सलूंबर और प्रतापगढ़ जिलों में बीमारी बनी काल
राजस्थान के सलूंबर और प्रतापगढ़ जिलों में 15 दिन में बीमारी के कारण एक दर्जन से अधिक बच्चों की मौत न केवल गंभीर त्रासदी है, बल्कि देश के आदिवासी और दूरदराज के ग्रामीण इलाकों में चिकित्सा व्यवस्था की बदहाली का प्रमाण भी है। इन इलाकों में उपचार की समुचित व्यवस्था नहीं होने से मरीजों को इलाज के लिए जिला मुख्यालय तक जाना पड़ता है, खराब रास्तों के कारण यह काम भी आसान नहीं है। आपात चिकित्सा सुविधा या एंबुलेंस सेवाएं दूर‑दराज के इलाकों में अक्सर उपलब्ध नहीं होतीं। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टर नहीं होने, दवाओं की कमी और जांच मशीनों की अनुलब्धता के कारण सामान्य बीमारी में भी मरीज की मौत हो जाती है। बुनियादी ढांचे के अभाव और समय पर इलाज न मिलने से हाशिये पर रहने वाले लोगों की जान दांव पर लगी रहती है। सलूंबर और प्रतापगढ़ जिलों में बच्चों की मौत के मामले में भी यही स्थिति नजर आती है।
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सलूंबर और प्रतापगढ़ में हुई मौतों को अधिकारी “रहस्यमय बीमारी” या “अंधविश्वास” के नाम से ढकने की कोशिश करते दिखाई दिए। असली सवाल यह है कि आदिवासी बच्चों को सामान्य चिकित्सा सुविधा भी क्यों नहीं मिल पातीं। जब बच्चों की मौतें बढ़ती हैं, तो प्रशासन झोलाछाप डॉक्टरों के खिलाफ कार्रवाई करने और जांच‑सर्वे अभियान चलाने में लग जाता है, लेकिन जमीनी स्तर पर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की हालत सुधारने, नर्स‑डॉक्टर की उपलब्धता और दवाओं की नियमित सप्लाई जैसे मुद्दों की अनदेखी की जाती है।
क्या है मामला
सलूंबर और प्रतापगढ़ जिलों में अप्रेल की शुरूआत में “रहस्यमयी” बीमारी से प्रभावित बच्चों में तेज बुखार, उल्टी-दस्त और बेहोशी जैसे लक्षण दिखे। प्रतापगढ़ जिले के धरियावद- पारसोला क्षेत्र में भी ऐसे मामले सामने आए। सबसे पहले सलूंबर जिले के लसाड़िया ब्लॉक में बच्चे बीमार होने लगे। हालत बिगड़ने के बाद कुछ बच्चों को उदयपुर के एमबी अस्पताल में भी रेफर किया गया। सलूंबर और प्रतापगढ़ में कुल 13 बच्चों की मौत हुई। सलूंबर के घाटा गांव में दो, लालपुरा में तीन, कालीभीत और अमलोदा में एक- एक बच्चे की मौत हुई। प्रतापगढ़ के घटेला और भुंगा भट्ट में एक- एक बच्चे, धोली मगरी और महूड़ीखेड़ा में दो- दो बच्चों की मौत हुई है। बड़ी संख्या में बच्चों के बीमार होने और मौत की खबरों के बाद प्रशासन हरकत में आया। मेडिकल टीमों ने घर-घर सर्वे कर ब्लड सैंपल भी लिए। रहस्यमय बीमारी का लेबल चिपका कर प्रशासन अपनी जिम्मेदारी से बचता नजर आया। आश्चर्य की बात यह है कि इसे विपक्ष ने भी मुद्दा नहीं बनाया। आदिवासियों के लिए आवाज उठाने का दम भरने वाली भारतीय आदिवासी पार्टी की चुप्पी भी अखरने वाली है।
बदहाली के शिकार अदिवासी क्षेत्र
