राहुल की शर्त, विजय का सफर
कभी कांग्रेस में शामिल होने की इच्छा लेकर दिल्ली पहुंचे अभिनेता थलपति विजय को संगठनात्मक राजनीति की कसौटी पर खुद को साबित करने की सलाह मिली थी। वर्षों बाद वही विजय तमिलनाडु की राजनीति में ऐसे जननायक...

सिनेमा से सियासत तक : तमिलनाडु में बदलते राजनीतिक समीकरणों की दिलचस्प कहानी
साल 2009…
दिल्ली की राजनीति अपने चरम पर थी। यूपीए दोबारा सत्ता में लौट चुकी थी। मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे और कांग्रेस के गलियारों में एक ही नाम गूंज रहा था, राहुल गांधी। उन्हें भविष्य का सबसे बड़ा नेता माना जा रहा था।
उसी दौर में दक्षिण भारत से एक युवा सुपरस्टार चुपचाप दिल्ली पहुंचता है। चेहरे पर आत्मविश्वास, आंखों में राजनीति का सपना और पीछे करोड़ों प्रशंसकों की दीवानगी।
नाम विजय।
तमिल सिनेमा का चमकता सितारा, जिसे लोग “थलपति” कहने लगे थे। लेकिन यह दौरा फिल्मों का नहीं, राजनीति का था।
विजय अपने पिता एस.ए. चंद्रशेखर और कांग्रेस नेता गोपीनाथ पलनीयप्पन के साथ दिल्ली आए थे। कहा जाता है कि उनकी सिर्फ एक छोटी-सी इच्छा थी, कांग्रेस का सदस्य बनना।
न कोई टिकट…
न कोई मंत्री पद…
न कोई खास मांग।
बस कांग्रेस में एंट्री।
दिल्ली में एक मुलाकात तय हुई। राहुल गांधी और विजय आमने-सामने बैठे। कमरे में मौजूद लोगों को शायद अंदाजा भी नहीं था कि यह मुलाकात आने वाले वर्षों की राजनीति का एक दिलचस्प अध्याय बन जाएगी।
विजय को उम्मीद थी कि कांग्रेस इतनी बड़ी लोकप्रियता वाले चेहरे का स्वागत खुले दिल से करेगी। आखिर दक्षिण भारत में उनकी फैन फॉलोइंग किसी राजनीतिक लहर से कम नहीं थी।
लेकिन तभी कहानी ने मोड़ लिया। राहुल गांधी ने विजय से कहा कि अगर राजनीति में आना है, तो पहले यूथ कांग्रेस का चुनाव लड़िए, खुद को साबित कीजिए।
कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया। विजय शायद यह सुनने की उम्मीद नहीं कर रहे थे। वे राजनीति में प्रवेश चाहते थे, लेकिन छात्र राजनीति की सीढ़ियों से शुरुआत उन्हें मंजूर नहीं था।
कहा जाता है कि उस समय कांग्रेस की सहयोगी डीएमके भी नहीं चाहती थी कि विजय जैसा बड़ा चेहरा कांग्रेस में आए।
क्या राहुल पर दबाव था?
क्या यह सिर्फ संगठनात्मक नियम था?
या फिर कांग्रेस उस समय विजय की राजनीतिक ताकत को समझ ही नहीं पाई?
इन सवालों का जवाब आज भी पूरी तरह साफ नहीं है।
मुलाकात खत्म हुई।
विजय दिल्ली से वापस चेन्नई लौट गए। राजनीति का सपना ठंडे बस्ते में चला गया, लेकिन कहानी खत्म नहीं हुई थी।
अगले कुछ वर्षों में विजय का स्टारडम और बढ़ता गया।
उनकी फिल्मों के डायलॉग राजनीति जैसे लगने लगे।
फैंस उन्हें सिर्फ अभिनेता नहीं, भविष्य का नेता मानने लगे।
हर फिल्म रिलीज किसी चुनावी रैली जैसी दिखाई देने लगी।
फिर एक दिन…
विजय ने अपनी पार्टी बना ली, तमिलगा वेत्री कड़गम (TVK)।
तमिलनाडु की राजनीति, जो दशकों से द्रमुक और अन्नाद्रमुक के बीच घूमती रही थी, अचानक बेचैन हो उठी। रैलियों में उमड़ती भीड़ ने संकेत दे दिया कि विजय अब सिर्फ फिल्म स्टार नहीं रहे।
और यहीं कहानी का सबसे बड़ा ट्विस्ट आया। जिस कांग्रेस में शामिल होने के लिए कभी विजय थलपति दिल्ली के दरवाजे तक गए थे…
आज उसी कांग्रेस के नेताओं के बीच चर्चा होने लगी,
क्या विजय के साथ गठबंधन होना चाहिए?
विजय के पिता एस.ए. चंद्रशेखर ने हाल ही में कांग्रेस को संदेश दिया, “विजय के साथ आइए… वह आपको वह ताकत वापस दिला सकते हैं, जो आपने खो दी है।” यह बयान सिर्फ एक राजनीतिक सलाह नहीं था… यह वक्त का सबसे बड़ा व्यंग्य था।
कभी कांग्रेस के दरवाजे पर खड़े विजय को खुद को साबित करने की सलाह दी गई थी। आज वही विजय तमिलनाडु की राजनीति में ऐसी ताकत बन चुके हैं, जिनके साथ आने में राष्ट्रीय दल अपना भविष्य देख रहे हैं।
राजनीति सचमुच फिल्मों से ज्यादा नाटकीय होती है। और इस कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा शायद अभी बाकी है।





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