पश्चिम एशिया की जंग से बदलता वैश्विक शक्ति संतुलन
संजीव पांडेय,
वरिष्ठ पत्रकार
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ईरान और अमेरिकी-इजरायली गठबंधन के संघर्ष ने पश्चिम एशिया ही नहीं, पूरी दुनिया की जियो-पॉलिटिक्स और जियो-इकॉनॉमिक्स को बदल दिया है। हालात ऐसे बनते दिख रहे हैं कि अमेरिकी पराभव का युग शुरू हो चुका है। जिस ईरान के खिलाफ त्वरित सैन्य सफलता की उम्मीद जताई गई थी, उससे अब अमेरिका बात करने को उतावला है। पूरी दुनिया के वैश्विक ऑर्डर में बदलाव होता नजर आ रहा है। चीन पश्चिम एशिया से लेकर अफ्रीका तक ताकतवर होकर उभरा है, जबकि संघर्ष में सामने या पीछे वह प्रत्यक्ष रूप से नजर नहीं आ रहा है। अमेरिका द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद मिली चौधराहट को खोता नजर आ रहा है। जिस तरह मिखाइल गोर्बाचोव सोवियत संघ के पतन के लिए जिम्मेदार माने जाते हैं, शायद कुछ विश्लेषक भविष्य में अमेरिकी नेतृत्व की नीतियों पर सवाल उठा सकते हैं। नाटो एलायंस में एकजुटता में दरार के संकेत नजर आ रहे हैं। अमेरिका का सबसे बड़ा सहयोगी ब्रिटेन की कुछ मुद्दों पर अलग प्राथमिकताएं नजर आई हैं। अभी तक अमेरिका का लगभग हर युद्ध, ब्रिटेन का भी युद्ध माना जाता था। अफगानिस्तान के साथ जॉर्ज बुश की रिपब्लिकन सरकार द्वारा छेड़ी गई जंग में नाटो एक साथ नजर आया था, आज ईरान के मामले में नाटो की भूमिका सीमित नजर आई।
संघर्ष की शुरुआत का आधार था ईरान का परमाणु कार्यक्रम। आज जब संघर्ष खत्म करने की बात हो रही है, तो परमाणु कार्यक्रम का मुद्दा पीछे छूट गया है। फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी को जोड़ने वाला होर्मुज़ जलडमरूमध्य में नौवहन को सुचारु रखना अब मुख्य मुद्दा बन गया है। ईरान लंबे समय से ऐसी स्थिति के लिए अपनी रणनीति तैयार करता रहा है कि कब उसे इस जलमार्ग से नौवहन रोकने या नियंत्रित करने का अवसर मिले। अब वह मौका आ गया है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य को स्वेज नहर और बॉस्फोरस जलडमरूमध्य की तरह ही ईरान अब अपनी रणनीतिक संपत्ति मानेगा और दुनिया भर के व्यापार पर वह इसके जरिये टोल या नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश कर सकता है।
दरअसल अब अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता में ईरानी मिसाइल सिस्टम और परमाणु कार्यक्रम से भी बड़ा मुद्दा होर्मुज़ जलडमरूमध्य को खोलना हो गया है। व्यापक रूप से माना जा रहा है कि तनाव में कमी लाने के लिए इस रणनीतिक मार्ग पर समझौता जरूरी है। कुछ रिपोर्टों में पाकिस्तान की संभावित मध्यस्थ भूमिका की चर्चा हुई है। वार्ता में अब ईरान का मिसाइल भंडार, परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय प्रतिनिधि हाउथी, हिज़्बुल्लाह, हमास तथा यूरेनियम संवर्धन ही मुद्दे नहीं हैं, बल्कि इससे बड़ा मुद्दा दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग (होर्मुज़ जलडमरूमध्य) का भविष्य हो गया है।
इजरायली महत्वाकांक्षा और बढ़ता संकट
इजरायल की महत्वाकांक्षा ने संकट को बढ़ाया है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इजरायल ईरान के नेतृत्व को खत्म कर इस जलमार्ग पर प्रभाव चाहता था, ताकि इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर पर उसका प्रभुत्व बन सके। ऐसा माना जाता है कि ईरान इन परिस्थितियों को पहले ही समझ चुका था। इजरायल की इस रणनीति के खिलाफ पाकिस्तान और तुर्की दोनों थे। इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर पर भारत के बढ़ते प्रभाव से पाकिस्तान चिंतित था, तो तुर्की सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और खाड़ी क्षेत्र के इस कॉरिडोर पर बढ़ते प्रभाव से चिंतित था। इस कॉरिडोर को लेकर तुर्की और पाकिस्तान की चिंताएं अलग-अलग कारणों से सामने आई हैं। ईरान की नाकेबंदी के बाद यह कॉरिडोर खटाई में पड़ गया है, क्योंकि कॉरिडोर के महत्वपूर्ण पड़ाव जबेल अली बंदरगाह तक जाने के लिए इस जलमार्ग को पार करना जरूरी है, जिस पर अब ईरान ने दबाव बनाने के संकेत दिए हैं।
