होली आई रे भजनाई…रंग बरसे….!
हम लगातार ऑब्जर्व करते रहे कि हो क्या रहा है? किस नेता के कंधे पर कौन बड़ा नेता हाथ रख रहा है... कौन किससे दूर खड़ा है... किसकी कुर्सी आगे है... किसे योगी आदित्यनाथ की तरह दूसरी कुर्सी पर धकेल दिया...

आखिन देखी खादी में छिपे सियासी रंगों की
होली को यूं ही मदनोत्सव थोड़े ही कहा जाता है। यह वाकई उमंग और उल्लास का त्योहार रहा है, जिसमें उड़ने वाले रंग-गुलाल कई बरसों पुराने गिले-शिकवे तक धो डालते हैं। हम तो बचपन से देखते सुनते आए हैं कि कोई पराया भी ‘बुरा न मानो होली है…’ कहते हुए पलीता लगा जाता है। और जब, बात राजनीति की हो तो कहने ही क्या…? जैसे जैसे राजनीति पर भी आधुनिकता का मुल्लमा चढ़ता जा रहा है, वैसे वैसे राजनेताओं की होली भी अजीब रंग में रंगने लगी है।
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अलग अलग सामाजिक संगठनों की तर्ज पर राजनीतिक दल भी होली पर स्नेह मिलन समारोह आयोजित करते हैं। ये ऐसे आयोजन होते हैं, जिसमें किसी को भी कपड़े खराब होने का डर नहीं रहता, बावजूद इसके कि ऐसे कार्यक्रमों में भी रंग उड़ते हैं। कपड़ों पर लगते हैं, लेकिन भला हो बापू का कि उन्होंने अंग्रेजों को भगाने के बहाने ही सही, खादी को न सिर्फ बनाया, बल्कि बढ़ावा भी दिया। यही खादी आज आजादी के सत्तर बरस बाद भी नेताओं का रौब-दाब बनी घूमती है। आम आदमी के लिए भले ही खादी का गमच्छा खरीदना भी वश में नहीं रहा हो।
अब तो गिरगिट भी शर्माने लगे
खादी यानी सफेद झक्क कपड़े। जरा सी धूल-मिट्टी भी सफेद कपड़े की शान बिगाड़ देती है, लेकिन नेता हैं कि इनकी खादी किसी रंग से नहीं डरती। कारण कि ये भी खादी के पीछे अपने अपने सियासी रंग लेकर होली क्या 365 दिन घूमते हैं। इनकी खादी जितना जल्दी रंग बदलती है, उससे तो अब गिरगिट भी शर्माने लगे हैं। अब सफेद खादी पर दाग लगने का डर इसलिए भी नहीं रहा कि बताते हैं कोई गजब की जादूई वाशिंग मशीन आ गई है। इसमें जाते ही कपड़े ही नहीं, खुद नेताजी पाक-साफ होकर निकल आते हैं। किसी सीडी-वीडी का डर खत्म हो जाना तो बोनस में मिलता है इस मशीन में जाने के साथ।
कुल मिलाकर हम नेताओं के होली स्नेह मिलन की बात कर रहे थे। इसमें उड़ने वाले रंग-गुलाल तो उन काले धब्बों के सामने कुछ नहीं है, जो सियासी जीवन में किसी न किसी पर तो लगते ही रहते हैं। हमारी भी जिज्ञासा हुई कि किसी राजनीतिक दल के होली स्नेह मिलन का साक्षी बना जाए तो पहुंच गए राजस्थान की राजधानी गुलाबी नगरी में। इस शहर के नाम में भी रंग है तो समारोह की रंगबाजी भी गजब की ही होनी थी। हालांकि कलमगिरी के शुरुआती दिनों में ऐसे समारोहों की कवरेज का मौका मिला था एक जूनियर रिपोर्टर के नाते, लेकिन उस वक्त के रंगों में प्रेम घुला-मिला होता था। आपसी वैमनस्य नहीं था। मतभेद भले ही एक दूसरे से रहे हों, लेकिन मनभेद तो दिखता ही नहीं था। लेकिन इस बार जब हम कई बरसों बाद एक सियासी होली मिलन समारोह में पहुंचे तो दंग रह गए। वहां गुलाल कम, राजनीतिक गणित ज्यादा उड़ती नजर आई। सफेद झक्क खादी के कुर्ता-पायजामा पहने नेताओं की आंखों में सत्ता की चमक ऐसी थी कि रंगों का त्योंहार भी बैरंग दिखा।
