अभिव्यक्ति – सहमति के दौर में असहमति की घटती जगह और सृजनशील विरोध की जरूरत पर विचार
दिनेश सिंदल,
कवि एवं लेखक
एक पत्रिका ने मुझे कुछ पुस्तकें समीक्षार्थ भिजवाई। पुस्तकों के साथ एक पर्ची भी थी, जिस पर लिखा था- ‘थोड़ा गुड़ी-गुड़ी लिख देना।’ यह ‘गुड़ी-गुड़ी’ शब्द इस सन्दर्भ में मैंने पहली बार देखा था। खैर, मैंने अपनी समझ से समीक्षा की, किन्तु संपादक की समझ से मैं गुड़ी-गुड़ी नहीं लिख पाया। फिर उस पत्रिका से मेरे पास समीक्षार्थ पुस्तकें आना बंद हो गई।
आज के समय में सृजन की संभावनाएं क्षीर्ण हो गई हैं। इसका मुख्य कारण है कि कहीं कोई रचनात्मक विरोध नहीं है। आदमी अपने गुड़ी-गुड़ी चेहरे के साथ रहना चाहता है।
कोई भी रचनाकार ‘जैसा है’, उसका विरोध करता है एवं ‘जैसा होना चाहिए’ उसे स्थापित करने की कोशिश करता है। नए सृजन के लिए पुराने को ध्वस्त करना जरूरी है। पुराने को नकारने की हिम्मत रचनाकार में होनी चाहिए।
कोई आत्मवन व्यक्ति ही बने-बनाए ढांचे का विरोध कर सकता है, लीक पर चलने से इनकार कर सकता है। समाज हमें भेड़ों की भांति चाहता है, व्यक्तियों की भांति नहीं। क्योंकि व्यक्ति के साथ ही बगावत का स्वर शुरू हो जाता है। जैसे ही होश की किरण उतरती है व्यक्ति अपने स्वयं के मार्ग को खोजने लग जाता है। फिर वह भीड़ के पीछे नहीं चलता। होश आते ही समाज से टूट जाता है। वह पहली बार स्वयं होता है और स्वयं होने में ही बगावत है, विद्रोह है, क्रांति है। इसलिए कोई समाज व्यक्ति को बर्दाश्त नहीं करता।
समाज जन्म की पहली ही घड़ी से व्यक्ति को दबाता है, तोड़ता है कि कहीं वह आत्मवान न हो जाए। क्योंकि अगर वह आत्मवान हुआ तो समाज का नियंत्रण उस पर नहीं रहेगा। लेकिन आज का रचनाकार अपने कई चेहरों के साथ रहता है। वह अपने निजी हित की संभावनाएं दोनों तरफ तलाश करता है।
बस्तियां मधुमेह से पीड़ित रही
आदमी इतने रसीले हो गए
आज का आदमी विरोध और समर्थन दोनों के बीच का मुखोटा लगा कर घूमता है। अपने पक्ष के प्रति न तो प्रबल समर्थन और न ही अपने विपक्ष का प्रबल विरोध।
माणक वर्मा कहते हैं कि-
भारत बंद के दौरान
एक आदमी
सिर्फ चड्डी पहन कर सड़क पर आया
और उसका कारण उसने यह बताया कि-
बंद को अपना समर्थन मिला-जुला है
बंद कहो तो बंद, खुला कहो तो खुला है..!!
आप कुछ भी करो कोई आपको रोकने-टोकने वाला नहीं। कवि-सम्मेलनों के मंच पर मिमिकरी करो, चुटकले सुनाओ। प्रवचन के नाम पर भजन गाओ, नाच नाचवाओ। सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाओ। कहीं पर थूको। नो पार्किंग में गाड़ी खड़ी करो। कहीं कोई विरोध नहीं।
आज विरोध है तो समर्थन जैसा और समर्थन है तो विरोध जैसा। अंधेरा, अंधेरे जैसा नहीं, उजाला उजाले जैसा नहीं।
अंधेरा है तो क्यों गहरा नहीं है
उजाला है तो क्यों दिखता नहीं है
विरोध में ही सृजन की शक्ति होती है। भवन बनाते समय हम ईंटों को एक दूसरे के विपरीत खड़ा करके दीवार खड़ी कर सकते हैं। ताश का महल बनाते समय दो पत्तों को एक दूसरे के विपरीत खड़ा किया जाता है। इससे एक दूसरे के खिलाफ लगने वाली शक्ति सृजन की शक्ति बनती है और ताश का महल खड़ा हो जाता है।
अगर कोई बेटा बाप के बताए रास्ते पर चलने से मना करता है तब ही नये रास्ते की तलाश की संभावनाएं बनती हैं। अगर विरोध नहीं है तो नये की तलाश भी नहीं है। सिद्धार्थ ने अपने पिता की मर्जी के खिलाफ राज छोड़ा और वन की तरफ प्रस्थान किया तो हमें गौतम बुद्ध मिले। द्रोणाचार्य ने जब एक भील बालक को धनुर्विद्या सिखाने से मना कर दिया, तब उस बालक ने अपनी संभावनाएं खोजीं और देश को एकलव्य जैसा धनुर्धर मिला।
विरोध का आकर्षण ही सृजन का द्वार है।
एक गांव के सब युवा निष्क्रिय हो गए। कोई कुछ भी काम नहीं करता था। समस्या खड़ी हो गई। गांव का एक बुजर्ग इस चिंता को लेकर पड़ौस के एक साधु महात्मा के पास गया और उनके सामने अपनी समस्या रखी। कहा- महाराज गांव के सब युवा निष्क्रिय हो गए हैं। कोई कुछ काम धंधा नहीं करना चाहता। कोई उपाय बताएं।
साधु महात्मा ने कहा, बहुत सरल उपाय है। आपके गांव के पास एक नदी बहती है। गांव की जितनी स्त्रियां हैं उन सभी को नदी के उस पार छोड़ आओ। वृद्ध ने ऐसा ही किया। और दूसरे दिन एक चमत्कार देखा कि गांव के सब युवा नाव बनाने में जुट गए। यही विपरीत का आकर्षण है। यही विरोध की ऊर्जा है।







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