सावधान, ई-रसीद धारी यातायात पुलिस मुस्तैद हैं
राज्य के अधिकांश शहरों में प्रायः हर चौराहे पर ई-रसीद की मशीन लिए यातायात पुलिसकर्मी मुस्तैद खड़े नजर आते हैं। लगता है जैसे उनका प्रमुख कार्य अब यातायात को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि चालान काटकर...

क्या भटक रही है यातायात पुलिस की प्राथमिकता?
राकेश गांधी,
वरिष्ठ पत्रकार
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प्रदेश में यातायात व्यवस्था के हालात सुधरने की बजाए भयावह होते जा रहे हैं। राजस्थान में न केवल राजधानी, बल्कि जोधपुर समेत विभिन्न जिलों के भी कमोबेश ये ही हालात हैं। बेहतर व्यवस्था के जिम्मेदार यातायात पुलिस का ध्यान फिलहाल तो मुख्य रूप से चालान बनाने और राजस्व संग्रह पर केंद्रित दिखाई देता है। यह स्थिति सड़क सुरक्षा के मूल उद्देश्य से भटकाव का संकेत ही मान सकते हैं। राज्य के अधिकांश शहरों में प्रायः हर चौराहे पर ई-रसीद की मशीन लिए यातायात पुलिसकर्मी मुस्तैद खड़े नजर आते हैं। लगता है जैसे उनका प्रमुख कार्य अब यातायात को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि चालान काटकर राजस्व संग्रह करना रह गया है। इनका ध्यान ट्रैफिक को सुगम बनाने या हादसों को रोकने की बजाय इस बात पर अधिक होता है कि कौन बिना हेलमेट है, किसने ज़ेब्रा क्रॉसिंग पार की, या किसने गाड़ी कुछ इंच ज़्यादा आगे बढ़ा ली है।
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कई बार तो चालान से बचने के लिए भागने वाले को ये पुलिस ऐसे पकड़ने दौड़ती है, जैसे वह कोई मर्डर करके आया कोई अपराधी हो। ऐसी पकड़म-पकड़ाई भी कई बार भयावह हादसों को निमंत्रण देती है। अब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या पुलिस का दायित्व जनता को सुरक्षा देना है या केवल उनसे राजस्व वसूली करना?
जहां चालान कम व यातायात बेहतर, वो ही जिला श्रेष्ठ
किसी भी राज्य की ट्रैफिक पुलिस का मूल उद्देश्य दुर्घटनाओं में कमी लाना, सुगम यातायात व्यवस्था बनाना, और लोगों में ट्रैफिक नियमों के प्रति चेतना जगाना होना चाहिए। यदि चालान एकमात्र साधन बन जाए और सुरक्षा पीछे छूट जाए, तो यह नीति एकतरफा हो जाती है। बेहतर यातायात प्रबंधन के लिए जिलों को सम्मानित किए जाने की जरूरत है, लेकिन वो भी तब जब किसी जिले में पूरे वर्ष के दौरान बहुत कम चालान काटे गए, लेकिन सड़क हादसे भी न्यूनतम रहे। यह बेहतर प्रबंधन का सूचक है। ऐसे जिले को यातायात व्यवस्था में अव्वल माना जाना चाहिए, ना कि उस जिले को जिसमें सबसे अधिक चालान काटे गए हों।
बढ़ते सड़क हादसे
राजस्थान में सड़क दुर्घटनाओं काफी वृद्धि बताई जा रही है, जबकि मौतों में भी लगातार इजाफा हुआ है। जयपुर और जोधपुर जैसे प्रमुख शहरों में यह स्थिति और भी चिंताजनक है। मार्च 2025 तक राजस्थान में सड़क दुर्घटनाओं की संख्या में 5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। विशेष रूप से दोपहिया वाहनों से संबंधित दुर्घटनाओं में उल्लेखनीय इजाफा हुआ है। एक अध्ययन के अनुसार, 2023 में हुई सड़क दुर्घटनाओं में 83 प्रतिशत मौतों का कारण ओवरस्पीडिंग था, और 61 प्रतिशत मरने वाले या तो पैदल यात्री थे या फिर दोपहिया वाहन चालक।
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चालान और राजस्व संग्रह
राजस्थान में यातायात पुलिस द्वारा जारी किए गए ई-चालानों की संख्या में मार्च 2025 तक अनुमानतः 7 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जिससे 1,500 करोड़ रुपए का राजस्व प्राप्त हुआ है। जयपुर में 2024 की पहली तिमाही में 3,79,697 चालान जारी किए गए, जबकि परिवहन विभाग ने 3,06,195 चालान जारी किए।
प्राथमिकता का पुनर्मूल्यांकन
वर्तमान प्रणाली में यातायात पुलिस का ध्यान मुख्य रूप से चालान जारी करने और राजस्व संग्रह पर केंद्रित है। हालांकि, यह दृष्टिकोण सड़क सुरक्षा के मूल उद्देश्य से भटक सकता है। यदि पुलिस का प्राथमिक लक्ष्य चालान की संख्या बढ़ाना हो, तो यह सड़क सुरक्षा में सुधार के बजाय राजस्व संग्रह का माध्यम बन सकता है।
समाधार की दिशा में प्रयास जरूरी
– यातायात नियमों के प्रति जनता को जागरूक करने के लिए नियमित अभियान चले
– स्मार्ट ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम और सीसीटीवी कैमरों का उपयोग कर नियमों के उल्लंघनों की निगरानी हो
– जिन जिलों में कम चालान और बेहतर यातायात व्यवस्था हो, उन्हें पुरस्कृत किया जाए
– हादसों के आंकड़ों का विश्लेषण कर उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान कर वहां विशेष व्यवस्था की जाए
– स्कूल, कॉलेज के विद्यार्थियों और अन्य वाहन चालकों के लिए ट्रैफिक नियमों की नियमित ट्रेनिंग हो
– नरमी से समझाइश की संस्कृति विकसित हो
– हर चालान का रिकॉर्ड सार्वजनिक हो, और यदि किसी को अनुचित लगे, तो उसे चुनौती देने का ऑनलाइन प्लेटफॉर्म मिले
– इन्फ्रास्ट्रक्चर में सुधार के क्रम में सड़क किनारे संकेत, ट्रैफिक लाइट, ज़ेब्रा क्रॉसिंग आदि का उन्नयन ज़रूरी
– जिलों का मूल्यांकन चालान की संख्या से नहीं, दुर्घटनाओं की संख्या, ट्रैफिक की सहजता और जनता की संतुष्टि के आधार पर हो






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