क्या कांग्रेस फिर दोहराएगी पुरानी गलती?
केरल कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद को लेकर सतीशन, वेणुगोपाल और चेन्निथला के बीच संघर्ष ने राजस्थान के गहलोत-पायलट विवाद की याद ताजा कर दी है। सड़क से सत्ता तक लड़ाई लड़ने वाले नेता को फिर वरिष्ठता की...

केरल कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद को लेकर उठी सियासी धूल अब सिर्फ तिरुवनंतपुरम तक सीमित नहीं रही। इसकी गूंज हर तरफ़ सुनाई देने लगी है। कांग्रेस के भीतर चल रही यह लड़ाई केवल चेहरों की जंग नहीं, बल्कि उस पुरानी राजनीतिक संस्कृति की वापसी है जिसमें संघर्ष करने वाला नेता अक्सर आख़िरी मोड़ पर किनारे लगा दिया जाता है और सत्ता का ताज किसी “हाईकमान पसंद” चेहरे के सिर पर सजा दिया जाता है।आज केरल में जो तस्वीर बनी हुई है, वह राजस्थान की राजनीति के उस चर्चित अध्याय की याद दिला रही है जिसमें एक तरफ़ थे युवा, आक्रामक और ज़मीन पर संघर्ष करने वाले सचिन पायलट, और दूसरी तरफ़ संगठन व सत्ता के पुराने खिलाड़ी अशोक गहलोत। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार मंच केरल है, किरदार बदले हैं, लेकिन पटकथा लगभग वही लग रही है। मुख्यमंत्री पद की दौड़ में कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल, पूर्व नेता प्रतिपक्ष वीडी सतीशन और वरिष्ठ नेता रमेश चेन्निथला आमने-सामने दिखाई दे रहे हैं। लेकिन इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प और विस्फोटक पहलू यह है कि पर्दे के पीछे सचिन पायलट का नाम भी लगातार गूंज रहा है। वजह साफ है कि केरल में कांग्रेस की दस साल बाद वापसी की रणनीति तैयार करने वालों में पायलट की भूमिका को पार्टी के भीतर गंभीरता से स्वीकार किया जा रहा है। लेकिन सवाल वही है जो 2018 में राजस्थान में उठा था कि क्या मेहनत करने वाले नेता को सत्ता मिलेगी, या फिर “वरिष्ठता” और “संगठनात्मक अनुभव” के नाम पर एक बार फिर हाईकमान किसी और को आगे कर देगा?
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केरल में दोहराई जा रही राजस्थान की पटकथा
वीडी सतीशन पिछले पांच वर्षों से केरल में कांग्रेस का सबसे आक्रामक चेहरा बनकर उभरे। सड़क से विधानसभा तक उन्होंने एलडीएफ सरकार के खिलाफ लगातार संघर्ष किया। भ्रष्टाचार, सोना तस्करी, प्रशासनिक विफलताओं और वामपंथी राजनीति के कथित दोहरे चरित्र पर सतीशन ने जिस तरह हमला बोला, उसने कांग्रेस कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा भरी।सतीशन की छवि बिल्कुल वैसी ही बनाई गई जैसी कभी राजस्थान में सचिन पायलट की बनी थी । युवा, तेजतर्रार, जनता के बीच लोकप्रिय और भविष्य का चेहरा।लेकिन जैसे ही सत्ता का दरवाज़ा खुलता दिखाई दिया, अचानक “वरिष्ठता” का सवाल खड़ा हो गया। केसी वेणुगोपाल, जो दिल्ली दरबार में मजबूत पकड़ रखते हैं, अब मुख्यमंत्री पद की चर्चा में सबसे आगे बताए जा रहे हैं। उनके समर्थक अनुभव, संगठनात्मक पकड़ और गांधी परिवार से निकटता को उनकी ताकत बता रहे हैं।यह वही तर्क है जो राजस्थान में अशोक गहलोत के पक्ष में इस्तेमाल किया गया था। उस समय भी कहा गया कि सरकार चलाने के लिए “अनुभव” चाहिए, जबकि सचिन पायलट को “भविष्य” का नेता बताया गया। नतीजा क्या हुआ, यह देश ने देखा कि कांग्रेस की सबसे बड़ी अंदरूनी बगावतों में से एक राजस्थान में फूटी। अब वही बीज केरल में बोए जा रहे हैं
कांग्रेस की पुरानी बीमारी: संघर्ष किसी का, सत्ता किसी और की
कांग्रेस की सबसे बड़ी राजनीतिक विडंबना यही रही है कि पार्टी अक्सर उस नेता को पूरी सत्ता नहीं देती जिसने जमीन पर लड़ाई लड़ी हो। पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व हमेशा संतुलन, गुटबाजी और “सभी को साथ रखने” की राजनीति में ऐसा उलझता है कि अंततः सबसे ज्यादा नुकसान उसी नेता का होता है जिसने जनता के बीच पसीना बहाया हो।राजस्थान में सचिन पायलट ने पांच साल तक भाजपा की वसुंधरा राजे सरकार के खिलाफ संघर्ष किया। प्रदेश कांग्रेस को खड़ा किया। कार्यकर्ताओं में जान फूंकी। लेकिन चुनाव जीतने के बाद मुख्यमंत्री की कुर्सी अशोक गहलोत को मिली।उस फैसले ने केवल पायलट को आहत नहीं किया, बल्कि कांग्रेस के भीतर यह संदेश भी दिया कि मेहनत और जनाधार से ज्यादा महत्व “पुराने नेटवर्क” का है।आज केरल में वीडी सतीशन भी शायद उसी मोड़ पर खड़े दिखाई दे रहे हैं।अगर कांग्रेस ने फिर वही गलती दोहराई, तो केरल में भी अंदरूनी कलह की आग भड़क सकती है। फर्क सिर्फ इतना होगा कि इस बार यह आग दक्षिण भारत से उठेगी।
सचिन पायलट का दर्द क्यों फिर ताजा हो गया?
