कविता के बदलते स्वरूप और मंच से बाजार तक उसकी यात्रा पर तीखा मंथन
दिनेश सिंदल,
कवि, लेखक
पहले जब किसी शहर में कवि सम्मेलन होता था तो मांएं अपने बच्चों के लिए कहती थीं कि आज बिना कॉपी पेंसिल के इन्हें शिक्षा मिलेगी। कवि सम्मेलन एक स्कूल हुआ करते थे जो संस्कार सिखाते थे। अपनी संस्कृति से परिचय करवाते थे। अपनी जड़ों से जोड़ते थे।
इसका एक कारण ये भी था कि आयोजक कोई शिक्षण संस्थान, या कोई साहित्य प्रेमी होता था। आज की तरह कोई राजनीतिक पार्टी या किसी पार्टी का एमएलए-एमपी नहीं। उस समय कविता सिर्फ मनोरंजन का विषय ही नहीं थी, आत्ममंथन भी करती थी। जिस तरह नौ रसों में एक हास्य रस भी है, उसी तरह मंच पर नौ कवियों में एक हास्य कवि भी हुआ करता था। आजकल कवि का मतलब ही हंसाने वाला हो गया। विदूषक हो गया। और उस हंसाने वाले कवि के पास हास्य कविता नहीं है, वह स्वयं हास्यास्पद बनकर जनता का मनोरंजन करता है।
तालियों और वाह-वाह के चक्कर में कवि जनता के स्तर तक नीचे उतर आता है। जबकि होना यह चाहिए था कि वह जनता का स्तर ऊपर उठा कर अपनी कविता के स्तर तक ले आए। कवि सम्मेलन विशुद्ध मनोरंजन हो गया। लाफ्टर और स्टैंड अप कॉमेडियन कविता के मंचों पर आ गए। कविता धीरे-धीरे मंच से दूर होती चली गई।
मंच पर कविता कम, अभिनय ज्यादा
बात के जादू धरे रह जाएंगे
मंच पर कुछ मसखरे रह जाएंगे।
दौर में खोटे चलेंगे दोस्तों
गांठ के सिक्के खरे रह जाएंगे।।
लोकतंत्र की इस भीड़-प्रधान व्यवस्था में अब कलाओं का मूल्यांकन भी भीड़ ही करने लगी है। जिसके जितने ज्यादा फॉलोअर्स वह उतना बड़ा कवि। जिसके ज्यादा सब्सक्राइबर उसका लिफाफा उतना ही मोटा। जब भीड़ निर्णय करेगी तो वहां कविता की तो उम्मीद ही नहीं की जा सकती।
इसीलिए कवि भी कविता पर नहीं अपने लाइक्स और अपने फॉलोवर्स बढ़ाने पर ज्यादा मेहनत करते हैं। सोशल मीडिया ने कवि को एक्टर बना दिया। इसलिए मंच पर कविता कम अभिनय ज्यादा दिखता है।
आज कविता दो भागों में विभाजित हो गई है। एक वो जो जनता का मनोरंजन कर के बाजार ढूंढ रही है। दूसरी वो जो कविता के नाम पर खालिश विचार होकर किताबों में दम तोड़ रही है।
पहली तरह के लोग मंचों पर आ गए। इन्होंने अपने परफॉर्मेंस पर वर्क किया। जनता के मनोविज्ञान को समझते हुए उसके मनोरंजन पर ध्यान दिया। ये जन्म दिन, मरण दिन, शादी- ब्याह आदि सभी अवसरों पर कविता पढ़ सकते हैं। किसी की भी जयंती और पुण्यतिथि पर अपने चुटकलों को कविता कह कर फिट कर सकते हैं।
परसाई जी कहते हैं न कि आज कवि-सम्मेलनों में या तो गाना जमता है या गाली। क्योंकि ये दोनों ही समझ में आते हैं। इन दोनों के पार जो कविता नाम की चीज है वह अगर सुनाई जाए तो कवि हूट कर दिया जाएगा। परिणाम यह हो रहा है कि कवि स्वर साधना अधिक करता है, काव्य साधना कम। क्योंकि उसे मंच पर जाना है और अच्छे कवियों की मट्टी पलीद करना है।
वह नट की तरह झूम झूमकर पढ़ता है। ये न छायावादी कवि हैं, न ही प्रयोगवादी, न प्रगतिवादी। ये कंठवादी कवि हैं।
बुद्धिजीवी या अवसरवादी?
