व्यवस्थापन गुरु है गृहस्वामिनी
गृहस्वामिनी के सुंदर घर की निर्मिति से होकर, परिवार के समस्त सदस्यों की सफलता की, पराकाष्ठा में परिलक्षित होती है, उसके त्याग और समर्पण के परिदृश्य में झलकती है...

कविता
डॉ शोभा भंडारी, लेखिका
कोई अनुबंध नहीं किया, कोई प्रबंधन नहीं सीखा,
किसी भी व्यावसायिक संस्थान या प्रतिष्ठान से।
जो कुछ सीखा अपने अनुभवों से सीखा,
सीखा अपनी अनवरत लगन, परिश्रम और प्रतिबद्धता से।
सही अर्थों में व्यवस्थापन गुरु है गृहस्वामिनी,
निर्माता, निदेशक और नियंत्रक भी है,
संसाधनों की प्रभावी नियोजक भी है, और कार्य को
सफलतापूर्वक संपन्न करने वाली अभियांत्रिकी भी वो है।
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देखें पेज 35
RT_March2026.pdf
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भौतिकता और धनोपार्जन की दौड़ में हम,
गृहस्वामिनी का अमूल्य योगदान भूलते जा रहे हैं,
उसके अनूठे किरदार को नज़र अंदाज़ कर रहे हैं,
उसकी मेहनत और मशक्कत पर तंज कसने लगे हैं।
घर की समुचित व्यवस्था करने वाली,
हर छोटे-बड़े का ख़याल रखने वाली,
हर तकनीक और विज्ञान को समझने वाली,
गृहिणी की भूमिका का तिरस्कार करने लगे हैं।।
हकीकत तो ये है कि व्यवस्थापन के,
ऐसे अद्भुत संयोजन की शुरुआत,
गृहस्वामिनी के सुंदर घर की निर्मिति से होकर,
परिवार के समस्त सदस्यों की सफलता की,
पराकाष्ठा में परिलक्षित होती है,
उसके त्याग और समर्पण के परिदृश्य में झलकती है ।।।





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