नए नेतृत्व के साथ सियासत में बदलते समीकरण
संकेत मिल रहे हैं कि वर्ष 2030 तक बिहार की शासन व्यवस्था अब सम्राट चौधरी की अगुवाई में चलेगी, वही शासन के कर्ताधर्ता रहेंगे। बिहार विधानसभा में सरकार के विश्वास मत प्रस्ताव पर विपक्ष ने मत विभाजन की मांग ही नहीं की, इसलिए विश्वास मत प्रस्ताव ध्वनिमत से पारित कर दिया गया। इससे पहले चर्चा में भाग लेते हुए नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने इसे जनादेश का अपहरण करार दिया। उनका कहना था कि जनता ने 2025 से 2030 तक शासन चलाने का जनादेश नीतीश कुमार को दिया था, लेकिन भाजपा ने जबरदस्ती नीतीश कुमार को सत्ता से उतार दिया। उन्होंने कहा कि इलेक्टेड मुख्यमंत्री को सिलेक्टेड मुख्यमंत्री ने सत्ता से उतार दिया है। तेजस्वी यादव ने कहा कि भले ही तकनीकी रूप से भाजपा की सरकार बन गई है, लेकिन हकीकत यह है कि इस सरकार में भाजपा का कोई व्यक्ति अब तक शासन में नहीं है। खुद मुख्यमंत्री भी लालू की पाठशाला से निकले हैं। उप मुख्यमंत्री विजय चौधरी कांग्रेस से विधायक रहे हैं और दूसरे उप मुख्यमंत्री बिजेन्द्र यादव राष्ट्रीय जनता दल (राजद) से आए हैं। सरकार का खजाना खाली है, कर्मचारियों को वेतन देने के लिए भी पैसे नहीं हैं और राज्य सरकार बैसाखी के भरोसे है।
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चर्चा का जवाब देते हुए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने कहा, ‘सत्ता किसी की बपौती नहीं होती। मुझे यह मौका 14 करोड़ बिहारवासियों के आशीर्वाद और नीतीश कुमार तथा नरेंद्र मोदी की इच्छा से मिली है। कोई किसी पाठशाला से नहीं आता। अगर लालू प्रसाद मुझे जेल नहीं भिजवाते तो मैं राजनीति में ही नहीं आता। क्या यह सही नहीं है कि लालूजी ने मुझ समेत मेरे परिवार के 22 लोगों को झूठे मुकदमों में जेल में डाला था? अगर, मैं गलत बोल रहा हूं, तो लालूजी ने मिलकर स्कूल की जनसभा में मुझसे माफी क्यों मांगी थी? ऐसा क्यों कहा था कि मुझसे गलती हो गई।’
मुख्यमंत्री ने कहा कि बिहार में 20 सालों से एनडीए की सरकार है। हमारी सरकार ने किसानों, छात्रों, मजदूरों और महिलाओं की चिंता की है। उन्हें आगे बढ़ाने का पुरजोर प्रयास किया है। हमारे नेता नीतीश कुमार ने बिहार को न सिर्फ जंगलराज से मुक्त कराया, बल्कि उसका गौरव भी लौटाया है। नीतीश कुमार चाहते हैं कि समृद्ध बिहार बने। हमारी सरकार उसी दिशा में काम कर रही है।
इससे पहले जनता दल यूनाईटेड (जदयू) के राष्ट्रीय महासचिव और विधान परिषद् के सदस्य नीरज कुमार ने तेजस्वी यादव को चुनौती देते हुए कहा था कि यदि नेता प्रतिपक्ष को खुशफहमी हो तो सदन में मत विभाजन करा लें, उनकी कुर्सी भी चली जाएगी। दरअसल, राज्यसभा के चुनाव में राजद विधायक फैसल रहमान ने पार्टी ह्विप के बावजूद मतदान में हिस्सा नहीं लिया था। रहमान नीतीश के करीबी रहे हैं और फिलहाल विधानसभा में गैर सरकारी विधेयक एवं संकल्प समिति के अध्यक्ष हैं। बिहार विधानसभा की सदस्य संख्या के मुताबिक राजद का अगर एक भी विधायक छिटका तो तेजस्वी की नेता प्रतिपक्ष की मान्यता समाप्त हो जाएगी। ज्ञात रहे कि विधानसभा में राजद के कुल 25 विधायक हैं और बिहार में नेता प्रतिपक्ष के लिए कम से कम 25 विधायक चाहिए।
सम्राट की ताजपोशी से मायूस क्यों भाजपाई
