युद्ध किसका, मौत किसकी?
बम कभी सिर्फ एक शहर पर नहीं गिरते, उनका असर पूरी दुनिया पर पड़ता है। सबसे ज्यादा कीमत वह इंसान चुकाता है जिसने न कभी बंदूक उठाई, न किसी से दुश्मनी की। आखिर कब समझेगा इंसान कि युद्ध में किसी की जीत...

आखिर ऐसा क्या हुआ कि बंद होती बंदूकें फिर गरज उठीं?
अभी तो मुश्किल से बीस दिन पहले ऐसा लग रहा था कि शायद युद्ध की विभीषिका पीछे छूट रही है। समाचार चैनलों पर मिसाइलों की जगह बातचीत की खबरें आने लगी थीं। होर्मूज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाज फिर सामान्य रूप से चलने लगे थे। तेल बाजार में घबराहट कम हो रही थी। आयात और निर्यात फिर से गति पकड़ रहे थे। दुनिया को लगने लगा था कि शायद अब विवेक ने हथियारों पर विजय पा ली है।
Table Of Content
- आखिर ऐसा क्या हुआ कि बंद होती बंदूकें फिर गरज उठीं?
- निर्दोष नागरिकों ने आखिर क्या बिगाड़ा है?
- जनता नहीं, युद्ध की राजनीति लड़ती है
- युद्ध सिर्फ सीमा पर नहीं होता
- युद्ध सिर्फ शहर नहीं, विश्वास भी उजाड़ता है
- भारत को भी इसकी चिंता क्यों होनी चाहिए?
- क्या ताकत का यही अर्थ है?
- क्या दुनिया में कोई समझाने वाला नहीं बचा?
- हम चांद पर पहुंचे, पर इंसानियत में पिछड़ गए?
- अंत में सिर्फ एक यक्ष प्रश्न…
लेकिन यह राहत बहुत छोटी निकली।
एक बार फिर धमाके सुनाई दिए। फिर आसमान काले धुएं से भर गया। फिर वही मिसाइलें, वही बम और वही दिल दहला देने वाली चीखें।
क्या दुनिया सचमुच इतनी बेबस हो गई है कि कुछ नेताओं के फैसलों की कीमत करोड़ों निर्दोष लोग अपनी जान देकर चुकाएं?
आखिर क्यों?
क्या बीस दिनों की शांति यह साबित नहीं करती कि यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो युद्ध को टाला भी जा सकता है?
निर्दोष नागरिकों ने आखिर क्या बिगाड़ा है?
जब भी युद्ध शुरू होता है, सबसे पहले कोई सैनिक नहीं मरता, सबसे पहले मरती है किसी मां की उम्मीद।
कोई बच्चा अपने पिता को खो देता है। कोई बेटी हमेशा के लिए अनाथ हो जाती है। किसी परिवार की वर्षों की मेहनत से बना आशियाना कुछ ही सेकंड में मलबे के ढेर में बदल जाता है।
आखिर उनका दोष क्या है?
उन्होंने न किसी देश पर हमला किया, न कोई मिसाइल छोड़ी, न युद्ध की घोषणा की। फिर भी हर बार सबसे बड़ा दर्द उन्हीं के हिस्से क्यों आता है?
युद्ध का फैसला सत्ता के गलियारों में होता है, लेकिन उसकी सजा गलियों, घरों और अस्पतालों में रहने वाले निर्दोष नागरिक भुगतते हैं।
जनता नहीं, युद्ध की राजनीति लड़ती है
हम अक्सर पूरे देश को दोष देने लगते हैं, जबकि सच्चाई इससे कहीं अधिक जटिल होती है।
अमेरिका में भी लाखों लोग युद्ध का विरोध करते हैं। ईरान में भी करोड़ों लोग अपने बच्चों का सुरक्षित भविष्य चाहते हैं। किसी भी देश की आम जनता की पहली और आखिरी इच्छा शांति, सम्मान और सुरक्षित जीवन होती है, युद्ध नहीं।
सरकारों के फैसले और जनता की भावनाएं हमेशा एक जैसी नहीं होतीं। इसलिए किसी भी संघर्ष में सबसे पहले इंसान को देखना चाहिए, फिर उसकी राष्ट्रीयता को।
युद्ध सिर्फ सीमा पर नहीं होता
बहुत से लोग सोचते हैं कि यह केवल ईरान और अमेरिका का मामला है। लेकिन आज की दुनिया में कोई भी युद्ध केवल दो देशों के बीच सीमित नहीं रहता।
तनाव बढ़ते ही तेल महंगा हो जाता है। जहाजों का बीमा महंगा हो जाता है। समुद्री व्यापार प्रभावित होता है। आयात और निर्यात की लागत बढ़ जाती है। शेयर बाजार अस्थिर हो जाते हैं। महंगाई धीरे धीरे हर घर की रसोई तक पहुंच जाती है।
यानी बम चाहे हजारों किलोमीटर दूर फटे, उसकी गूंज आखिरकार हमारे घर तक भी पहुंचती है।
युद्ध सिर्फ शहर नहीं, विश्वास भी उजाड़ता है
युद्ध केवल इमारतें नहीं गिराता।
वह देशों के बीच विश्वास भी तोड़ देता है।
व्यापार रुकता है। निवेशक पीछे हटते हैं। पर्यटन प्रभावित होता है। विकास की योजनाएं ठहर जाती हैं। आने वाली पीढ़ियां भय और असुरक्षा के माहौल में जीने को मजबूर हो जाती हैं।
एक मिसाइल का असर कुछ मिनट का नहीं होता। उसके घाव कई वर्षों तक समाज और अर्थव्यवस्था दोनों झेलते हैं।
भारत को भी इसकी चिंता क्यों होनी चाहिए?
