व्यवस्था को इलाज की जरूरत
मनीष गोधा,
वरिष्ठ पत्रकार
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सरकारी योजनाओं में निजी क्षेत्र की भागीदारी, ये विचार सुनने में भले ही लोकतांत्रिक और सर्वहितकारी लगता हो, लेकिन हकीकत में सार्वजनिक और निजी क्षेत्र का ये घालमेल ऐसी योजनाओं के लाभार्थियों के लिए जी का जंजाल बन गया है। और ये योजनाएं एक वर्ग विशेष की हितों की पूर्ति करती दिख रही हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है प्रदेश में स्वास्थ्य क्षेत्र में चल रही राजस्थान गवर्नेमेंट हैल्थ स्कीम जिसे हम आरजीएचएस के नाम से जानते हैं। दिलचस्प बात यह है कि इस योजना के लाभार्थी सरकारी कर्मचारी-अधिकारी और राजनेता ही हैं, लेकिन वे ही इस योजना से अब सबसे ज्यादा त्रस्त दिख रहे हैं। हालांकि आम आदमी के लिए चल रही स्वास्थ्य बीमा योजना का हाल भी बहुत अच्छा नहीं है और इस योजना के लाभार्थी भी सरकारी स्वास्थ्य बीमा से ज्यादा खुद की मेडिक्लेम पॉलिसी पर ज्यादा भरोसा करते हैं।
ये योजनाएं इस उद्देश्य के साथ शुरू की गई कि चूंकि निजी क्षेत्र कथित तौर पर गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सेवाएं प्रदान कर रहा है, इसलिए इनका लाभ हर वर्ग को मिलना चाहिए। लेकिन ये योजनाएं अब ऐसी समस्या बनती जा रही हैं जिसका कोई समाधान सरकार के पास नजर नहीं आ रहा है। सुधार के नाम पर आरजीएचएस को भी बीमा कम्पनियों के भरोसे छोड़ने पर विचार शुरू हो गया है।
आरजीएचएस- दिखावे की आदर्श योजना
केन्द्र सरकार अपने अधिकारियों और कर्मचारियों को सरकारी और निजी अस्पतालों में उपचार के लिए सैंट्रल गर्वनमेंट हैल्थ स्कीम यानी सीजीएचएस संचालित करती है। इसी योजना की तर्ज पर प्रदेश की पिछली कांग्रेस सरकार ने राज्य सरकार के अधिकारियों, कर्मचाारियों और पेंशनर्स के लिए राजस्थान गर्वनमेंट हैल्थ स्कीम यानी आरजीएचएस लागू की। यही योजना सरकार के विधायकों, मंत्रियों यहां तक की मुख्यमंत्री के लिए भी लागू है। इसका पैटर्न लगभग सीजीएचएस जैसा ही रखा गया। इसके तहत कर्मचारियों और अधिकारियों और पेंशनर्स को एक निश्चित सीमा तक सरकारी के साथ ही निजी अस्पतालो में ओपीडी और आईपीडी में कैशलैस उपचार की सुविधा दी जाती है। योजना की आदर्श स्थिति यह है कि योजना से सम्बद्ध किसी भी अस्पताल में सरकारी अधिकारी और कर्मचारी उपचार के लिए जा सकता है। सरकार ने उपचार की दर्रे निर्धारित की हुई है और इन निर्धारित दरों के अनुसार उसके उपचार का जो भी खर्च होता है वह सरकार वहन करते हुए सम्बन्धित अस्पताल को भुगतान करती है। इसी तरह आरजीएचएस से सम्बद्ध दवाई की दुकानों से जो दवाइयां ली जाती है, उसका भुगतान सरकार करती है।
वास्तविक स्थिति- अस्पताल में एडमिट होना भी मुश्किल
