सम्राट की सरकार में परिवार की अमरबेल
बिहार में सम्राट चौधरी सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार ने जहां जातीय और सामाजिक समीकरणों को साधने की कोशिश दिखाई, वहीं परिवारवाद को लेकर भाजपा की पुरानी राजनीतिक लाइन पर भी सवाल खड़े कर दिए। पूर्व...

सामाजिक संतुलन और सत्ता साधना के बीच परिवारवाद पर उठते सवाल
बिहार में सरकार गठन के 22 वें दिन सम्राट चौधरी सरकार का मंत्रिमंडल विस्तार किया गया। इसमें 32 नये सदस्यों को मंत्री पद की शपथ दिलाई गई। सात लोग पहली बार मंत्री बने। इनमें दो किसी सदन के सदस्य नहीं हैं। उन्हें छह माह के भीतर किसी सदन का सदस्य बनना होगा।
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आमतौर पर चाल, चरित्र और चेहरा की दुहाई देने वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की अगुवाई में बनी इस सरकार में सामाजिक और जातीय समीकरणों पर पूरा फोकस किया गया है। साथ ही लालू यादव, सोनिया गांधी, स्व करुणानिधि, स्व. मुलायम सिंह यादव, भूपेन्द्र सिंह हुड्डा, दिग्विजय सिंह आदि पर परिवारवाद का आरोप लगाने वाली भाजपा की इस सरकार में राजनीतिक परिवार की अमरबेल पूरी तरह लहलहा रही है। कैसे? बताते हैं।
बिहार में पहली बार किसी सरकार में तीन-तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों के बेटों को मंत्री बनाया गया है। इनमें पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे राज्य के स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार तो हैं ही, पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान केन्द्रीय सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्धम (एमएसएमई) मंत्री जीतनराम मांझी के पुत्र लघु जल संसाधन मंत्री डॉ संतोष कुमार सुमन और पूर्व मुख्यमंत्री स्व. डॉ जगन्नाथ मिश्र के पुत्र नगर विकास और आवास तथा सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री नीतीश मिश्र शामिल हैं। इनमें से निशांत अभी किसी सदन के सदस्य नहीं हैं। संभवतः वह अपने पिता नीतीश कुमार द्वारा खाली की गई विधान परिषद की सीट से सदस्य बन जाएंगे।
अन्य नेता पुत्रों में स्वयं मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पूर्व मंत्री शकुनि चौधरी के और उप मुख्यमंत्री विजय चौधरी पूर्व विधायक स्व. जगदीश प्रसाद चौधरी के पुत्र हैं। राज्य के खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों के मंत्री डॉ अशोक चौधरी बिहार कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे पूर्व मंत्री महावीर चौधरी के पुत्र हैं तो राज्य के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश पूर्व केन्द्रीय मंत्री और राष्ट्रीय लोक मोर्चा (रालोमो) के अध्यक्ष उपेन्द्र कुशवाहा के पुत्र हैं। निशांत के तरह दीपक प्रकाश भी किसी सदन के सदस्य नहीं हैं। इससे पहले नीतीश कुमार की सरकार में भी वह बिना किसी सदन के सदस्य रहे करीब पांच माह तक मंत्री बने थे। राजनीतिक गलियारे में चर्चा है कि गृहमंत्री अमित शाह उपेन्द्र कुशवाहा की पार्टी का भाजपा में विलय कराना चाहते हैं। वह नहीं चाहते कि कुशवाहा समाज से मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के अलावा कोई दूसरा नेता उसी समाज का ताकतवर हो। इसी सौदे के तहत दीपक प्रकाश को दोबारा बिना किसी सदन की सदस्यता के मंत्री बनाया गया है। हालांकि उपेन्द्र कुछ और भी मोलभाव करने पर आमादा हैं। देखना दिलचस्प होगा कि दोनों में से कौन बाजी मारता है। इसी तरह राज्य की उद्योग और खेल मंत्री श्रेयसी सिंह पूर्व केन्द्रीय मंत्री स्व दिग्विजय सिंह की पुत्री हैं तो राज्य की पिछड़ा वर्ग एवं अति पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री रमा निषाद पूर्व केन्द्रीय मंत्री स्व. कैप्टन जयनारायण निषाद की पतोहू और पूर्व सांसद अजय निषाद की पत्नी हैं।