यह समारोह चूंकि सत्ताधारी पार्टी का था तो सत्ता की चकाचौंध में होली के रंग तो वैसे ही दीवाली की जगमग जैसे हुए जा रहे थे। होली स्नेह मिलन की परम्परा जैसे एक राजनीतिक स्टेज बन चुकी थी। नेता आए… मुस्कराए… गले मिले… तस्वीरें खिंचवाई और तैयार हो गए इन तस्वीरों के जरिए संदेश देने के लिए। सभी की नजरें कुर्सी पर दो साल बीतने के बाद भी सत्ता का नया केंद्र ही बने हुए मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा पर टिकी थी। कई लोगों ने उनके साथ कुछ प्रसाद मिलने की उम्मीद में तस्वीरें खिंचवाई तो कई नेताओं ने इस उम्मीद के साथ कि मोदी-शाह की नजरों में तो बने रहेंगे।
गलत फोटो व गलत फ्रेम का डर
वैसे यह आयोजन भजनलाल की मेजबानी में हो रहा था तो जाहिर है यहां सफेदी कुछ ज्यादा ही चमक रही थी। आखिर उन्हें भी तो अपनी सरकार की शुद्धता सभी को दिखानी थी। इतने में वसुंधरा राजे की एंट्री होती है और दृश्य बदल जाता है। कोटा डोरिया की गुलाबी किनारी वाली साड़ी पहने मैडम के पहुंचते ही दो धड़े साफ नजर आने लगे। कई नेता जो भजनलाल के आस-पास घूम रहे थे, वे मुंह छिपाने के लिए स्टाल्स की ओर घूमकर गुजिया-समोसे का आनन्द लेने लग गए। कारण कि होली मिलन में असली डर गुलाल से नहीं, कैमरे से होता है। गलत फोटो, गलत फ्रेम, गलत एंगल से संदेश बदल जाता है।
फिर यहां भी वसुंधरा की एंट्री ही साइलेंट स्टेटमेंट बन गई। जैसे वे कह रही हों कि “मैं यहां हूं, अभी भी हूं, और रहूंगी।” भजनलाल के साथ प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ भी कार्यकर्ताओं नेताओं से मिल रही वसु मैडम के साथ कदमताल कर पार्टी में एकजुटता का संदेश देने की कोशिश जरूर कर रहे थे, लेकिन यहां भी उत्साही कार्यकर्ताओं की टोली ने जब ‘हमारा मुख्यमंत्री कैसा हो…’ के नारे की गुलाल मल दी तो दोनों के चेहरे का रंग फीका पड़ता दिख ही गया।
हार के बाद चूर चूर हुए सपने
इस दौरान मुझे किसी ने अभी आलाकमान की नजरों में चढ़ रहे पूर्व प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया की ओर इशारा किया, जिन्होंने साल 2023 में पार्टी की राजस्थान में सरकार बनने से कोई नौ महीने पहले हुए एक ऐसे ही समारोह में कहा था कि “बीजेपी की अगली होली सतरंगी होगी और कांग्रेस का होलिका दहन हो जाएगा।” उनकी यह भविष्यवाणी तो सही हो गई, लेकिन आमेर में हार के साथ ही उनका सत्ता सुख भी हाथ से जैसे फिसल गया। आज के कार्यक्रम में भी वे भले ही किसी को लगाने के लिए गुलाल मल रहे थे, लेकिन लग रहा था कि अब भी खाली हाथ ही मल रहे हैं। पूनिया की तरह ही हार के कारण सपने चूर चूर करवा चुके राजेंद्र राठौड़ पर भी नजर गई तो उनकी आंखों में वसुंधरा के भय के साथ एक पश्चाताप भी दिखा कि क्यों उनकी जुबान फिसली और क्यों उन्हें न खुदा (सत्ता) मिला, न विसाले सनम (आका)।
समीकरणों में छुपा असली रंग
