जोधपुर स्थापना दिवस विशेष
राजेन्द्रसिंह लीलियां,
पीआरओ, उम्मेद भवन पैलेस
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मारवाड़ के इतिहास में जोधपुर के संस्थापक राव जोधा एक वीर योद्धा, रणनीतिकार, दूर दृष्टि सोच, कुशल कूटनीतिज्ञ व धैर्यवान के रूप में स्मरण किए जाते हैं। उन्होंने मध्ययुगीन प्रतिरक्षा प्रणाली और सामरिक दृष्टि से मंडोर को राजधानी के रूप में असुरक्षित माना और चिड़ियानाथजी की टूक पर 12 मई 1459 को एक सुदृढ़ किले का शिलान्यास किया जो महरानगढ़ दुर्ग के नाम से जाना जाता है। साथ ही जोधपुर शहर को नई राजधानी बनाकर स्थापित किया।
दरअसल राव जोधा से ही जोधपुर की ऐतिहासिक शौर्य यात्रा प्रारंभ होती है। मारवाड़ के शासक राव रणमल के पुत्र राव जोधा का जन्म 28 मार्च, 1415 भादवा बदी 8, विक्रम संवत 1472 में हुआ। राव जोधा जोधपुर के प्रथम प्रतापी शासक थे। उनका जीवन कठिनाइयां, चुनौतियों और संघर्ष की अनूठी गाथा है। जोधा ने मारवाड़ में सुदृढ़ प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित की, जिसके कारण उनके वंशज निरंतर शासन करते रहे। राव जोधा ने युद्ध कौशल व कूटनीति- राजनीति अपने पिता राव रणमल से सीखी। राव रणमल अपने पिता राव चुंडा के देहांत के बाद 1423 ईस्वी में महाराणा लाखा की सेवा में मेवाड़ चले गए। बहन हंसा बाई का विवाह महाराणा लाखा के साथ कर देने के बाद मेवाड़ की राजनीति में राव रणमल का महत्व बढ़ गया। महाराणा लाखा की मृत्यु के बाद अल्प वयस्क पुत्र मोकल गद्दी पर बैठे तथा मेवाड़ राज्य का सारा प्रबंध राव रणमल देखने लगे। महाराणा मोकल की हत्या के बाद अल्प वयस्क कुंभा मेवाड़ की गद्दी पर आसीन हुए। राव रणमल के बढ़ते सैन्य व राजनीतिक प्रभाव से मेवाड़ में दरबारी षड्यंत्र में चित्तौड़ दुर्ग में 1428 में राव रणमल की हत्या कर दी गई। इन विषम परिस्थितियों में राव जोधा अपने सात सौ विश्वस्त साथियों के साथ मेवाड़ से मारवाड़ के लिए रवाना हो गए। रावत चूंड़ा के नेतृत्व में मेवाड़ की सेना ने राव जोधा का पीछा किया। कपासन के पास भीषण संघर्ष में राव जोधा के 200 सहयोगी मारे गए। इसके बाद सोमेश्वर के घाटे तक पहुंचते-पहुंचते चितरोड़ी, सतखंबा कनवज व केलवा में भी दोनों में संघर्ष हुआ। सोमेश्वर पहुंचने तक लड़ते-लड़ते राव जोधा के 250 योद्धा ही बचे। स्वामी भक्त राठौड़ योद्धाओं ने राव जोधा को सकुशल सुरक्षित मंडोर पहुंचने के लिए सात योद्धाओं के साथ रवाना किया। राव जोधा तो सकुशल पहुंच गए, लेकिन मंडोर भी सुरक्षित नहीं होने से जांगल की तरफ निकल गए, जहां काहुनी गांव को अपना ठिकाना बनाया।
मंडोर पर पुनः अधिकार
चितौड़ की सेना ने सोमेश्वर के बाद मण्डोर पर अधिकार करके चौकड़ी, मेड़ता, सोजत में भी अपनी सैन्य चौकियां स्थापित कर दी। काहुनी में राव जोधा को ढूंढने पर वह जांगल में चले गए। काफी संघर्ष के दौर से गुजरते हुए राव जोधा इधर-उधर अपने ठिकाने बदलते रहे। पिता राव रणमल की हत्या के समय मारवाड़ की शासन व्यवस्था अस्त-व्यस्त थी। जैतारण पर सिंधल राठौड़ों का अधिकार, सिवाना पर जैतमालोत शासन, खेड़ पर राव मल्लिनाथ के वंशजों तथा नागौर पर खानजादा के वंश का अधिकार था। इस पर राव जोधा ने धीरे-धीरे अपनी सैन्य ताकत बढ़ाई। गागरोन के शासक चाचिंग देव चौहान की पुत्री बरजांग के विवाह से उनकी मदद भी मिली। सेतरावा रावत लूणा ने भी सहयोग किया। इससे राव जोधा का आत्मविश्वास बढ़ता गया और सही मौका देखकर आक्रमण कर मंडोर पर पुनः अधिकार जमा लिया। साथ ही अन्य मेवाड़ी कब्जे की चौकियां चौकड़ी, कोसाना पर कब्जा किया। मेवाड़ी सेना को भगाकर सोजत के पास धनला में परास्त किया। लगातार 15 वर्षों के संघर्ष के बाद राव जोधा ने मारवाड़ को मेवाड़ से मुक्त कराकर 1453 में मंडोर पर पुन: आधिपत्य स्थापित किया। राव जोधा चित्तौड़ के महाराणा कुंभा से अपने पिता की हत्या का बदला लेना चाहते थे। महाराणा कुंभा भी अपने मेवाड़ी सामंतों के मारे जाने से अत्यंत क्रोध में थे। मेवाड़ की ओर से आक्रमण की सूचना मिलने पर राव जोधा अपने राठौड़ वीरों को साथ लेकर महाराणा की सेना से मुकाबला के लिए पाली से रवाना हुए। राव जोधा के पास अश्व कम थे, इसलिए राठौड़ वीर बैलगाड़ियों में आरूढ़ होकर चले, जिन्हें देखकर मेवाड़ी सेना बिना युद्ध किए ही लौट गई। राव जोधा अपने पिता की हत्या का प्रतिशोध लेना चाहते थे। उन्होंने चित्तौड़गढ़ पर चढ़ाई कर दुर्ग के द्वार जलाए और उस स्थान पर जाकर श्रद्धांजलि दी जहां उनके पिता रहते थे।