पाकिस्तान की भू-राजनीतिक बढ़त
अमेरिका-ईरान संघर्ष के बीच पाकिस्तान की विदेश नीति एकाएक चर्चा का विषय बन गई है, क्योंकि आर्थिक रूप से बदहाल पाकिस्तान मध्यस्थ की भूमिका में आ गया। इस्लामाबाद में शांति वार्ता कराने में पाकिस्तान सक्रिय हो गया। भले ही वार्ता पूरी तरह सफल न हुई हो, लेकिन एशियाई क्षेत्र में आई गर्मी में कुछ नरमी जरूर आई। पाकिस्तान के भूगोल की इसमें अहम भूमिका है। बेशक पाकिस्तान आर्थिक रूप से कमजोर है, लेकिन अपनी महत्वपूर्ण भौगोलिक स्थिति के कारण उसका महत्व स्थापना काल से बना हुआ है। मध्य-पूर्व की किसी भी बड़ी समस्या में पाकिस्तान की भूमिका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बनी रही है।
याद करें, जब अफगानिस्तान में सोवियत सेना की एंट्री हुई थी, तब पाकिस्तानी शासक जनरल जिया-उल-हक से अमेरिका ने सहायता मांगी थी, क्योंकि पाकिस्तान के भूगोल का इस्तेमाल किए बिना अमेरिका अफगानिस्तान में सोवियत गतिविधियों को नियंत्रित नहीं कर सकता था। इसका फायदा जनरल जिया ने उठाया। अमेरिकी दबाव के बावजूद पाकिस्तान ने अपना परमाणु कार्यक्रम जारी रखा और उसी दौर में अरबों डॉलर की अमेरिकी सहायता भी प्राप्त की। अमेरिकी प्रशासन ने पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम पर आंखें मूंद ली थीं।
2001 में भी जनरल परवेज मुशर्रफ ने पाकिस्तान के भूगोल का लाभ उठाया और अफगानिस्तान में वॉर ऑन टेरर में अमेरिका का सहयोगी बनने के बदले भारी आर्थिक सहायता प्राप्त की। अब पाकिस्तान के नेतृत्व ने इस स्थिति में मध्यस्थता की संभावनाएं तलाशने की कोशिश की है। ईरान की सीमा अफगानिस्तान की तरह पाकिस्तान से मिलती है। इसका फायदा पाकिस्तान ने उठाया और इस्लामाबाद को वार्ता के संभावित मंच के रूप में सामने लाया गया। यह भारत के लिए चिंता का विषय बन सकता है।
पाकिस्तान की मज़बूरी
ईरान-अमेरिका संघर्ष में मध्यस्थता की पाकिस्तान की सक्रिय भूमिका केवल कूटनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं, बल्कि उसकी घरेलू आर्थिक मजबूरी भी है। पाकिस्तान अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ मार्ग पर बहुत निर्भर है, और संघर्ष के कारण तेल कीमतों में बढ़ोतरी ने उसकी पहले से कमजोर अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव डाला है। आईएमएफ कार्यक्रम के तहत विदेशी मुद्रा भंडार बनाए रखने की शर्तों के बीच महंगा तेल, बढ़ता आयात बिल, महंगाई और व्यापार घाटा पाकिस्तान के लिए गंभीर संकट बन सकते हैं। साथ ही, खाड़ी देशों में काम करने वाले लाखों पाकिस्तानी नागरिकों की आजीविका भी क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़ी है, इसलिए इस संघर्ष का जल्द अंत पाकिस्तान के लिए रणनीतिक आवश्यकता था।
भूराजनीतिक स्तर पर पाकिस्तान ऐसी स्थिति चाहता है जिसमें न तो ईरान पूरी तरह कमजोर हो और न ही इतना शक्तिशाली कि खाड़ी क्षेत्र का संतुलन बदल दे। ईरान से लगी लंबी सीमा, सऊदी अरब से रक्षा संबंध और चीन से आर्थिक साझेदारी के कारण पाकिस्तान को संतुलन साधना पड़ता है। यही कारण है कि उसने स्वयं को एक मध्यस्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस भूमिका से पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय छवि में सुधार हुआ है। जिस देश की छवि लंबे समय तक अस्थिरता और सुरक्षा चुनौतियों से जुड़ी रही, वही अब एक बड़े क्षेत्रीय संकट को शांत कराने वाले खिलाड़ी के रूप में देखा जा रहा है। इससे उसे कूटनीतिक मान्यता, निवेश, ऋण और वैश्विक मंचों पर नई स्वीकार्यता मिल सकती है।
