ज्योत से ज्योत जगाते चलो….
दीपावली केवल अपने घर की चौखट तक रोशनी समेटने का पर्व नहीं, बल्कि समाज के वंचित वर्ग तक खुशियां पहुंचाने और साझा संवेदनशीलता का अवसर है। दिखावे, प्रतिस्पर्धा और शोर-शराबे से परे प्रेम, सद्भाव और...

घरों की चौखट तक सीमित न रहे दीपों का उजाला
दीपावली का नाम आते ही मन में रोशनी से जगमगाते घरों, दीपों की कतारों, मिठाइयों की खुशबू, रंगोली के रंगों और अपनों के साथ खुशियां बांटने की तस्वीर उभरती है। यह ऐसा त्योहार है, जो अंधकार पर प्रकाश, निराशा पर आशा और बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश देता है। इस मौके पर दीपों का उजाला केवल हमारे घरों की चौखट तक सीमित नहीं रहना चाहिए। त्योहार की खुशियां सिर्फ परिवार, मित्रों और परिचितों के बीच ही नहीं समाज के वंचित वर्ग से भी बांटनी चाहिए।
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दीपावली पर घरों की सफाई, सजावट, खरीदारी और पकवान बनाने की परंपरा तो है ही। घर की सजावट पर हजारों रुपए खर्च करने वाला व्यक्ति यदि अपने आसपास अभाव में जी रहे परिवार की परेशानी से अनजान बना रहे, तो उत्सव का मानवीय पक्ष अधूरा ही माना जाएगा। दीपावली का दीपक अपने आसपास के अंधकार को दूर करता है। उसका प्रकाश यह नहीं पूछता कि सामने कौन खड़ा है, किसकी भाषा क्या है, वह किस समुदाय से आता है या उसकी आर्थिक स्थिति कैसी है। प्रकाश उदारता के साथ सभी के लिए उपलब्ध रहता है। हमारी भी ऐसी ही उदार भावना रहनी चाहिए। इस लिहाज से दीपावली के अवसर पर संत ज्ञानेश्वर फिल्म का गीत ‘ज्योत से ज्योत जगाते चलो, प्रेम की गंगा बहाते चलो, राह में आए जो दीन दुखी सबको गले से लगाते चलो’, ज्यादा प्रासंगिक हो जाता है। छह दशक पूर्व फिल्माए गए गीत की उक्त दो लाइनें दीपावली के त्योहार की भावना व्यक्त करती नजर आती हैं।
हमारे आसपास ऐसे अनेक लोग होते हैं, जो त्योहार पर भी हाड़तोड़ मेहनत करते हैं। अनेक भरपेट भोजन के लिए भी तरस रहे होते हैं। यदि हम दीपावली पर उनका सम्मान करें, उनकी जरूरतों का ध्यान रखें और उन्हें उत्सव में भागीदार बनाएं, तो त्योहार का आनंद कई गुना बढ़ सकता है। सम्मान के साथ की गई मदद, दिया गया छोटा-सा उपहार या आत्मीय बातचीत हाशिए के लोगों की आंखों में चमक ला सकती है। जरूरतमंद परिवारों को राशन, कपड़े, मिठाइयां और उपयोगी घरेलू वस्तुएं दी जा सकती हैं, लेकिन इस दौरान उनकी गरिमा का ध्यान रखना भी आवश्यक है। सहायता पाने वाले लोगों की तस्वीरें खींचकर उन्हें प्रचार के लिए इस्तेमाल करना या सोशल मीडिया पर उनकी गरीबी का प्रदर्शन करना अनुचित है। सेवा का उद्देश्य किसी की प्रतिष्ठा कम करना नहीं, बल्कि उसकी कठिनाई को कम करना होना चाहिए। दीपावली का सबसे सुंदर दृश्य वह नहीं, जिसमें सबसे बड़ा घर सबसे अधिक रोशनी से जगमगा रहा हो। सबसे सुंदर दृश्य वह है, जिसमें किसी एक घर का दीपक दूसरे घर तक आशा और उम्मीद पहुंचाए, जहां किसी की खुशी दूसरे के लिए भी मुस्कान का कारण बने और जहां अलग-अलग पहचान रखने वाले लोग एक-दूसरे के सम्मान और सुरक्षा को अपनी साझा जिम्मेदारी समझें।