लगभग 20 साल तक छोटे भाई की भूमिका में रही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को अब शासन अपने हिसाब से चलाने का मौका पहली बार मिला है। लेकिन, इसके बावजूद भाजपा के नेता खुश नजर नहीं आते। सम्राट की ताजपोशी के दिन भी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन और बिहार के कुछ केन्द्रीय मंत्रियों के अलावा बड़े राष्ट्रीय नेताओं की गैरमौजूदगी से इस कयास को बल मिलता है। इतिहास गवाह है कि जहां कहीं भी भाजपा की सरकारें बनती रही हैं, भले ही वह एनडीए गठबंधन की ही क्यों न हो, भाजपा पूरे धूमधड़ाके से सत्ता का वरण करती रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के साथ कई राज्यों के मुख्यमंत्री और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बड़े पदाधिकारी शपथ ग्रहण समारोह की शोभा बढ़ाते रहे हैं। लेकिन बिहार में ऐसा कहीं नहीं दिखा। पूर्व उप मुख्यमंत्री विजय सिन्हा ने तो सार्वजनिक तौर पर कह दिया कि उनके कमांडर का आदेश था कि मुख्यमंत्री के नाम का प्रस्ताव कर दो और एक अनुशासित सिपाही के नाते मैंने सम्राट चौधरी के नाम का प्रस्ताव कर दिया। इसके अलावा मुख्यमंत्री बनने के बाद सम्राट जब प्रदेश भाजपा कार्यालय गए तो वहां भी पार्टी के बड़े नेता नहीं पहुंचे। हालांकि विधानसभा में विश्वास मत पर बोलते हुए मुख्यमंत्री ने नाराजगी की बातों को खारिज करते हुए इसे मीडिया के एक वर्ग की हवाबाजी करार दिया। उन्होंने कहा कि पूरी पार्टी और एनडीए एकमत है।
नीतीश कुमार का मास्टर दांव
नीतीश राजनीति के माहिर खिलाड़ी रहे हैं। इसे इस बात से समझा जा सकता है कि लगभग 20 वर्षों तक बिहार की सत्ता के केन्द्र में रहे नीतीश बिना विधानसभा चुनाव लड़े, अकेले बहुमत नहीं होने के बावजूद अपनी मर्जी से सरकार चलाते रहे। इस दौरान उन्हें जब भी लगा कि सहयोगी सिर उठाने लगे, उन्होंने बेझिझक पाला बदल लिया। यहां तक कि वर्ष 2020 में 243 सदस्यीय विधानसभा में जदयू के महज 43 विधायक होने के बावजूद नीतीश की ठसक पर कोई असर नहीं पड़ा। जब-जब जरूरत पड़ी तब-तब भाजपा और राजद के साथ गलबहियां कर ली। देश की सियासत में दलबदल का इससे नायाब उदाहरण नहीं मिलता। इसीलिए दोनों गठबंधनों (एनडीए और महागठबंधन) के नेता समय-समय पर नीतीश को पलटूराम कहते रहे हैं।
बीते विधानसभा चुनाव के दौरान ही भाजपा नीतीश को लंगी मारने की फिराक में थी। चुनाव प्रचार के दौरान ही केन्द्रीय गृहमंत्री ने इसके संकेत दे दिए थे। हालांकि नीतीश की नाराजगी के बाद उन्हें अपने पैर वापस खींचने पड़े थे। फिर अचानक पांच माह बाद भाजपा ने नीतीश को इस्तीफा देने और राज्यसभा में जाने का फरमान सुना दिया। भले ही इसे नीतीश कुमार की इच्छा बताया गया, लेकिन सवाल उठता है कि जो व्यक्ति अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद देश में सबसे ज्यादा दिन तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड बना लेता, वह महज चारों सदनों का सदस्य बनने की खातिर पदत्याग क्यों करता। फिर चारों सदनों का सदस्य बनने वालों में लालू प्रसाद यादव, सुशील मोदी और उपेन्द्र कुशवाहा समेत कई नाम पहले से शामिल हैं।
राज्य के उप मुख्यमंत्री विजय चौधरी भले ही सत्ता परिवर्तन को भाजपा का कर्ज उतारना बताते हैं, लेकिन बिहार की राजनीति के जानकार बताते हैं कि भाजपा ने नीतीश की विदाई का फूलप्रूफ प्लान जिस तरह से बनाया था, उससे नीतीश कत्तई खुश नहीं थे। इसीलिए उन्होंने सम्राट चौधरी के माध्यम से पहले यह प्रचार करवाया कि बिहार का नया नेता नीतीश ही तय करेंगे। बाद में भाजपा के अधिकांश नेता, यहां तक कि प्रधानमंत्री और गृहमंत्री भी यह कहने लगे कि बिहार की सरकार नीतीश के मार्गदर्शन में ही चलेगी। बता देना जरूरी है कि गृहमंत्री ने ही सम्राट चौधरी को नीतीश की घेराबंदी करने का निर्देश दिया था। इस बीच नीतीश ने मौका मिलते ही सम्राट को आगे कर अपने पुराने सियासी मित्र शकुनी चौधरी का 26 साल पुराना कर्ज उतार दिया। ज्ञात रहे कि सम्राट, शकुनी चौधरी के पुत्र हैं। नीतीश ने ढाई दशक से बिहार में जिस ‘लव-कुश’ फार्मूले से बिहार की राजनीति को अपनी मुट्ठी में बांधे रखा उसमें ‘कुश’ कोई और नहीं बल्कि शकुनी की कोइरी (कुशवाहा) जाति ही है। ‘लव’ नीतीश की अपनी कुर्मी जाति है।
