थाली से अस्पताल तक…आखिर कहां हो रही है चूक?
हम जो खा रहे हैं, क्या वही धीरे-धीरे हमें बीमार भी बना रहा है? मिलावटी खाद्य पदार्थ, रसायनों का बढ़ता उपयोग, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड, शर्करा युक्त पेय और बदलती खानपान की आदतों के बीच यह सवाल पहले से...

सवाल देश की सेहत का
कल्पना कीजिए…
सुबह एक बच्चा उठता है। मां प्यार से उसके हाथ में पैकेट वाला जूस थमा देती है। स्कूल जाते समय उसके बैग में चिप्स और बिस्कुट रख दिए जाते हैं। दोपहर में भूख लगती है तो बाजार का तैयार भोजन मिल जाता है। शाम को दोस्तों के साथ शीतल पेय और तले हुए स्नैक्स, फिर रात को जल्दी बनने वाला पैकेटबंद भोजन।
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माता-पिता को लगता है कि बच्चा भरपेट खा रहा है। लेकिन क्या सचमुच वह पौष्टिक भोजन कर रहा है, या धीरे-धीरे अपने शरीर में बीमारियों की नींव रख रहा है?
यह केवल एक बच्चे की कहानी नहीं, बल्कि आज करोड़ों भारतीय परिवारों की बदलती जीवनशैली का चित्र है।
इसी बीच लगभग हर सप्ताह देश के किसी-न-किसी हिस्से से खाद्य पदार्थों में मिलावट की खबरें सामने आती हैं। कहीं हजारों लीटर मिलावटी दूध पकड़ा जाता है, कहीं नकली घी बनाने वाली फैक्ट्री का भंडाफोड़ होता है, कहीं मसालों में मिलावट मिलती है, तो कहीं मिठाइयों और खाद्य तेलों के नमूने जांच में फेल हो जाते हैं। त्योहारों और बड़े आयोजनों के दौरान ऐसी खबरें और बढ़ जाती हैं।
दूसरी ओर अस्पतालों में कैंसर, हृदय रोग, मधुमेह, मोटापा, फैटी लिवर और पाचन संबंधी बीमारियों के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है।
क्या इन दोनों तस्वीरों का आपस में कोई संबंध है?
ये वे सवाल हैं जिन्हें हम लंबे समय से टालते आए हैं। क्योंकि यदि भोजन ही सुरक्षित नहीं रहेगा तो आधुनिक अस्पताल और महंगी दवाइयां भी समाज को पूरी तरह स्वस्थ नहीं बना पाएंगी।
जब बाजार रसोई से बड़ा हो गया
कुछ दशक पहले तक भारतीय थाली की पहचान मोटे अनाज, दाल, मौसमी सब्जियों, छाछ, ताजा भोजन और घर की रसोई से होती थी। आज उसकी जगह तेजी से पैकेटबंद खाद्य पदार्थ, अत्यधिक चीनी, नमक और वसा वाले उत्पाद, इंस्टेंट भोजन तथा अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड लेते जा रहे हैं। सुविधा ने स्वाद तो बढ़ाया है, लेकिन क्या उसने स्वास्थ्य भी बेहतर किया है? यह ऐसा सवाल है, जिस पर गंभीर चर्चा की आवश्यकता है।
स्वास्थ्य पर सीधा हमला है मिलावट
समस्या केवल बदलती जीवनशैली की नहीं है। खाद्य मिलावट भी उतनी ही गंभीर चुनौती बन चुकी है। नकली दूध, सिंथेटिक घी, मिलावटी मसाले, कृत्रिम रंगों से चमकाई गई मिठाइयां, मिलावटी तेल और अन्य खाद्य पदार्थ समय-समय पर जांच एजेंसियों की कार्रवाई में सामने आते रहे हैं। हर बार कुछ दिनों तक चर्चा होती है, फिर मामला ठंडा पड़ जाता है।
लेकिन सवाल यह है कि जो मिलावट पकड़ में आ जाती है, उसके अलावा कितना ऐसा खाद्य पदार्थ हमारे घरों तक पहुंच जाता होगा, जिसकी कभी जांच ही नहीं होती?
यह केवल आर्थिक अपराध नहीं है। यदि कोई जानबूझकर ऐसा खाद्य पदार्थ बेचता है, जिससे लोगों का स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है, तो यह समाज के साथ गंभीर अन्याय है। मिलावट का नुकसान तुरंत दिखाई नहीं देता, लेकिन लंबे समय में यह अनेक गंभीर बीमारियों की जमीन तैयार कर सकता है।
खेत से थाली तक रसायनों का लंबा सफर
खेती में रासायनिक कीटनाशकों और उर्वरकों के बढ़ते उपयोग पर भी संतुलित चर्चा जरूरी है। किसानों की अपनी मजबूरियां हैं। उन्हें अधिक उत्पादन चाहिए, फसल को कीटों से बचाना होता है और बाजार की प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है। दूसरी ओर उपभोक्ता यह जानना चाहता है कि उसकी थाली तक पहुंचने वाले फल और सब्जियां कितनी सुरक्षित हैं।
इसलिए समाधान केवल किसान को दोषी ठहराने में नहीं, बल्कि ऐसी कृषि व्यवस्था विकसित करने में है, जिसमें उत्पादन भी बना रहे और स्वास्थ्य भी सुरक्षित रहे।
पैकेट का स्वाद, सेहत पर भारी?