दूसरों की सुविधा का भी रखें ध्यान
हमें यह ध्यान रखना भी जरूरी है कि हर व्यक्ति की परिस्थितियां एक जैसी नहीं होतीं। किसी के लिए त्योहार उल्लास का अवसर है, तो किसी के लिए यह परिवार से दूर रहने, किसी प्रियजन को खोने या आर्थिक कठिनाई के कारण उदासी का समय भी हो सकता है। अस्पतालों में मरीजों की देखभाल करने वाले कर्मचारी, सार्वजनिक सेवाओं में लगे लोग और कई श्रमिक त्योहार के दिन भी अपनी जिम्मेदारियां निभाते हैं। उनके योगदान को पहचानना और उनकी सुविधा का ध्यान रखना भी जरूरी है। इसी तरह, पटाखे चलाते समय बच्चों, बुजुर्गों, बीमार व्यक्तियों तथा पशु-पक्षियों के प्रति संवेदनशील होना चाहिए। इसलिए पटाखे कम आवाज और धुएं वाले चलाएं। प्रतिबंधित समय में पटाखे न चलाएं। यह उत्सव दूसरों के लिए परेशानी का कारण नहीं बनना चाहिए। ध्यान रहे, त्योहार दूसरों को खुशी बांटने का भी अवसर होते हैं।
बना रहे आपसी सद्भाव और विश्वास
भारत की सामाजिक संरचना विविधता से भरी है। यहां अलग-अलग धर्मों, भाषाओं, जातियों, परंपराओं और जीवनशैलियों के लोग साथ रहते हैं। यह विविधता हमारी सामाजिक वास्तविकता भी है और सामूहिक शक्ति भी। इसके बावजूद कई बार पूर्वाग्रह और अफवाहों के कारण अविश्वास पनपता है। ऐसी स्थिति में त्योहार के जरिए आपसी परिचय और संवाद का अवसर मिलता है। इस मौके का फायदा उठाकर आपसी विश्वास को मजबूत किया जा सकता है।
यदि किसी मोहल्ले में दीपावली पर हिंदू परिवार अन्य समुदायों के पड़ोसियों को मिठाई देकर शुभकामनाएं देते हैं, तो यह केवल एक सामाजिक शिष्टाचार नहीं है। यह इस विश्वास का संकेत है कि अलग-अलग आस्थाओं के बावजूद लोगों के बीच आत्मीय संबंध संभव हैं। इसी तरह, दूसरे समुदायों के त्योहारों पर शुभकामनाएं देना, उनकी खुशियों में शामिल होना और उनकी परंपराओं को सम्मानपूर्वक समझना आपसी विश्वास को मजबूत करता है। हम अपनी धार्मिक, भाषायी और सांस्कृतिक पहचान बनाए रखते हुए भी एक-दूसरे के अधिकारों, सम्मान और सुख-दुख के प्रति संवेदनशील रहें। किसी व्यक्ति के साथ हमारा संबंध केवल उसकी धार्मिक पहचान से निर्धारित नहीं होना चाहिए। वह हमारा पड़ोसी है, सहकर्मी है, मित्र है और इस देश का नागरिक भी है।
डिजिटल तकनीक का प्रभाव