कई लोग पूछते हैं कि यदि युद्ध हजारों किलोमीटर दूर हो रहा है, तो भारत क्यों चिंतित हो?
कारण बिल्कुल स्पष्ट है।
भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है। पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ते ही तेल की कीमतों में उछाल आता है। तेल महंगा होता है तो परिवहन महंगा होता है। परिवहन महंगा होता है तो रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतें बढ़ने लगती हैं।
यानी दूर कहीं दागी गई एक मिसाइल का असर अंततः भारत के एक सामान्य परिवार के मासिक बजट तक पहुंच जाता है।
क्या ताकत का यही अर्थ है?
हर देश को अपनी सुरक्षा का अधिकार है।
लेकिन क्या ताकत का अर्थ यह है कि जब चाहे दुनिया को अस्थिर कर दिया जाए?
क्या शक्ति का सबसे बड़ा प्रमाण मिसाइलों का जखीरा है?
या फिर सबसे बड़ी ताकत वह है जो युद्ध शुरू होने से पहले उसे रोक दे?
इतिहास उन नेताओं को अधिक सम्मान देता है जिन्होंने युद्ध टाले, न कि केवल उन्हें जिन्होंने युद्ध जीते।
यदि युद्ध ही समाधान है तो…
यदि बम गिराने से समस्याएं समाप्त हो जातीं, तो दुनिया में अब तक कोई युद्ध शेष नहीं रहता।
यदि मिसाइलें स्थायी शांति ला सकतीं, तो मध्य पूर्व आज दुनिया का सबसे शांत क्षेत्र होता।
यदि हिंसा ही समाधान होती, तो इतिहास बार बार खुद को नहीं दोहराता।
सच्चाई यह है कि हर युद्ध अंततः बातचीत की मेज पर जाकर ही समाप्त होता है।
फिर शुरुआत भी उसी रास्ते से क्यों नहीं हो सकती?
क्या दुनिया में कोई समझाने वाला नहीं बचा?
आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है।
क्या संयुक्त राष्ट्र केवल चिंता व्यक्त करने के लिए रह गया है?
क्या विश्व की बड़ी शक्तियां केवल अपने अपने हितों के अनुसार पक्ष चुनेंगी?
क्या कोई ऐसा नहीं जो दोनों पक्षों को एक मेज पर बैठाकर कह सके कि अब बहुत हो चुका?
संवाद कमजोर लोगों का हथियार नहीं, बल्कि परिपक्व सभ्यताओं की सबसे बड़ी ताकत होता है।
हम चांद पर पहुंचे, पर इंसानियत में पिछड़ गए?
दुनिया ने विज्ञान में चमत्कार कर दिए।
हम चांद और मंगल तक पहुंच गए। एआई जैसी अद्भुत तकनीक विकसित कर ली। चिकित्सा और संचार के क्षेत्र में अपूर्व प्रगति कर ली।
लेकिन यदि आज भी हम अपने विवादों का समाधान बम और मिसाइलों में खोज रहे हैं, तो हमें अपनी आधुनिकता पर फिर से विचार करना होगा।
तकनीक आगे बढ़ गई है, लेकिन क्या हमारी संवेदनाएं भी उतनी ही आगे बढ़ी हैं?
अंत में सिर्फ एक यक्ष प्रश्न…
क्या दुनिया इतनी असहाय हो चुकी है कि कुछ शक्तिशाली देशों के निर्णयों के सामने पूरी मानवता बेबस खड़ी रहे?
या अब समय आ गया है कि पूरी दुनिया एक स्वर में कहे,
युद्ध नहीं, संवाद चाहिए।
घृणा नहीं, विश्वास चाहिए।
ताकत नहीं, विवेक चाहिए।
क्योंकि इतिहास यह याद नहीं रखता कि किस देश के पास कितनी मिसाइलें थीं।
इतिहास यह याद रखता है कि किसने युद्ध रोका था।
आखिर बम सीमाएं नहीं पहचानते।
आग धर्म नहीं पूछती।
आंसुओं की कोई राष्ट्रीयता नहीं होती।
और मौत कभी यह नहीं देखती कि सामने सैनिक खड़ा है या एक मासूम बच्चा।
इसलिए आज जरूरत किसी एक देश का पक्ष लेने की नहीं, बल्कि मानवता का पक्ष लेने की है।
क्योंकि अंततः हर युद्ध में हार किसी देश की नहीं होती, हार पूरी मानवता की होती है।





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