राज्य सरकार जयपुर में रिम्स जैसे बड़े चिकित्सा संस्थान विकसित करने पर ध्यान दे रही है। मेडिकल टूरिज्म की बातें भी की जा रही हैं, लेकिन दूर‑दराज के आदिवासी इलाकों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में अब भी डॉक्टर, नर्स और दवाओं की कमी बनी हुई है। राजस्थान के आदिवासी बहुल जिलों में मातृ मृत्यु दर और शिशु मृत्यु दर अधिक है, जो इस बात का सबूत है कि इन इलाकों की जनता को अब भी आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था से नहीं जोड़ा गया है। केवल ये ही नहीं, राज्य के दूसरे अदिवासी क्षेत्र भी बदहाली के शिकार हैं। राजस्थान से बाहर निकलें तो वहां भी कमोबेश ऐसी ही स्थिति है। यही वजह है कि महाराष्ट्र के मेलघाट जैसे आदिवासी इलाकों में भी कुपोषण और बुनियादी ढांचे के अभाव की वजह से बच्चों, गर्भवती महिलाओं और दूध पिलाने वाली माताओं की लगातार मौतें हो रही हैं। बॉम्बे हाई कोर्ट ने हाल ही में इसे “त्रासदी” बताया है और यह याद दिलाया है कि राज्य की नीतियां जमीन पर उतर ही नहीं पा रहीं।
भारत दुनिया की आधी से ज्यादा आदिवासी आबादी का घर है, लेकिन यह तबका बुनियादी पोषण, साफ पेयजल, शिक्षा और आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित है। दुर्गम इलाकों में बसे ये समुदाय आजादी के करीब आठ दशक बाद भी सड़कों, परिवहन सेवाओं और आपात चिकित्सा से कटे हुए हैं। इसलिए सामान्य बीमारी भी बच्चों की जान ले लेती है।
अंधविश्वास में भी उलझे हैं आदिवासी
सलूंबर और प्रतापगढ़ जिलों में बच्चों की मौतों के पीछे अंधविश्वास भी एक कारण माना जा रहा है। बताया जा रहा है कि बीमार बच्चों को अस्पताल ले जाने की बजाय ओझाओं के पास ले जाया गया, जिससे उनकी स्थिति बिगड़ी। इस सच की अनदेखी नहीं की जा सकती कि गरीबी, शिक्षा की कमी और आधुनिक चिकित्सा तक पहुंच नहीं होने से ही लोग झाड़-फूंक जैसे अंधविश्वासों में फंसते हैं। गत वर्ष नवंबर में भीलवाड़ा जिले में भी अंधविश्वास के चलते डाम लगाने से बच्चों की मौत के मामले सामने आए थे। भीलवाड़ा जिले में ही चार साल में डाम लगाने के 15 से अधिक मामले सामने आ चुके हैं। इनमें पांच बच्चों की मौत तक हो चुकी है। इस तरह के काम करने वाले भोपों के खिलाफ भी पुलिस में मामले दर्ज हुए हैं। इसके बावजूद यह सिलसिला नहीं थमा। अब भी बड़ी संख्या में ग्रामीण सर्दी-जुकाम होने पर बच्चों को डाम लगाने या झाड़-फूंक को प्राथमिकता देते हैं।
मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी ऐसे मामले सामने आ चुके हैं। वर्ष 2024 में मध्यप्रदेश के झाबुआ इलाके में निमोनिया से पीड़ित तीन बच्चों को इलाज के नाम पर सलाखों से दागने का मामला चर्चा में आया था। झारखंड के गांवों में भी आदिवासी समुदाय में चिड़ी दाग की ऐसी ही एक विचित्र परंपरा है। पेट संबंधी रोग ठीक करने के नाम पर बच्चों के पेट गर्म सलाखों से दागे जाते हैं। हर वर्ष जनवरी के मध्य यहां टुसू पर्व मनाया जाता है। उसी दिन से बच्चों को गर्म सलाखों से दागने का सिलसिला शुरू हो जाता है। नवजात को दागने के लिए तो इस पर्व का इंतजार भी नहीं किया जाता। उड़ीसा के कुछ इलाकों में भी इस तरह की परंपरा है। लोहे व तांबे की सलाखों के अगले हिस्से को चिड़ी के आकार का देकर उसे तपाया जाता है। फिर ओझा बच्चे की नाभि के चारों ओर सरसों का तेल लगाता है और गर्म सलाखों से नाभि के चारों ओर चार बार दागता है। दाग वाले स्थान पर पुन: सरसों तेल लगा दिया जाता है। इस प्रक्रिया में बच्चा तड़प उठता है। कई बार बच्चे की मौत तक हो जाती है।
