत बन चुका है। जर्सियां अलग हो सकती हैं, झंडे अलग हो सकते हैं, लेकिन क्रिकेट की वह रूह जो कभी मुम्बई के शिवाजी पार्क या दिल्ली के कोटला में आकार लेती थी, अब पूरी दुनिया के स्टेडियमों में गूंज रही है। भारतीय मूल के खिलाड़ियों की यह बढ़ती उपस्थिति किसी एक देश की व्यक्तिगत जीत नहीं, बल्कि मानव प्रवास और सांस्कृतिक निरंतरता की एक शानदार महागाथा है। यह हमें सिखाती है कि प्रतिभा जहां भी जाती है, अपने साथ संस्कार, परंपरा और अनुशासन का एक पूरा संसार ले जाती है।
देसी तड़का – ग्लोबल टीमें
विश्व क्रिकेट के मैदानों पर जब ये नाम गूंजते हैं, तो भारतीय प्रशंसकों का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। ये वे खिलाड़ी हैं जिन्होंने विदेशी सरज़मीं पर अपनी धाक जमाई है-
- अमेरिका: सौरभ नेत्रवलकर, मोनांक पटेल, नितिश कुमार, हरमीत सिंह, मिलिंद कुमार।
- न्यूजीलैंड: रचिन रवींद्र, ईश सोढ़ी।
- दक्षिण अफ्रीका: केशव महाराज, तबरैज़ शम्सी।
- नीदरलैंड्स: विक्रमजीत सिंह, आर्यन दत्त, तेजा निदामनुरु।
- कनाडा: नवनीत धालीवाल, दिलप्रीत बाजवा, कंवरपाल ताथगुर।
- ओमान और यूएई: जतिंदर सिंह, कश्यप प्रजापति, अयान खान, वृत्य अरविंद।






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