डब्बे में खाना नहीं, भरोसा चलता है
मुंबई के 135 वर्ष पुराने डब्बावाला मॉडल पर डॉ. पवन अग्रवाल से जयपुर प्रवास के दौरान वरिष्ठ पत्रकार बलवंत राज मेहता की विशेष बातचीत के प्रमुख...

डब्बावाला मॉडल
क्या कोई ऐसी व्यवस्था संभव है, जहां प्रतिदिन दो लाख लोगों तक भोजन पहुंचे, हजारों टिफ़िन कई हाथों से गुजरें, दर्जनों रेलगाड़ियां बदलें और फिर भी गलती लगभग न के बराबर हो? मुंबई के डब्बावाले पिछले 135 वर्षों से यह चमत्कार रोज़ कर रहे हैं।
जयपुर प्रवास के दौरान अंतरराष्ट्रीय मोटिवेशनल स्पीकर और प्रबंधन विशेषज्ञ डॉ. पवन अग्रवाल से हुई मुलाकात इसी अद्भुत मॉडल के इर्द-गिर्द रही। तीन दशकों से वे मुंबई डब्बावालों की कार्यप्रणाली पर देश-विदेश में व्याख्यान दे रहे हैं। उनका मानना है कि आधुनिक प्रबंधन की बड़ी सीख साधारण लोगों के असाधारण अनुशासन में छिपी है। वे मुस्कराते हुए कहते हैं, डब्बावाले टिफ़िन नहीं पहुंचाते, वे घर का प्यार पहुंचाते हैं। यही एक वाक्य पूरी व्यवस्था का सार बन जाता है।
मुंबई आज ऑनलाइन फूड डिलीवरी का बड़ा बाज़ार है। फिर भी लाखों लोग अपने घर का बना भोजन ही पसंद करते हैं। डॉ. अग्रवाल इसके पीछे केवल स्वाद नहीं, बल्कि मनोविज्ञान देखते हैं। उनके अनुसार मां, पत्नी या बहन के हाथों बना भोजन व्यक्ति को भावनात्मक सुरक्षा देता है। वह केवल पोषण नहीं, परिवार से जुड़ाव का एहसास भी कराता है। यही कारण है कि बदलती जीवनशैली के बावजूद डब्बावालों की प्रासंगिकता बनी हुई है।
आज मुंबई में लगभग 5000 डब्बावाले प्रतिदिन करीब 2 लाख ग्राहकों को सेवा देते हैं। सुबह घरों से टिफ़िन एकत्र होते हैं, उन पर विशेष रंग और संकेत आधारित कोड अंकित किया जाता है। यह कोड बताता है कि डब्बा किस स्टेशन पर जाएगा, किस लोकल ट्रेन में चढ़ेगा और अंतिम वितरण कौन करेगा। पूरी प्रणाली सीमित तकनीक और मानवीय समन्वय पर आधारित है।
डॉ. अग्रवाल बताते हैं कि इस व्यवस्था की रीढ़ मुंबई की उपनगरीय लोकल रेल है। लगभग 60 किलोमीटर के दायरे में यह नेटवर्क फैला हुआ है। प्रत्येक कर्मचारी अपनी भूमिका जानता है। कोई संग्रह करता है, कोई स्टेशन तक पहुंचाता है, कोई ट्रेन में लोड करता है और कोई अंतिम ग्राहक तक डिलीवरी करता है। यह शृंखला इतनी व्यवस्थित है कि कुछ मिनट की देरी भी पूरी टीम को सतर्क कर देती है।
यही अनुशासन दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच चुका है। अंतरराष्ट्रीय व्यावसायिक पत्रिका फोर्ब्स ने डब्बावालों की कार्यप्रणाली को सिक्स सिग्मा स्तर की गुणवत्ता का उदाहरण माना। सीमित संसाधनों में मिली यह उपलब्धि प्रबंधन जगत के लिए आश्चर्य का विषय रही है।