इस योजना की वास्तविक स्थिति यह है कि इसका कोई लाभार्थी गम्भीर मरीज है तो उसका किसी ढंग के निजी अस्पताल में भती होना तक मुश्किल है। भर्ती हो भी जाए तो अस्पताल की कोशिश यह रहती है कि जल्द से जल्द उससे छुटकारा पाया जाए। इसका कारण यह है कि सरकार ने योजना के तहत विभिन्न उपचारों की दरें निर्धारित कर रखी हैं जो निजी अस्पतालों द्वारा वसूल की जानी वाली दरों के मुकाबले कम है। ऐसे में यदि निजी अस्पताल को लगता है कि मरीज को लम्बे समय तक भर्ती रखना पड़ेगा तो आर्थिक नुकसान को देखते हुए अस्पताल किसी ना किसी बहाने से मरीज को डिस्चार्ज कर देते हैं। आरजीएचएस का नाम सुनते ही कोई दूसरा अस्पताल भी उसे आसानी से भर्ती नहीं करता। इस तरह के कई केस पिछले दिनों में सामने आ चुके हैं। पीड़ाजनक स्थिति यह है कि इसकी कोई सुनवाई भी नहीं है।
सरकार से भुगतान में देरी भी बड़ा कारण
सरकार ने वाहवाही लूटने के लिए इस योजना में निजी अस्पतालों को शामिल तो कर रखा है, लेकिन खुद सरकार की ओर से इस योजना की मॉनिटरिंग और क्रियान्वयन में इतनी ढिलाई है कि निजी अस्पतालों को सरकार से समय पर भुगतान नहीं मिलता। अस्पतालों का लाखों रुपए का भुगतान रूका रहता है। ऐसे में अस्पतालो की कोशिश रहती है कि इस योजना के लाभार्थी मरीजों को जहां तक हो सके टाला जाए।
सरकार की ढीली मॉनिटरिंग की स्थिति यह है कि योजना जब शुरू की गई तो इस पर सालाना लगभग 1200 करोड़ का खर्च माना गया था, लेकिन शुरूआती वर्षो में ही यह खर्च तीन से चार हजार करोड़ तक जा पहुंचा। कारण यह था कि निजी अस्पतालों और योजना से सम्बद्ध दवा विक्रेताओं ने इसे अंधी कमाई का जरिया मान लिया। उपचार के नाम पर अनाप-शनाप खर्च और फर्जी बिल बना कर करोड़ों का भुगतान उठाया गया, लेकिन ना इसे देखा गया और ना रोका गया।
अब जब योजना का खर्च सीमा से बाहर जाने लगा तो पिछले वर्ष सरकार जागी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के माध्यम से सरकार के पास आने वाले हर बिल की जांच की जाने लगी। जांच में सामने आया कि बड़े स्तर पर फर्जीवाड़ा चल रहा था। ऐसे में वित्त विभाग ने बड़े पैमाने पर भुगतान रोके और गड़बड़ी करने वाले अस्पतालों और दवा विक्रेताओ की योजना से सम्बद्धता खत्म की गई। अब चूंकि सख्ती की जा रही है और भुगतान में देर हो रही है तो योजना का लाभ पाना ही मुश्किल हो गया है।
कुछ ऐसी ही स्थिति सरकारी स्वास्थ्य बीमा योजना की भी है। इसे कभी भामाशाह योजना के नाम से चलाया जाता है, कभी मुख्यमंत्री स्वास्थ्य बीमा योजना के नाम से और अभी यह मुख्यमंत्री आयुष्मान आरोग्य योजना के नाम से चल रही है। इसके तहत प्रदेश के करीब 30 हजार से ज्यादा अस्पतालों में लोगों को 25 लाख रुपए तक का कैशलैस इलाज उपलब्ध कराया जाता है। चूंकि इस योजना के लाभार्थियों का दायरा बड़ा है और कई छोटे अस्पताल चल ही इसी योजना के भरोसे रहे है, इसलिए इसके क्रियान्वयन को लेकर बहुत ज्यादा शिकायतें नहीं है, लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि इस योजना के लाभार्थी जब किसी बड़े अस्पताल में जाते हैं तो दोयम दर्जे के व्यवहार का शिकार होते हैं और जिस उम्मीद के साथ इलाज के लिए जाते हैं, वह उन्हें नहीं मिल पाता है।
आखिर इस घालमेल की जरूरत क्या है
इन बड़ी योजनाओं के क्रियान्वयन की हकीकत देखने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि आखिर सरकारी योजना में निजी क्षेत्र का घालमेल करने की जरूरत क्या है? क्या सरकार अपने स्तर अपनी चिकित्सा व्यवस्था को इतना बेहतर नहीं बना सकती कि उसे निजी क्षेत्र के सहारे की जरूरत ही नहीं पड़े?