मंडोर के किले में राज्याभिषेक व विस्तार
1453 में मण्डोर के किले में राव जोधा का शास्त्रानुसार राज्याभिषेक हुआ। जोधा ने अपने पुत्र दूदा को भेज कर जैतारण पर कब्जा करवाया। छापर द्रोणमुख पर आधिपत्य किया, जो महत्वपूर्ण था। राव जोधा के अनुज कांधल लोदी वंश के प्रमुख सामन्त सारंग खां से युद्ध में मारे गए। बाद में राव जोधा ने सारंग खां को मार कर बदला लिया। इसके बाद मारवाड़ की सीमाएं हिसार तक जा पहुंची। उत्तरी भारत के प्रमुख राजाओं में राव जोधा की गिनती होने लगी। राव जोधा के पुत्र बीका द्वारा बीकानेर की स्थापना व राव दूदा व वरसिंग द्वारा मेड़ता की स्थापना प्रमुख घटनाएं रही। मण्डोर के बाद राव जोधा ने मेड़ता, फलोदी, पोकरण, सिवाना, पाली, सोजत, नाडोल, जैतारण, शिव, डीडवाना व गोडवाड़ का कुछ हिस्सा तथा नागौर पर अधिकार कर लिया। उत्तरी भारत की ओर विजय अभियान को पठानों ने रोक दिया।
सुदृढ़ साम्राज्य विस्तार
राव जोधा साहसी, वीर व कूटनीतिज्ञ थे। अपनी 73 वर्ष की अवस्था में 23 वर्ष तक पिता की सेवा में रहे तथा 15 वर्ष तक उन्हें विकट परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। उसके बाद 35 वर्ष तक अपने राज्य की उन्नति में लग रहे। उन्होंने सुदृढ़ साम्राज्य विस्तार किया व राज्य की सीमाओं को सुरक्षित किया। उस समय उनके अधिकार में मंडोर, जोधपुर, मेड़ता, फलोदी, पोकरण, महेवा, भाद्राजून, सोजत, गोड्वाड़ का कुछ भाग, जैतारण, शिव, सिवाना, सांभर, अजमेर और नागौर प्रांत का अधिकतर भाग था। बीकानेर और छापर-द्रोणापुर उनके पुत्रों के अधिकार में थे। उनके राज्य की पश्चिमी सीमा जैसलमेर तक, दक्षिणी सीमा अरावली तक और उत्तरी सीमा हिसार तक पहुंच गई थी।
मेवाड़ से संबंध सुधारने के लिए कूटनीति
कुशल कूटनीति के चलते मेवाड़ से रिश्ते सुधारने की नीति के तहत महाराणा कुम्भा से राजनीतिक सहयोग स्थापित करने के लिए अपनी पुत्री श्रृंगारदे का विवाह राणा कुम्भा के पुत्र रणमल के साथ किया। मारवाड़ मेवाड़ सम्बन्ध पुनः बेहतर बने। इसके बाद सोजत को सीमा निर्धारण का बिन्दु बनाया। राणा कुम्भा के उत्तराधिकारी उदा ने उन्हें अजमेर व सांभर पुनः सौंप दिए, ताकि पठानों के विरुद्ध संघर्ष में राव जोधा का सहयोग मिल सके।
राव जोधा के पुत्र
राव जोधा के पुत्र, सातल, सूजा, नीबा, दूदा, वरसिंग, बीका, बीदा, जोगा, शिवराज, करमसी, रायपाल, भारमल, जसवन्त, चांदराव, वणवीर, कूंपा, सावंतसी, रूप सिंह, लक्ष्मण, जगमाल व गोपाल दास थे। उन्होंने मारवाड़ का विशाल सामाज्य सुरक्षा व व्यवस्था के लिए अपने स्वजनों को सौंपा। उन्होंने सोजत अपने बड़े भाई को, मेड़ता पुत्र वीरसिंह, छापर द्रोणमुख अपने पुत्र बीका को, बीकाजी ने जांगल प्रदेश को जीतकर 1488 में बीकानेर में किले की स्थापना कर बीकानेर शहर बसाया। मध्ययुगीन राजस्थान में राव जोधा का उत्कर्ष उनकी उपलब्धियों का प्रमाण है। 50 वर्ष के कालखण्ड तक शासन करने के बाद वि.सं. 1545 की वैशाख सुदी पांचम, 16 अप्रैल, 1488 ई. को 73 वर्ष की उम्र में उनका स्वर्गवास हुआ।
मेहरानगढ़ दुर्ग की विरासत
राव जोधा द्वारा स्थापित मेहरानगढ़ दुर्ग आज भी जोधपुर की पहचान और गौरव का प्रतीक है। यह दुर्ग केवल स्थापत्य का उदाहरण नहीं, बल्कि उस युग की सामरिक समझ और दूरदर्शिता का भी प्रमाण है। महाराजा गजसिंह के मुख्य संरक्षण में वर्तमान में इसके संवर्धन के माध्यम से इतिहास, संस्कृति और पर्यटन को बढ़ावा दिया जा रहा है।







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