खैर, हम लगातर ऑब्जर्व करते रहे कि हो क्या रहा है? किस नेता के कंधे पर कौन बड़ा नेता हाथ रख रहा है… कौन किससे दूर खड़ा है… किसकी कुर्सी आगे है… किसे योगी आदित्यनाथ की तरह दूसरी कुर्सी पर धकेल दिया गया है? कारण की असल में यही तो होली मिलन का रंग कोड जो है। ऐसा नहीं है कि समारोह में रंग-गुलाल नहीं उड़ रहे थे। बाकायदा गुलाल गोटों से लेकर नेता अपने अपने इलाके से पुड़ियां बांध कर लाई हुई अबीर-गुलाल उड़ा रहे थे… लेकिन हमने महसूस किया कि ये गुलाल तो सिर्फ कैमरे के लिए है… असली रंग तो राजनीतिक समीकरणों का है। चंग की थाप और होरियों की स्वर लहरियां तो वैसे भी नेताओं की महत्वाकांक्षाओं के शोर में दब ही चुकी थी। चूंकि राजस्थान में कुछ दिनों बाद पंचायत व निकाय चुनाव होने है, ऐसे में यह समारोह भविष्य की टिकट राजनीति का ट्रेलर भी नजर आया। नेता जैसे भावी प्रत्याशियों को अपनी पारखी आंखों से स्कैन कर रहे हों कि यह किस खेमे का है… किसका आदमी है… यह किसकी ओर झुकेगा।
इधर भी नजर नहीं आई सितारों में चमक
भाजपा के स्नेह मिलन से निकल कर हम पहुंच गए एक सितारा होटल में। यहां कांग्रेस की ओर से होली मिलन समारोह का आयोजन था। यहां अशोक गहलोत भी अपनी जादुई मुस्कान लिए पहुंचे थे। सचिन पायलट, प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और टीकाराम जूली तो थे ही। कई हारे-जीते नेताओं के रूप में सितारे तो मौजूद थे, लेकिन चमक नहीं थी। कहते हैं ना कि सत्ता ही चेहरे का रंग चमकाती है और यहां तो सत्ता हाथ से फिसलने के बाद भी कई छत्तीस के आंकड़े नजर आते हैं। फिर भी धड़ों में बंटी हुई कांग्रेस की तरह यहां भी अलग अलग टोलियां अबीर-गुलाल उड़ा रही थी। इसी दौरान पायलट गहलोत को गुलाल लगाने पास गए तो गहलोत ने अपने अस्थमा का हवाला देते हुए इनकार कर दिया और पायलट की गुलाल ही उनके चेहरे पर मल दी। यह देख डोटासरा अपना गमछा घुमाना नहीं भूले तो जूली ने व्यंग्य का गुबारा डोटासरा पर फोड़ दिया कि अब तो इन्होंने रूस के राष्ट्रपति पुतिन की तरह अपना भी हूबहू डुप्लीकेट ढूंढ लिया है… ऐसी कोई नौबत आई तो डर जैसी बात नहीं। उनके इतना कहते ही हंसी फूट पड़ी, लेकिन गहलोत के माथे पर फिक्र की लकीर उभर आई, जैसे उन्हें कोई पुराना सिक्योरिटी गार्ड नजर आ गया हो। मगरमच्छ पकड़ने की बातें तो वैसे भी विधानसभा व विधानसभा के बाहर तक छाई हुई है।
खैर, कांग्रेस के नेता सतर्क भी रहते हैं कि किसी कैमरे की नजर न पड़ जाए। इसलिए नेताओं ने एक दूसरे का हाथ पकड़ कर पोज दिया। इसी दौरान बात राज्यसभा चुनाव की शुरू हुई तो गहलोत बोल पड़े, आइए चाय पीते हैं… और अचानक सभी कदम चाय की केतली की ओर मुड़ गए। कई नेताओं के गुलाली गुबार मन में ही रह गए।
हमने लौटते वक्त यही सोचा कि राजनीति में आज होली मिलन समारोह एक राजनीतिक रंगमंच है, जहां मंच पर भाईचारा है… बैकस्टेज पर रणनीति… फ्रेम में मुस्कान… और फाइलों में समीकरण। यहां कोई राधा-कृष्ण की होली नहीं होती, यहां कुर्सी की होली होती है। सफेद कपड़े पहनकर नेता एक-दूसरे पर गुलाल नहीं एक-दूसरे पर संकेत फेंकते हैं। और जनता? जनता तालियां बजाती है, फोटो देखती है, वीडियो शेयर करती है और सोचती है कि यह सब त्योहार की राजनीति है, जबकि सच यह है कि यह त्योहार का राजनीतिकरण है।






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