खूब लड़ी मर्दानी…
इतिहास और समाज के उदाहरणों के माध्यम से स्त्री की शक्ति, संवेदना और स्वाभिमान पर विचार। लेख प्रश्न उठाता है कि स्त्री को महिमामंडित करने के बजाय क्या उसे समान मनुष्य का दर्जा मिल पाया...

अभिव्यक्ति – स्त्री को देवी या दासी नहीं, मनुष्य मानने का आग्रह
दिनेश सिंदल,
लेखक, कवि
खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी- लक्ष्मी बाई की वीरता, उनका शौर्य, उनका पराक्रम, एक स्त्री का पराक्रम है। लेकिन हमने खूब लड़ी ‘मर्दानी‘ कह कर उसे मर्द से जोड़ दिया। जब सभी मर्दानों ने अपनी पगड़ियां अंग्रेजों के कदमों में रख दी थी तब उस जनानी ने तलवार उठाई थी। वह भी एक मर्द जाती की रक्षा लिए।
हम अगर इतिहास पर नजर डालें तो हमें कई विदुषी महिलाएं, वीरांगनाएं, समाज चेता महिलाएं मिलेगी, जिन्होंने मनुष्य जाति की रक्षा के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। ऋषि वचवनु की पुत्रियां गार्गी, मैत्रेयी इतिहास की सबसे बुद्धिमान स्त्रियों में से हैं। याज्ञवल्क्य की दूसरी पत्नी मैत्रेयी विद्वानों की सभा में शास्त्रात किया करती थी। ऋषि अगस्त्य की पत्नी लोपामुद्रा श्रेष्ठ दार्शनिक थी। देवमाता अदिती, अरुंधति आदि नाम भी इस क्रम में लिए जा सकते हैं।
ज्यादा दूर नहीं जाए तो बेगम हजरत महल, जिन्होंने अवध पर शासन किया और मटिया बुर्ज में कैद वाजिद अली शाह को छुड़ाने के लिए लार्ड कैनिंग के सुरक्षा दस्ते में सेंध लगाई। दुर्गा भाभी, जिन्होंने भगत सिंह को अंग्रेजों से बचाकर लाहौर से निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन्होंने गवर्नर हेली पर गोली चलाई और मुंबई पुलिस कमिश्नर को गोली मारी। मैडम भीकाजी कामा, सरोजिनी नायडू, जिन्होंने आजादी की लड़ाई में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। अरुणा आसफ अली जो गांधीजी के साथ नमक सत्याग्रह में कम से कदम मिलाकर चली। ऐनी बेसेंट जो भारतीय होम रूल आंदोलन के लिए लड़ी। लक्ष्मी सहगल जो सुभाष चंद्र बोस के साथ आजाद हिंद फौज का हिस्सा रही। ऐसे कई उदाहरणों से हमारा इतिहास भरा पड़ा है जब महिलाओं ने मानवता की रक्षा के लिए, समाज हित के लिए और अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए आंदोलन किए।
लेकिन क्या कारण है कि हर बार किसी सीता को अग्नि परीक्षा देनी पड़ती है। अहिल्या को पत्थर बन जाना पड़ता है। किसी उर्मिला को विरह का दुख झेलना पड़ता है। अपने पति के जीवन के लिए सावित्री को यम से लड़ना पड़ता है। राधा जीवन भर वियोग सहती है। सती त्याग दी जाती है और द्रौपदी को पुरुषों की सभा में अपमान झेलना पड़ता है।
