विदेशी नौकरी का खतरनाक जाल
विदेश में नौकरी का झांसा देकर युवाओं को साइबर अपराध के अड्डों में पहुंचाया जा रहा है। मानव तस्करी, साइबर ठगी और संगठित अपराध का यह गठजोड़ गंभीर चुनौती बन चुका...

साइबर गुलामी
भारत मानव तस्करी के खतरनाक और नए रूप से जूझ रहा है। युवाओं को आकर्षक नौकरियों के सपने दिखाकर विदेश ले जाया जाता है और फिर उन्हें जबरन साइबर अपराध करने के लिए बाध्य किया जाता है। दक्षिण-पूर्व एशिया में साइबर स्कैम कंपाउंड्स में फंसे भारतीय युवाओं की ‘साइबर गुलामी’ की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। यह समस्या एक गंभीर राष्ट्रीय सुरक्षा और मानवाधिकार संकट बन चुकी है। बदमाश 20-35 साल के युवाओं को आकर्षक आईटी और कस्टमर सर्विस नौकरियों का लालच देते हैं। फेसबुक, इंस्टाग्राम, वाट्सऐप और टेलीग्राम जैसे प्लेटफॉर्म पर चलने वाले फर्जी विज्ञापनों और एजेंटों के नेटवर्क इस धोखाधड़ी की रीढ़ हैं। यह महज रोजगार धोखाधड़ी का मामला नहीं, बल्कि संगठित अपराध, साइबर ठगी और अंतरराष्ट्रीय मानव तस्करी का खतरनाक गठजोड़ है।
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साइबर गिरोह बहुत चालाकी से कार्य करते हैं। विदेश पहुंचते ही पीड़ितों के पासपोर्ट छीन लिए जाते हैं और आने-जाने पर सख्ती से रोक लगा दी जाती है। उनकी 24 घंटे निगरानी की जाती है। कुछ दिन की ट्रेनिंग के बाद पीड़ितों को 12-16 घंटे की पारियों में काम करने के लिए मजबूर किया जाता है। शारीरिक प्रताड़ना और वित्तीय दबाव बनाकर उन्हें साइबर अपराध करने के लिए मजबूर किया जाता है। मुख्य रूप से म्यांमार, कंबोडिया और लाओस में ऐसे मामले सामने आए हैं। फिलीपींस और थाईलैंड-म्यांमार सीमा क्षेत्र भी इसमें शामिल हैं। संयुक्त राष्ट्र की माइग्रेशन एजेंसी आईओएम का मानना है कि म्यांमार, कंबोडिया और लाओस में करीब 3 लाख लोगों को जबरन इन स्कैम कंपाउंड्स में काम करने के लिए मजबूर किया जा रहा है।
चार वर्ष में 6998 लोगों को मिली मुक्ति
समस्या की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कंबोडिया, लाओ पीडीआर और म्यांमार में पिछले चार वर्षों यानी 2022 से दिसंबर 2025 तक 6998 भारतीय नागरिकों को बचाया गया। कंबोडिया से 2533, लाओपीडीआर से 2297 और म्यांमार से 2168 भारतीयों की सुरक्षित वापसी हुई। विदेश राज्य मंत्री कीर्तिवर्धन सिंह ने एक सवाल के जवाब में इसी वर्ष फरवरी में लोकसभा में बताया था कि सरकार को इन देशों में फंसे भारतीय नागरिकों की सटीक संख्या का पता नहीं है। इसकी वजह यह है कि उनको अवैध चैनलों के माध्यम से इन स्कैम सेंटरों तक पहुंचाया जाता है।
करीब 80 देशों के युवा चंगुल में
संयुक्त राष्ट्र मादक पदार्थ एवं अपराध कार्यालय (यूएनओडीसी) की कुछ समय पूर्व जारी रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2025 में एशिया-प्रशांत क्षेत्र के लोगों से साइबर ठग गिरोहों ने अनुमानत: 114 अरब डॉलर तक की ठगी की। यह राशि इस क्षेत्र के कई देशों के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) से भी अधिक है। इससे साफ है कि समस्या कितनी गंभीर है। दक्षिण-पूर्व एशिया में सक्रिय साइबर ठगी केंद्र दुनिया भर के लोगों को निशाना बना रहे हैं और हर साल अरबों डॉलर बटोर रहे हैं। इनमें से कई केंद्रों में