भाजपा ने बिना देर किए नीतीश को दिया झटका
जानकार सूत्र बताते हैं कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व शुरुआत में सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाने को राजी नहीं था। वह अपने कैडर के किसी निष्ठावान कार्यकर्त्ता को इस पद पर बैठाना चाहता था। उसकी तैयारी भविष्य में जदयू में विभाजन की भी थी। जदयू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा और केन्द्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह (ललन सिंह) टिकट बंटवारे से लेकर इस्तीफे के लिए नीतीश को मनाने तक भाजपा के पैरोकार बने हुए थे। उनकी सलाह पर ही जदयू ने राज्यसभा के सभापति हरिवंश को तीसरी बार राज्यसभा के चुनाव में टिकट नहीं दिया था। जबकि, कर्पूरी ठाकुर का पुत्र होने के कारण रामनाथ ठाकुर तीसरी बार राज्यसभा जाने में सफल रहे। इस बीच भाजपा ने बड़ी होशियारी से राष्ट्रपति के द्वारा हरिवंश नारायण सिंह को राज्यसभा में नामांकित करा दिया। साथ ही पहले से नीतीश समेत एनडीए के किसी सहयोगी दल को इसकी भनक नहीं लगने दी। यही नहीं, जिस दिन 10 अप्रैल को नीतीश कुमार ने राज्यसभा की सदस्यता की शपथ ली। उसके कुछ घंटे बाद हरिवंश ने भी राज्यसभा की सदस्यता ग्रहण की। साथ ही हरिवंश को उप सभापति भी निर्वाचित करा दिया गया। अब तक हरिवंश नीतीश कुमार को सर कहकर बुलाया करते थे। अब नीतीश को संसदीय गरिमा के अनुसार सदन में हरिवंश को संसदीय गरिमा के अनुसार संबोधित करना पड़ेगा।
जनसुराज के आरोपों का क्या
बीते वर्ष विधानसभा चुनाव के दौरान जनसुराज पार्टी के नेता प्रशांत किशोर ने भाजपा के चाल, चरित्र और चेहरा पर सवाल उठाते हुए सम्राट चौधरी की शैक्षणिक योग्यता और सामूहिक हत्या के आरोप में न सिर्फ जेल जाने बल्कि खुद को कम उम्र का बताकर जमानत पाने का आरोप लगाया था। उस समय न तो सम्राट चौधरी, न ही भाजपा और न ही सरकार ने इस पर कोई सफाई दी थी। अब सम्राट के सत्ता संभालने के बाद जनसुराज ने इस मुद्दे को फिर गर्मा दिया है। अब जनसुराज इस मामले को कोर्ट में ले जाने की बात कह रहा है। अगर, जनसुराज के आरोपों में दम है तो इससे सरकार की परेशानी बढ़ सकती है।
मंत्रिमंडल के गठन में सामाजिक समीकरण की चुनौती
अब जबकि सरकार ने विधानसभा में विश्वास मत प्राप्त कर लिया है, अगली चुनौती मंत्रिमंडल के गठन में सामाजिक समीकरण बनाने की है। बिहार में एनडीए के सहयोगी दलों राष्ट्रीय लोक मोर्चा (रालोमो), लोकजनशक्ति पार्टी (रामविलास) और हिन्दुस्तान अवाम मोर्चा (हम) के पुराने चेहरे ही सम्राट की सरकार में शामिल होंगे। क्योंकि हम मुखिया जीतनराम मांझी और रालोमो के सुप्रीमो उपेन्द्र कुशवाहा ने अपने बेटे को पिछली सरकार में भी मंत्री बनाया था। लोजपा (आर) के नेता चिराग पासवान भी किसी बदलाव के मूड में नहीं बताए जा रहे। हालांकि इस बार जदयू से कुछ नये चेहरों को भी मौका मिलने की उम्मीद है। सरकार गठन में सबसे ज्यादा पेंच भाजपा में फंस रहा है। वरिष्ठ और कई पुराने भाजपाई सम्राट की सरकार में शामिल होने को तैयार नहीं हैं। नीतीश की आख़िरी सरकार में राजस्व मंत्री विजय सिन्हा की सख्त कार्यप्रणाली से नौकरशाहों के बड़े वर्ग में नाराजगी थी। हालांकि अवाम के आम लोग मंत्री की सख्ती से खासे खुश थे। सूत्र बताते हैं कि इस बार विजय सिन्हा मंत्री नहीं बनना चाहते हैं। देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा मंत्रिमंडल के गठन में गतिरोध को कैसे दूर कर पाती है। इसके लिए फिलहाल इंतज़ार करना ही उचित होगा।







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