डॉ. अग्रवाल याद करते हैं कि डब्बावालों की ख्याति से प्रभावित होकर तत्कालीन प्रिंस चार्ल्स स्वयं मुंबई में उनसे मिलने पहुंचे थे। उन्होंने उनकी कार्यशैली देखी। आज हार्वर्ड, आईआईएम, आईआईटी और अनेक अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में यह मॉडल प्रबंधन अध्ययन का हिस्सा बन चुका है।
क्या यह व्यवस्था दूसरे शहरों में सफल हो सकती है? इस प्रश्न पर डॉ. अग्रवाल एक रोचक प्रसंग सुनाते हैं। दिल्ली और बेंगलुरु में डब्बावाला मॉडल शुरू करने के प्रयास हुए, लेकिन अपेक्षित सफलता नहीं मिली। कारण स्पष्ट था, मुंबई जैसी समयबद्ध लोकल रेल व्यवस्था वहां नहीं है। सड़क यातायात पर निर्भर शहरों में जाम समय की निश्चितता को समाप्त कर देता है, जबकि डब्बावाला मॉडल की पूरी ताकत समय की पाबंदी है।
करीब बारह वर्ष पहले इस व्यवस्था को लंदन में भी लागू करने की पहल हुई। मुंबई डब्बावाला संगठन के तत्कालीन सचिव गंगाराम तालेकर छह साथियों के साथ वहां पहुंचे। उन्होंने साइकिलों पर घर-घर जाकर कूपन बांटे और ग्राहकों को जोड़ने का प्रयास किया। प्रारंभिक उत्साह के बावजूद यह प्रयोग स्थायी रूप से सफल नहीं हो सका। डॉ. अग्रवाल का निष्कर्ष है कि किसी मॉडल की सफलता स्थानीय परिवहन, सामाजिक व्यवहार और कार्यसंस्कृति पर भी निर्भर करती है।
भविष्य को लेकर वे निराश नहीं, बल्कि आशावादी हैं। उनका मानना है कि आने वाले वर्षों में डब्बावाले स्वयं डिजिटल मंचों से जुड़ सकते हैं। ऑनलाइन तकनीक का मेल उन्हें नई पहचान दे सकता है। उनके शब्दों में, प्रतिस्पर्धा रेस्तरां से नहीं, भरोसे से है। और भरोसा आज भी डब्बावालों की सबसे बड़ी पूंजी है।
डॉ. पवन अग्रवाल की अपनी यात्रा भी कम प्रेरक नहीं है। राजस्थान के सीकर जिले के माधोपुरा गांव से जुड़े डॉ. अग्रवाल आज महाराष्ट्र में रहते हैं, लेकिन अपनी जड़ों से उनका रिश्ता गहरा है। वे शिक्षक और समाजसेवी भी हैं। कमलाबाई एजुकेशनल एंड चैरिटेबल ट्रस्ट के माध्यम से महाराष्ट्र में अनेक वंचित बच्चों को निःशुल्क शिक्षा दी जा रही है। उनके लिए सफलता का सूत्र आर्थिक उपलब्धि के साथ मानवीय संवेदनाएं और नैतिक नेतृत्व भी है।
पिछले तीन दशकों में डॉ. अग्रवाल ने टेडएक्स, आईआईएम, आईआईटी और अनेक विश्वविद्यालयों में हजारों व्याख्यान दिए हैं। फिर भी वे डब्बावालों की सफलता का श्रेय उन श्रमिकों को देते हैं, जिन्होंने अपने श्रम और ईमानदारी से इस व्यवस्था को विश्वविख्यात बनाया।
जयपुर की इस मुलाकात से लौटते समय मन में एक विचार बार-बार उभरता रहा, तकनीक हमें गति दे सकती है, लेकिन विश्वास नहीं। विश्वास समय पर निभाए गए वादों से बनता है। मुंबई के डब्बावाले पिछले 135 वर्षों से यही वादा निभा रहे हैं। शायद इसी कारण उनके डब्बों में केवल भोजन नहीं, बल्कि भरोसा, अनुशासन और भारतीय परिवार की आत्मीयता भी साथ चलती है।






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