भाजपा ने स्पष्ट की अपनी रणनीति
राज्य में मिथिलेश तिवारी, इंजीनियर शैलेन्द्र, रामचन्द्र प्रसाद, नंदकिशोर राम को मंत्री बनाकर भाजपा ने अपनी रणनीति साफ़ कर दी है कि पार्टी अब पुराने और जमे- जमाए नेताओं के सहारे नहीं रहना चाहती। लंबी पारी के लिए उसे नये चेहरों को आगे लाना होगा। इन्हें पहली बार मंत्री पद से नवाजा गया है। निशांत और दीपक प्रकाश को मंत्री बनाना भाजपा की सोची-समझी चाल है। श्वेता गुप्ता को जदयू कोटे से पहली बार मंत्री बनाया गया है। वह पहली बार की विधायक भी हैं। पेशे से डॉक्टर हैं और बनिया समुदाय से आती हैं।
जानकार तो यह भी कहते हैं कि निशांत को मंत्री बनाने में भी अमित शाह का ही हाथ रहा है। शाह के कहने पर ही जनता दल यूनाईटेड (जदयू) के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा और केन्द्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह निशांत की चौतरफा घेराबंदी में लगे थे। पहले उप मुख्यमंत्री पद का ऑफर दिया गया था। लेकिन निशांत नहीं माने थे। वह पार्टी संगठन को मजबूत करना चाहते थे। अब बिजेन्द्र यादव के जीवित रहते उनके उप मुख्यमंत्री बनने की संभावना नहीं है। मंत्री बनकर ही रहना होगा, क्योंकि बिजेन्द्र यादव को हटाने पर पार्टी में विद्रोह की आशंका है।
बिहार पर एकछत्र राज की कोशिश में भाजपा..!
दरअसल, नीतीश कुमार को कुर्सी से बेदखल करने के बाद भाजपा की पूरी कोशिश बिहार में एकछत्र राज करने की है। महाराष्ट्र और हरियाणा के उदाहरण से यह समझा जा सकता है। भाजपा ने पहले जिनके बूते पर सरकार बनाई, उन्हें ही समय आने पर बेदखल कर दिया। पार्टियों की बात की जाए तो इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो), बहुजन समाज पार्टी (बसपा), अकाली दल, बीजू जनता दल (बीजद) की बर्बादी इस बात की तस्दीक करते हैं। अब बिहार में जनता दल यूनाईटेड (जदयू), हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) और राष्ट्रीय लोक मोर्चा (रालोमो) की बारी है। भाजपा को पता है कि नीतीश कुमार अपने बेटे निशांत के सहारे जदयू को मजबूत बनाए रखना चाहते हैं। इसीलिए निशांत को सरकार में शामिल कर उनके राजनीतिक मूवमेंट पर विराम लगा दिया गया है। अब वे सरकारी फाइलों में उलझे रहेंगे। जदयू के संगठन पर ध्यान नहीं दे पाएंगे।
आखिर क्यों विवश है नीतीश
ऐसा नहीं है कि राजनीति के माहिर खिलाड़ी नीतीश कुमार भाजपा के इस खेल से अनभिज्ञ हैं। वह सारी बात समझते हैं, लेकिन विवश हैं। कारण, 7 सर्कुलर रोड का बंगला है, जिसे नीतीश ने अपने रहने लायक बनाया है। मुख्यमंत्री आवास छोड़ने के बाद नीतीश उसी बंगले में शिफ्ट हो गए हैं। वह बंगला राज्य के किसी मंत्री के नाम पर ही आवंटित हो सकता है। राज्य में पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी आवास एलाट करने का अब प्रावधान नहीं है। पहले होता था। अब अदालत ने रोक लगा रखी है। ऐसे में नीतीश अपने बेटे को मंत्री बनाकर ही वह बंगला अपने पास रख सकते हैं।
बहरहाल, सम्राट सरकार का असली लिस्मस टेस्ट तो राज्य में बढ़ती बेरोजगारी, कानून व्यवस्था ठीक करने, शिक्षा व्यवस्था दुरुस्त करने, चिकित्सा की लचर व्यवस्था को पटरी पर लाने, बाढ़ नियंत्रण का उपाय करने और विकास कार्यों को पटरी पर लाने की है, क्योंकि राज्य का खजाना खाली है और जंगलराज की स्थिति है। उसी जंगलराज की जिसका नाम लेकर नीतीश लगभग 20 वर्षों तक सत्ता के शिखर पर बैठे रहे।





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