दरअसल यह बात तो सही है कि हमारे देश की जनसंख्या को देखते हुए हर व्यक्ति तक स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाएं सिर्फ सरकारी माध्यमों से पहुंचाना सम्भव नहीं है, इसीलिए निजी क्षेत्र की जरूरत है और हमेशा बनी भी रहेगी। लेकिन, हम देख रहे हैं कि निजी क्षेत्र को शामिल करते हुए सरकार की योजना चलाया जाना अपेक्षित लाभ नहीं दे रहा है और सुविधा के बजाए समस्या का कारण बन रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि निजी क्षेत्र लाभ के सिद्धांत पर काम करता है। उसकी अपनी आर्थिक और वित्तीय व्यवस्थाएं होती हैं। सरकार के लिए स्वास्थ्य सेवा का माध्यम हो सकता है, लेकिन निजी क्षेत्र के लिए अब यह उद्योग का रूप ले चुका है जहां भारी-भरकम निवेश किया जाता है। ऐेसे में निजी क्षेत्र से लाभ के सिद्धांत को परे रखते हुए काम करने की उम्मीद रखना बहुत हद तक बेमानी है और यही कारण है कि सरकार के इन योजनाओं के प्रयोग दो विपरीत विचारों को मिलाने की एक विफल कोशिश के रूप में सामने आ रहे हैं।
विभिन्न सरकारी योजनाओं का मूल्यांकन और अध्ययन करने वाली संस्था शिवचरण माथुर सोशल पॉलिसी एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट के निदेशक मनीष तिवारी का मानना है कि सरकार के पास संसाधन पर्याप्त नहीं होते हैं और इसीलिए उसे निजी क्षेत्र के सहारे की जरूरत होती है। लेकिन, सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि सरकार चलाने वाले लोग निजी क्षेत्र को योजना से जोड़ने के साथ ही कुछ अनुचित अपेक्षाएं रखना शुरू कर देते हैं और यहीं से उस नेक्सस का निर्माण होता है जो अच्छे उद्देश्य से शुरू की गई योजना को भी बर्बाद कर देता है। इसके अलावा विभाग चलाने वालों के लगातार तबादले भी एक समस्या है। हर अधिकारी विभाग और योजनाओं को अपने तरीके से चलाना चाहता है। आरजीएचएस के मामले में तो सरकार, निजी क्षेत्र और लाभार्थी तीनों ने ही इसका अनुचित फायदा उठाने की कोशिश की और इसी कारण यह योजना अब परेशानी का कारण बन गई है।
उपाय क्या है
निजी क्षेत्र के महत्व को नकारा नहीं जा सकता है। यह ना सिर्फ रोजगार देता है, बल्कि पूंजी निर्माण भी करता है, लेकिन इसे सरकारी योजना से जोड़ने के बजाए ज्यादा बेहतर होगा कि इसे अपने हिसाब से काम करने दिया जाए और सरकार अपनी योजनाओं को अपने दम पर ही चलाए। मसलन आरजीएचएस की ही बात की जाए तो इससे पहले सरकाारी अधिकारियों और कर्मचारियों के उपचार के लिए उनके मेडिकल बिलों के पुनर्भरण की व्यवस्था लागू थी। यह व्यवस्था वर्षो से चल रही थी और इसमे बहुत ज्यादा परेशानी नहीं थी। कर्मचारी सरकारी या निजी अस्पतालो में उपचार कराता था और सरकार निर्धारित दरों पर उसके मेडिकल बिलों का पुनर्भरण कर देती थी। आरजीएचएस की मौजूदा स्थिति को देखते हुए ज्यादातर कर्मचारी चाहते हैं कि पुरानी व्यवस्था फिर से लागू कर दी जाए। इसमें पुनर्भरण में समय लगता था, लेकिन कम से कम उपचार मिल जाता था।
कुल मिला कर मुद्दा यह है कि सरकार यदि वास्तव में जनता तक योजनाओं का सही ढंग से लाभ पहुंचाना चाहती है, अपनी योजनाओं को अपने ही दम पर संचालित करे, क्योंकि जितना पैसा इन योजनाओं को चलाने के लिए निजी क्षेत्र को दिया जा रहा है या मॉनिटरिंग पर खर्च हो रहा है, उतने में तो सरकार स्वयं इन योजनाओं को चला सकती है। सरकार के पास पैसे और संसाधन दोनो की ही कमी नहीं है और अब तो तकनीक का साथ भी है जो सरकारी पैसे का सही उपयोग सुनिश्चित कर सकती है। वहीं निजी क्षेत्र पर कुछ नियामक प्रतिबंध लागू किए जा सकते हैं ताकि आम आदमी निजी क्षेत्र की लाभ की अंधी चाहत का शिकार ना बने।
आरजीएचएस योजना आंकड़ों में
– पूर्ववर्ती सरकार के समय लाभार्थियों की संख्या- 12 लाख 35 हजार
– मौजूदा सरकार के समय लाभार्थियों की संख्या – 13 लाख 61 हजार
– उपचार पैकेजों की संख्या 3,367
– पूर्ववर्ती सरकार में सम्बद्ध अस्पताल – 1500
– मौजूदा सरकार में सम्बद्ध अस्पताल – 1,729
– पिछली सरकार के समय सम्बद्ध फार्मेसी – 4,266
– मौजूदा सरकार में सम्बद्ध फार्मेसी – 4,875
– पूर्ववर्ती सरकार में अस्पतालों और फार्मेसी को भुगतान – 4,522 करोड़ रुपए
– मौजूदा सरकार में अस्पतालों और फार्मेसी को भुगतान – 7225 करोड़ रुपए







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