विदेशों से तस्करी कर लाए गए लोगों से काम कराया जाता है और उन्हें गुलामों की तरह रखा जाता है। यूएनओडीसी के अनुसार पूरे क्षेत्र में मौजूद साइबर ठगी परिसरों में भारत समेत करीब 80 देशों के लोगों की पहचान की गई है। साइबर गिरोह नए स्थानों पर अपने नेटवर्क के विस्तार के साथ अब एशिया के बाहर से भी भर्ती करने की कोशिश कर रहे हैं। जर्मन, पोलिश, डच, स्पेनिश, इतालवी, फ्रेंच, स्वीडिश, नॉर्वेजियन और अंग्रेजी भाषाओं का ज्ञान रखने वाले लोगों पर इनकी निगाह रहती है। वे उनको बरगलाने के नए-नए रास्ते तैयार करते रहते हैं।
राजस्थान के 500 से ज्यादा युवाओं की पहचान
हाल ही राजस्थान पुलिस की स्टेट साइबर क्राइम थाना पुलिस की कार्रवाई भी अखबारों की सुर्खियां बनी हैं। साइबर पुलिस ने अंतरराष्ट्रीय साइबर ठगी और मानव तस्करी से जुड़े एक बड़े नेटवर्क का पर्दाफाश करते हुए दस आरोपियों को गिरफ्तार किया है। यह गिरोह युवाओं को विदेश में अच्छी नौकरी का लालच देकर कंबोडिया, वियतनाम, म्यांमार और लाओस भेजता था। वहां उनके पासपोर्ट छीन लिए जाते और उन्हें डिजिटल अरेस्ट, फर्जी इन्वेस्टमेंट और क्रिप्टो फ्रॉड जैसे साइबर अपराध करने के लिए मजबूर किया जाता था। साइबर क्राइम पुलिस के अनुसार आई4सी के डाटा विश्लेषण में राजस्थान के 500 से अधिक लोगों की पहचान हुई है, जिन्हें इन देशों में भेजा गया था। वापस लौटे कुछ पीड़ितों ने पुलिस को बताया कि साइबर स्कैम सेंटर में पहले उन्हें प्रशिक्षण दिया जाता था। उनको फर्जी प्रोफाइल के जरिए भारतीय नागरिकों से सोशल मीडिया पर दोस्ती कर विश्वास जीतने के लिए कहा जाता था। फिर लोगों को डिजिटल अरेस्ट, क्रिप्टोकरेंसी और निवेश के नाम पर ठगी के रास्ते पर आगे बढ़ाया जाता था। ठगी की रकम क्रिप्टोकरेंसी में बदलकर चीन और कंबोडिया के हैंडलर्स तक पहुंचाई जाती थी। जांच में सामने आया कि विदेश पहुंचते ही युवाओं के पासपोर्ट और पहचान-पत्र जब्त कर लिए जाते थे। उनको एक तरह से बंधक बनाकर इशारों पर नचाया जाता था।
सामने आया दूसरे अपराधों से जुड़ाव
युवाओं को साइबर गुलाम बनाकर उनसे साइबर धोखाधड़ी का यह नेटवर्क दूसरे अपराधों से भी जुड़ा हुआ है। यूएनओडीसी की रिपोर्ट में बताया गया है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय साइबर गिरोह सरकारी जांच एजेंसियों से आगे रहने के लिए अपने तौर-तरीकों में तेजी से बदलाव कर रहे हैं। दक्षिण-पूर्व एशिया में मुख्य रूप से चीनी मूल के संगठित अपराध सिंडिकेट साइबर धोखाधड़ी के बड़े केंद्र के रूप में सक्रिय हैं। वे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का भी इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसे गिरोहों का जो नेटवर्क पहले किसी खास क्षेत्र या किसी विशेष अवैध कारोबार तक सीमित रहता था, लेकिन अब वह तेजी से कई तरह के गैरकानूनी बाजारों में फैल रहा है। उनका संचालन मॉडल कॉरपोरेट जैसा दिखाई देता है। रिपोर्ट के अनुसार साइबर ठगी के तेजी से विस्तार के साथ इससे जुड़े कई सहायक अपराधों का पूरा तंत्र खड़ा कर दिया गया है। इसमें मनी लॉन्ड्रिंग, हवाला और डेटा की खरीद-फरोख्त जैसी गतिविधियां शामिल हैं।
साइबर गिरोह बदल रहे हैं ठिकाने