साफ है कि चिकित्सा विज्ञान की प्रगति के बावजूद इस तरह के गलत और भ्रांतिपूर्ण कृत्य बच्चों की जान ले रहे हैं। आदिवासी, ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लोग अक्सर आधुनिक चिकित्सा प्रणाली की बजाय तांत्रिकों और झाड़-फूंक करने वालों पर भरोसा करते हैं। चिकित्सा सुविधाओं की अनुपलब्धता और जागरूकता की कमी इसे बढ़ावा देती है। बीमारी और उपचार की सही जानकारी न होने के कारण इलाज के लिए ऐसे तरीके अपनाए जाते हैं। महज अंधविश्वास पर बच्चों की मौत का ठीकरा फोड़ने की बजाय बुनियादी ढ़ांचे को मजबूत करने पर ध्यान देना होगा। इन इलाकों में आधुनिक चिकित्सा तंत्र को भी मजबूत किया जाना चाहिए। साथ ही वनस्पतियों पर आधारित सदियों से प्रचलित नुस्खों को विशेषज्ञों के परीक्षण के बाद आमजन तक पहुंचाने पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
अब भी उपेक्षित हैं आदिवासी
आदिवासियों को मूलनिवासी माना जाता है। भाषा, संस्कृति, परंपरा और जीवनशैली में अंतर के कारण वे बाकी आबादी से अब भी अलग-थलग हैं। उनका जीवन प्रकृति के साथ पूरी तरह से जुड़ा हुआ है। साथ ही, वे प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग में बहुत ही समझदार होते हैं। ब्रिटिश काल की वन नीतियों और आजादी के बाद की विकास गतिविधियों ने आदिवासी लोगों की आत्मनिर्भरता को खत्म कर दिया है। उनके शांत जीवन पर कई तरह से असर पड़ा है। गरीबी, कुपोषण और जागरूकता की कमी के कारण उनका स्वास्थ्य अक्सर खराब रहता है। भौगोलिक कारक भी उन पर कुछ प्रभाव डालते हैं। उन्हें स्वास्थ्य से जुड़ी कुछ खास तरह की समस्याएं भी होती हैं, जो मुख्य रूप से उनके रहने की जगह, मुश्किल इलाकों और पर्यावरण से भी जुड़ी होती हैं। इसलिए उनके स्वास्थ्य और विकास के लिए खास योजनाएं बनाकर उन पर अमल करना आवश्यक है।
अधिसंख्य आदिवासी अपने अधिकारों, रोजगार के अवसरों और शिक्षा से जुड़ी योजनाओं के बारे में जागरूक नहीं हैं। स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित होने का सबसे अधिक असर हमेशा सबसे गरीब और सबसे हाशिए पर पड़े आबादी समूहों पर ही पड़ता है। भारत में अनुसूचित जनजातियों को एक अलग समुदाय के रूप में मान्यता दी गई है। इस वर्ग को विधायिका, शिक्षण संस्थानों और नौकरियों में आरक्षण भी मिला हुआ है। इसके बावजूद उनकी स्थिति में खास बदलाव नहीं आया है। इस आरक्षण का फायदा लेने वाले लोग भी अपने में मगन रहते हैं। यही वजह है कि आज भी आदिवासी इलाके सामान्य सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। भारत को वर्ष 2047 तक विकसित देश बनाने का सपना देखा जा रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत से आंख चुराई जा रही है। यह बात याद रखनी होगी कि हाशिए पर धकेल दिए गए आदिवासियों को विकास की धारा में शामिल किए बिना देश को विकसित राष्ट्र बनाने का सपना साकार नहीं होने वाला।







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