हम लक्ष्मी को चरण दबाते हुए, मीरा को जहर पीते हुए और पद्मिनी के जौहर की गाथा को गाते हुए इन्हें महिमा मंडित करते हैं। क्यों? क्योंकि हम औरत को सिर्फ दो रूपों में ही देखना चाहते हैं या तो देवी या दासी। इस पुरुष के बनाए समाज ने उसे मनुष्य का दर्जा कभी नहीं दिया। उसे पूजनीय बना कर मनुष्यता से वंचित किया या दासी बना कर उसका शोषण किया। मनुष्य ऊर्जा के अलावा कुछ भी नहीं है। स्त्री व पुरुष दोनों के भीतर ऊर्जाएं छुपी है। पुरुष के भीतर स्त्री ऊर्जा भी है व स्त्री के भीतर पुरुष ऊर्जा भी है। इसीलिए हमारे यहां शिव को अर्धनारीश्वर कहा गया है।
बेटियां (स्त्री) कला चेतनाएं हैं। वे संस्कृति की संवाहक है। स्त्री के पास श्रद्धा है, प्रेम है, करुणा है, दया है और ये उसकी ताकत है। स्त्री पुरुष की तुलना में ज्यादा सहनशील होती है। ज्यादा मजबूत होती है। पुरुष अगर औसतन सत्तर वर्ष जीता है तो स्त्री पिछत्तर वर्ष जीती है, इसलिए विवाह चार पांच वर्ष कम उम्र की लड़की से करने का चलन है। पुरुष ने पास अहंकार है, क्रोध है और यह समाज पुरुषों का बनाया हुआ है। इसलिए पिछले पांच हजार वर्षों में पंद्रह हजार युद्ध हुए। अगर स्त्री समाज निर्माता होती तो तस्वीर कुछ अलग होती। उसमें प्रेम व करुणा के लिए भी स्थान होता।
पुरुषों के बनाए समाज में धीरे धीरे नारी को चारदीवारी में समेट दिया गया। हमारे समाजों ने स्त्री को देह से ज्यादा कुछ नहीं समझा, उसे वंचित व पुरुष पर आश्रित बनाने की कोशिशें हुई। वे सब काम जिनसे आमदनी होती है, पुरुष ने अपने पास रखे। बाहर खाना बनाने के पैसे मिलते है तो पुरुष बनाएगा, घर में स्त्री बनाएगी। बाहर कपड़े धोने के पैसे मिलते है तो पुरुष धोएगा, घर में स्त्री धोएगी इत्यादि। काम को हमने स्त्री- पुरुष में बांट दिया। धीरे धीरे ये बातें हमारे व्यवहार में आ गई। और स्त्री के लिए घर के चारों और खिंची लक्ष्मण रेखा गहरी से और गहरी होती गई। ‘मैं कोई लड़की हूं जो ये करूं।’ ‘क्या लड़कियों की तरह शर्माता है’- जैसे जुमले हमारी भाषा का हिस्सा बन गए।
कुछ लोग अपनी बेटियों को ‘बेटा’ कह कर संबोधित करते हैं और अपने आपको लैंगिक समानता का समर्थक समझते हैं। जबकि बेटी को बेटा कहना ही स्त्री की गरिमा को अस्वीकार करना है। आज कानून ने स्त्री को कुछ अधिकार दिए है। विज्ञान ने शरीर के रहस्यों को खोजा है। अच्छी बात है। मैं यहां समाज के नजरिए को सामने रखना चाहता हूं।
आज अगर किसी स्त्री के साथ बलात्कार हो जाए तो दोष स्त्री का। अपमान की पीड़ा स्त्री सहेगी। उस बलात्कारी के लिए समाज की नजरों में कोई घृणा नहीं। अगर किसी स्त्री के बच्चा नहीं हो रहा तो सारा दोष स्त्री का। कितनी विचित्र बात है कि हमने ‘बांझ’ शब्द का कोई पुलिंग ही नहीं गढ़ा। आज नारी अपनी पूरी चेतना के साथ खड़ी होना चाहती है। सवाल ये है कि आप नारी में छुपी नारी को बाहर लाना चाहते हैं, उसे गरिमा देना चाहते हैं या उस में छुपे पुरुष तत्व को उसकी मर्दानी को हवा देना चाहते हैं।






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