हालांकि इस सफलता के साथ जोखिम भी जुड़े हैं। यदि वार्ता प्रक्रिया विफल होती है या अमेरिका-ईरान संबंध फिर बिगड़ते हैं, तो पाकिस्तान असहज स्थिति में फंस सकता है। घरेलू राजनीति में इस घटनाक्रम ने सेना प्रमुख असीम मुनीर और सैन्य प्रतिष्ठान की शक्ति को और मजबूत किया है, जिसे पाकिस्तान की “हाइब्रिड व्यवस्था” की सफलता के रूप में देखा जा रहा है। भारत के लिए तत्काल राहत यह है कि संघर्ष समाप्त होना क्षेत्रीय स्थिरता के पक्ष में है, लेकिन दीर्घकाल में कूटनीतिक रूप से अलग-थलग पड़ा पाकिस्तान अब फिर सक्रिय भूमिका में लौटता दिख रहा है। साथ ही, यदि पाकिस्तान में सेना का प्रभाव और बढ़ता है, तो भारत-पाक संबंधों पर इसका नकारात्मक असर भी पड़ सकता है।
भारत की सीमित भूमिका
यही वह बिंदु है जहां भारत की विदेश नीति पर सवाल उठते हैं। संतुलन साधने की कोशिश के बावजूद भारत इस संकट में निर्णायक भूमिका निभाने में पीछे रह गया। न तो वह प्रभावी मध्यस्थ बन सका और न ही अपने रणनीतिक हितों को आक्रामक तरीके से सामने रख पाया।
ईरानी रणनीति की गहराई
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अब होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर ईरान की भूमिका को स्वीकार करते नजर आ रहे हैं। यदि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम और मिसाइल सिस्टम को नियंत्रित करने का वादा भी करेगा, तो वह होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर निर्णायक प्रभाव चाहेगा। क्योंकि काफी बड़े आर्थिक नुकसान के बाद ईरान पुनर्निर्माण के लिए धन चाहता होगा। वह अंतरराष्ट्रीय आर्थिक प्रतिबंधों को पूरी तरह खत्म करने की मांग करेगा। हालांकि वार्ता में यूरेनियम संवर्धन पर भी विवाद जारी है। ईरान शून्य संवर्धन तथा अपने भंडार को विदेश भेजने की मांगों को खारिज कर रहा है।
दरअसल दुनिया ईरानी युद्ध-रणनीति को समझ नहीं पाई। इराकी राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन के तर्ज पर ईरानी नेतृत्व को खत्म करने की योजना बनाई गई थी। लेकिन वे यह भूल गए थे कि ईरान, सद्दाम हुसैन से वर्षों लड़ चुका था और इस लड़ाई के दौरान उसे अमेरिकी रणनीति का पूरा अंदाजा लग गया था। 1990 के दशक से ईरान और उसके सुरक्षा अधिकारी होर्मुज़ जलडमरूमध्य को एक प्रतिरोध के साधन के रूप में इस्तेमाल करने की रणनीति बना रहे थे। ईरान ने वर्षों तक उस परिदृश्य की तैयारी की, जिसमें होर्मुज़ जलडमरूमध्य को बंद करना शामिल था। होर्मुज़ जलडमरूमध्य को बंद करने के हर कदम की योजना बनाई गई थी। आज यही होर्मुज़ जलडमरूमध्य ईरान का सबसे प्रभावी रणनीतिक उपकरण है।
ईरान ने एक दीर्घकालिक रणनीति के तहत लाल सागर पर स्थित प्रमुख मार्ग बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य के पास अपने प्रॉक्सी हाउथी बलों को स्थापित किया था, ताकि भविष्य में स्वेज नहर और लाल सागर के रास्ते होने वाले व्यापार को रोका जा सके। आज ईरान उस व्यापारिक रास्ते को भी बाधित करने की स्थिति में है। इस मार्ग को बंद करने में वह कितना सफल होगा, यह समय बताएगा, लेकिन उसकी क्षमता को अब दुनिया गंभीरता से देख रही है।
ऊर्जा संकट और वैश्विक असर
ईरान की रणनीति से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर गंभीर खतरे की स्थिति बन गई है। भारत समेत तमाम एशियाई देशों में ऊर्जा संकट की आशंका गहराने लगी है, क्योंकि भारत की विकास दर काफी हद तक आयातित ऊर्जा पर निर्भर करती है। अगर होर्मुज़ जलडमरूमध्य संकट दूर नहीं हुआ, तो भारत की विकास दर प्रभावित होगी। देश के उद्योगों पर कई तरह के असर पड़ेंगे। शहरों में बढ़ती लागत और महंगाई से मजदूर गांवों की तरफ पलायन कर रहे हैं। नोएडा, भिवाड़ी, गुड़गांव, मानेसर, सूरत और पुणे में पिछले दिनों मजदूर आंदोलनों का एक बड़ा कारण ऊर्जा आपूर्ति संकट और बढ़ती लागत भी रही है। शहरों में एलपीजी का संकट गहराया है, मजदूरों को महंगा एलपीजी मिल रहा है, इसलिए वे गांवों की तरफ लौट रहे हैं। गुजरात और महाराष्ट्र के उद्योगों को भी श्रमिक संकट झेलना पड़ रहा है।







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