दिलचस्प बात यह है कि केरल की राजनीति में चल रही यह उठा-पटक राजस्थान कांग्रेस में भी बेचैनी पैदा कर रही है। सचिन पायलट के समर्थकों के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि जिस नेता ने केरल में कांग्रेस की वापसी के लिए रणनीतिक भूमिका निभाई, उसे अब क्या मिलेगा?पायलट लंबे समय से कांग्रेस के भीतर एक “संयमित विद्रोही” की भूमिका में हैं। उन्होंने खुलकर पार्टी नहीं छोड़ी, लेकिन लगातार यह संदेश दिया कि कांग्रेस में युवाओं और मेहनती नेताओं के साथ न्याय नहीं हो रहा।केरल का घटनाक्रम उनके पुराने घावों को फिर कुरेद रहा है। क्योंकि वहां वही परिस्थितियां बन रही हैं जिनका सामना वे खुद कर चुके हैं।यदि वीडी सतीशन को किनारे कर केसी वेणुगोपाल को आगे किया जाता है, तो कांग्रेस पर यह आरोप और मजबूत होगा कि पार्टी में जनसंघर्ष से ज्यादा महत्व दरबारी राजनीति का है।
केसी वेणुगोपाल बनाम सतीशन: सिर्फ पद की लड़ाई नहीं
यह लड़ाई केवल मुख्यमंत्री की कुर्सी तक सीमित नहीं है। यह कांग्रेस के भविष्य की दिशा तय करने वाली लड़ाई भी है।एक तरफ़ वे नेता हैं जो मानते हैं कि पार्टी को नए चेहरे, आक्रामक नेतृत्व और जनता से सीधे जुड़ने वाली राजनीति की जरूरत है। दूसरी तरफ़ वे नेता हैं जो संगठनात्मक अनुभव और हाईकमान की स्वीकृति को सबसे बड़ी योग्यता मानते हैं।सतीशन का उभार कांग्रेस के भीतर एक नई पीढ़ी की आकांक्षाओं का प्रतीक है। जबकि वेणुगोपाल उस पारंपरिक कांग्रेस संस्कृति का चेहरा माने जाते हैं जिसमें दिल्ली की राजनीति और केंद्रीय नेतृत्व की निकटता निर्णायक भूमिका निभाती है।यही कारण है कि यह संघर्ष व्यक्तिगत कम और वैचारिक ज्यादा दिखाई देता है।
राहुल गांधी के सामने सबसे बड़ी परीक्षा
केरल का यह संकट राहुल गांधी के लिए भी बड़ी चुनौती बन सकता है। क्योंकि कांग्रेस लगातार यह दावा करती रही है कि पार्टी अब नई सोच और नए नेतृत्व को आगे बढ़ा रही है।लेकिन यदि अंत में वही पुराना फार्मूला लागू हुआ यानी संघर्ष किसी का और सत्ता किसी और की तो राहुल गांधी की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठेंगे।राजस्थान में पायलट प्रकरण ने कांग्रेस को लंबे समय तक नुकसान पहुंचाया। पार्टी अंदरूनी खींचतान से उबर नहीं सकी। अंततः सत्ता भी चली गई।अगर केरल में भी कांग्रेस ने यही रास्ता चुना, तो उसका असर केवल राज्य तक सीमित नहीं रहेगा। इसका सीधा संदेश पूरे देश में जाएगा कि कांग्रेस अभी भी अपनी पुरानी राजनीतिक आदतों से बाहर नहीं निकल पाई है।
क्या कांग्रेस इतिहास से सबक लेगी ?
यह सबसे बड़ा सवाल है।क्या कांग्रेस इस बार उस नेता पर भरोसा करेगी जिसने जमीन पर लड़ाई लड़ी? या फिर एक बार फिर “अनुभव”, “संतुलन” और “वरिष्ठता” के नाम पर ऐसा फैसला होगा जो भविष्य में नए संकट को जन्म देगा?राजस्थान का अनुभव बताता है कि जब पार्टी अपने सबसे ऊर्जावान नेताओं को आधी सत्ता देकर शांत करने की कोशिश करती है, तब असंतोष खत्म नहीं होता बल्कि और गहरा हो जाता है।केरल में फिलहाल जो माहौल बन रहा है, वह कांग्रेस के लिए चेतावनी की घंटी है। अगर पार्टी ने सही समय पर सही फैसला नहीं लिया, तो मुख्यमंत्री पद की यह लड़ाई आने वाले वर्षों में कांग्रेस की एक और बड़ी राजनीतिक त्रासदी बन सकती है।और तब लोग फिर यही कहेंगे —नाम बदले, राज्य बदला, लेकिन कांग्रेस की कहानी वही रही।





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