यूएनओडीसी ने कहा कि सरकारी जांच एजेंसियों की हालिया कार्रवाई ने इन गिरोहों पर दबाव तो बनाया है, लेकिन इससे उनकी गतिविधिया ठप नहीं हुई हैं। साइबर गिरोह अपना ठिकाना बदल रहे हैं। वे म्यांमार और लाओस जैसे देशों से निकलकर पूर्वी तिमोर, प्रशांत द्वीप देशों और अफ्रीका के कुछ हिस्सों में अपना नेटवर्क स्थानांतरित कर रहे हैं। साइबर गिरोह ऐसे स्थानों की तलाश में रहते हैं, जहां का शासन कमजोर हो।
आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल में आगे
अपराधी समूह पहले से ही जनरेटिव एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं। आशंका यह है कि वे एजेंटिक एआई सिस्टम को भी अपनाने की तैयारी कर रहे हैं। एजेंटिक एआई सिस्टम एक ऐसी स्वायत्त कृत्रिम बुद्धिमत्ता है जो खुद ही योजना बनाकर काम कर सकती है। इसकी मदद से बदमाश शिकार की आसानी से पहचान कर सकते हैं। साथ ही सटीक सोशल मीडिया अभियान चलाने तथा क्रिप्टोकरेंसी की चोरी या मनी लॉन्ड्रिंग जैसे कार्य भी आसान हो जाएंगे।
ये पीड़ित हैं, साइबर अपराधी नहीं
यह समस्या भारत की बड़ी युवा आबादी, बेरोजगारी और विदेश में बेहतर रोजगार की चाह से सीधी जुड़ी है। तस्कर इन कमजोरियों का फायदा उठाते हैं। कई पीड़ित आईटी बैकग्राउंड के होते हैं, जो साइबर फ्रॉड के लिए उपयुक्त माने जाते हैं। यदि किसी युवा को धमकी या जबरदस्ती साइबर अपराध कराया गया, तो वह स्वयं मानव तस्करी का पीड़ित है, न कि अपराधी। इसलिए पीड़ितों की सुरक्षा और पुनर्वास पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।
सरकार कर रही है प्रयास
भारत सरकार समस्या की गंभीरता से परिचित है। यही वजह है कि सरकार ने समय-समय पर संबंधित देशों की सरकारों के साथ इस मुद्दे को उठाया है। पीड़ितों को बचाने के लिए अभियान भी चलाया है। विदेश मंत्रालय समय-समय पर फर्जी नौकरी के बारे में सलाह और सोशल मीडिया पोस्ट जारी करता रहता है। इसी तरह की सूचनाएं विदेश स्थित संबंधित भारतीय मिशन-केंद्र भी अपनी आधिकारिक वेबसाइटों, सोशल मीडिया हैंडल और प्रिंट मीडिया के माध्यम से जारी करते रहते हैं। लोगों को सतर्क करने के लिए ई-माइग्रेट पोर्टल पर अपंजीकृत भर्ती एजेंटों की एक सूची अधिसूचित की गई है। पीड़ित व्यक्तियों द्वारा दर्ज की गई शिकायतों और विदेशों में स्थित हमारे मिशनों-केंद्रों से प्राप्त जानकारी के आधार पर इस जानकारी को नियमित रूप से अपडेट भी किया जाता है। अवैध एजेंटों और संदिग्ध फर्मों के खिलाफ शिकायतें संबंधित राज्य सरकारों और अन्य एजेंसियों जैसे कि आई4सी तथा गृह मंत्रालय के साथ उचित कार्रवाई के लिए नियमित रूप से साझा की जाती हैं।
युवाओं की जिम्मेदारी कम नहीं
साइबर विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार की सक्रियता के बावजूद युवाओं को खुद भी जिम्मेदारी समझनी होगी। विदेश में नौकरी का प्रस्ताव मिलने पर उनको कई सावधानियां बरतनी चाहिए। सबसे पहले भर्ती एजेंसी की वैधता की जांच करें कि क्या एजेंसी पंजीकृत है और विदेश मंत्रालय की वेबसाइट पर उसका विवरण उपलब्ध है। कंपनी और नियोक्ता का नाम, पता, वेबसाइट और संपर्क विवरण सत्यापित करें। वीजा और अनुबंध की वैधता, नौकरी का अनुबंध, वेतन और कार्य शर्तें स्पष्ट हों। पासपोर्ट, वीजा, टिकट और अन्य दस्तावेजों की जांच करें। बिना जांच के किसी एजेंट को पैसा न दें।






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