दूसरी तरह का वर्ग अपने आपको बुद्धिजीवी कहता है। बुद्धिजीवी वह होता है जो सत्ता या व्यवस्था के निकट रहकर उसकी विचारधारा का समर्थन करता है। और ऐसा करने वाला पौरुषहीन, वीर्यहीन हो तभी वो ठीक से रक्षा कर सकता है। यह भी न प्रतिवादी, न प्रयोगवादी, न जनवादी, यह बस अवसरवादी है। जहां अपना निजी लाभ दिखा उधर रुख किया।
इनमें अधिकतर हिंदी की नौकरी करने वाले लोग हैं। हिंदी की नौकरी करते-करते वे अपने को हिंदी का कवि- साहित्यकार समझने लग जाते हैं। वे भूल जाते हैं कि सरकारी या विश्वविद्यालय की नौकरी पाने के पीछे कई अन्य कारण भी होते हैं। आपका आरक्षित कोटा, आपका राजनीतिक झुकाव, विश्वविद्यालय के अध्यापकों के बीच की गुटबाजी आदि।
हिंदी के अध्यापक बनने के बाद ये अपने को हिंदी का कवि भी समझने लग जाते हैं। ये इनकी मजबूरी भी है। क्योंकि सरकारी आयोजनों में ‘तू मुझे सहयोग कर, मैं तुझे सहयोग दूं’ के तहत इन्ही को बुलाया जाता है। लेकिन जब ये वहां कविता पढ़ते हैं तो उपस्थित श्रोताओं को निराश ही करते हैं। क्योंकि श्रोताओं पर तो कोई बंदिश नहीं होती कि आरक्षण से आए कवि को अतिरिक्त उदारता से सुना जाए। उसके लिए तैंतीस प्रतिशत ज्यादा वाह- वाह की जाय। वह तो बेचारा कविता ढूंढता है और निराश होता है।
ये अपने निजी लाभ के लिए सरकारों का मूंह ताकते रहते हैं। किसी अकादमी का कोई पद मिल जाए। कोई पुरस्कार मिल जाए। किसी सरकारी पत्रिका का संपादन ही मिल जाए।
सरकारी योजनाओं के लाभ, पद और पुरस्कार के लिए ये अपने स्वाभिमान तक को बेच देते हैं। ये किसी भी देशद्रोही, आतंकवादी की पैरवी कर सकते हैं, उसके पक्ष में खड़े हो सकते हैं। इन्हें बुद्धिजीवी बने रहना है। अतः जो हो रहा है उसका इन्हें विरोध करना है। कविता यहां भी नहीं मिलती।
शेर जब सिक्कों में ढल कर आ गए
हम अदब से दूर चलकर आ गए
बात तो दिल को बदलने की हुई
आप तो कपड़े बदल कर आ गए
हम कविता को ढूंढने निकले थे- मंच के प्रपंच से निराश होकर, विश्वविद्यालय की जटिलताओं से बचते हुए- बाजार आ गए। यहां कविता हंसती मुस्कुराती मिली। कहीं वह कोई विज्ञापन लिख रही थी, कहीं वह नारे लिख रही थी, कहीं पोस्टर। कहीं किसी नेता-मंत्री का भाषण लिख रही थी तो कहीं किसी पार्टी का बैनर। हमने भी एक बैनर उठाया। और नारा लगाया- कविता जिंदाबाद।







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