आज त्योहारों का स्वरूप डिजिटल तकनीक से भी प्रभावित हो रहा है। शुभकामनाओं के संदेश, वीडियो, तस्वीरें और ऑनलाइन उपहार कुछ ही क्षणों में दूर-दराज के लोगों तक पहुंच जाते हैं। परिवार से दूर रहने वाले सदस्य वीडियो कॉल के जरिए एक-दूसरे से जुड़ सकते हैं और डिजिटल भुगतान के माध्यम से सहायता भी भेज सकते हैं। तकनीक का यह पक्ष उपयोगी है। इस बात को ध्यान में रखा जाना चाहिए कि डिजिटल संपर्क और वास्तविक आत्मीयता एक ही बात नहीं हैं। दीपावली पर सोशल मीडिया पर शुभकामना संदेश दें, लेकिन यथासंभव व्यक्तिगत संपर्क भी करें। एक जरूरी बात यह है कि सोशल मीडिया पर सजावट और उपहारों की तस्वीरें साझा करने की होड़ से बचा जाना चाहिए। डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल संबंधों को मजबूत करने के लिए होना चाहिए, न कि दूसरों को कमतर बताने के लिए।
किसी जरूरतमंद परिवार तक सहायता पहुंचाने, स्थानीय सामुदायिक कार्यक्रम की जानकारी साझा करने या पड़ोसियों को एक साथ जोड़ने में तकनीक प्रभावी भूमिका निभा सकती है। मगर इसके साथ साइबर सुरक्षा का ध्यान रखना भी जरूरी है।
त्योहारों का विकृत होता स्वरूप
दीपावली और दूसरे त्योहार मूलतः प्रेम, सद्भाव, उल्लास, सामाजिक एकता और मानवीय संवेदनाओं के प्रतीक रहे हैं। इनका उद्देश्य केवल धार्मिक परंपराओं का निर्वाह करना नहीं, बल्कि परिवारों को जोड़ना, रिश्तों में मिठास घोलना और समाज में परस्पर विश्वास को मजबूत करना भी रहा है। बदलते समय में त्योहारों के स्वरूप में कई ऐसे बदलाव आए हैं, जिन्होंने इनके मूल संदेश को कहीं पीछे छोड़ दिया है। आस्था की जगह दिखावा, आत्मीयता की जगह प्रदर्शन और सामूहिक उल्लास की जगह प्रतिस्पर्धा लेने लगी है।
दीपावली पर घरों को रोशन करने की परंपरा अब महंगी सजावट, ब्रांडेड उपहारों और खरीदारी की होड़ से जुड़ती जा रही है। त्योहार की खुशी का आकलन इस बात से होने लगा है कि किसने कितनी महंगी रोशनी की, किसने कितने कीमती उपहार दिए और किसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर अधिक आकर्षक दिखाई दीं। दूसरे त्योहार भी इस प्रवृत्ति से अछूते नहीं हैं। होली पर रंगों और मेल-मिलाप की जगह जबरन रंग लगाने, पानी की बर्बादी और नशे का चलन बढ़ता है, तो त्योहार की सहजता प्रभावित होती है। धार्मिक जुलूसों में तेज आवाज वाले डीजे, आतिशबाजी और शक्ति प्रदर्शन के कारण बच्चों, बुजुर्गों, बीमारों तथा पशु-पक्षियों को परेशानी होती है। आस्था के नाम पर दूसरों की सुविधा और अधिकारों की अनदेखी किसी भी त्योहार की भावना के विपरीत है।
त्योहारों का एक विकृत रूप तब भी सामने आता है, जब धार्मिक भावनाओं को सामाजिक विभाजन का माध्यम बना दिया जाता है। जिन त्योहारों का उद्देश्य लोगों को जोड़ना है, वे यदि दूसरे समुदाय के प्रति संदेह या वैमनस्य बढ़ाने लगें, तो हमें उनके स्वरूप पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। धर्म की सार्थकता दूसरों को छोटा दिखाने में नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर करुणा, संयम और उदारता विकसित करने में है। त्योहारों को दिखावे और प्रतिस्पर्धा से मुक्त करके प्रेम और सद्भाव का उत्सव बनाएं।






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