एक और बड़ी चुनौती है अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड। रंग, स्वाद, सुगंध और लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए तैयार किए गए ऐसे खाद्य पदार्थ बच्चों और युवाओं की पहली पसंद बनते जा रहे हैं। बाजार और विज्ञापन उनकी आकर्षक दुनिया गढ़ते हैं। नतीजा यह है कि फल और घर का बना नाश्ता पीछे छूटता जा रहा है, जबकि पैकेटबंद स्नैक्स और मीठे पेय तेजी से जगह बना रहे हैं।
आज अनेक चिकित्सक इस बात पर चिंता व्यक्त करते हैं कि कम उम्र में मोटापा, फैटी लिवर, प्री-डायबिटीज और अन्य जीवनशैली संबंधी समस्याएं पहले की तुलना में अधिक देखने को मिल रही हैं। इन समस्याओं के कई कारण हैं- भोजन, शारीरिक निष्क्रियता, तनाव और नींद की कमी। इसलिए किसी एक कारण को दोष देना उचित नहीं होगा, लेकिन भोजन की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
बच्चे सबसे आसान निशाने पर
सबसे अधिक चिंता बच्चों को लेकर है। जिस उम्र में उन्हें ताजा भोजन, दूध, दाल, फल और खेलकूद की जरूरत होती है, उस उम्र में वे मोबाइल, पैकेटबंद खाद्य पदार्थ और शीतल पेय के बीच बड़े हो रहे हैं। यदि यही प्रवृत्ति जारी रही तो आने वाले वर्षों में देश को गंभीर जनस्वास्थ्य चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
कानून हैं, लेकिन डर क्यों नहीं?
अब सवाल सरकार और व्यवस्था से भी जुड़ता है। भारत में खाद्य सुरक्षा के लिए कानून मौजूद हैं। समय-समय पर नमूने लिए जाते हैं, कार्रवाई होती है और दोषियों पर जुर्माना तथा अन्य दंड भी लगाए जाते हैं। लेकिन क्या यह व्यवस्था इतनी प्रभावी है कि मिलावट करने वालों में कानून का भय पैदा हो? क्या जांच की गति पर्याप्त है? क्या दोषियों को समय पर सजा मिलती है? क्या उपभोक्ता को यह जानकारी आसानी से उपलब्ध होती है कि वह जो खरीद रहा है, उसकी गुणवत्ता कैसी है?
इन प्रश्नों पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।
यूरोप से सीख, भारत क्या कर सकता है?
दुनिया के कई देशों ने खाद्य सुरक्षा को केवल कानून का नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य का विषय माना है। कुछ यूरोपीय देशों में खाद्य लेबल अधिक स्पष्ट बनाए गए हैं, ट्रांस फैट पर कड़े नियंत्रण लागू किए गए हैं, बच्चों को लक्षित जंक फूड के विज्ञापनों पर प्रतिबंध या सीमाएं लगाई गई हैं और नियमित निगरानी पर विशेष जोर दिया गया है। भारत की परिस्थितियां अलग हैं, लेकिन इन अनुभवों से सीख अवश्य ली जा सकती है।
समाधान केवल सरकार के पास भी नहीं है। इसकी शुरुआत हमारे घर से होती है। यदि हम स्थानीय और ताजा भोजन को प्राथमिकता दें, बच्चों को पैकेट के बजाय रसोई से जोड़ें, खाद्य लेबल पढ़ने की आदत विकसित करें और मिलावट की शिकायतों को गंभीरता से दर्ज कराएं, तो स्थिति में बदलाव आ सकता है।
साथ ही सरकार को खाद्य जांच की क्षमता बढ़ानी होगी, मिलावट करने वालों के विरुद्ध त्वरित और कठोर कार्रवाई सुनिश्चित करनी होगी तथा स्कूलों में पोषण शिक्षा को प्रभावी ढंग से लागू करना होगा।
अब इलाज नहीं, बचाव की संस्कृति चाहिए
स्वास्थ्य नीति का केंद्र केवल अस्पताल और इलाज नहीं, बल्कि स्वस्थ नागरिक होने चाहिए। किसी भी विकसित समाज की पहचान उसके अस्पतालों की संख्या से नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के स्वास्थ्य से होती है।
सच तो यह है कि हर बीमारी की शुरुआत अस्पताल से नहीं होती। उसकी शुरुआत अक्सर हमारी थाली से होती है।
यदि थाली सुरक्षित होगी, तो दवा की जरूरत कम पड़ेगी। यदि भोजन शुद्ध होगा, तो अस्पतालों पर बोझ भी घटेगा।
स्वस्थ भारत का सपना केवल नई चिकित्सा तकनीकों से पूरा नहीं होगा। उसकी शुरुआत खेत से होगी, बाजार से होगी, रसोई से होगी और हमारी रोजमर्रा की भोजन संबंधी आदतों से होगी।
आखिरकार, सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि हम क्या खा रहे हैं। असली सवाल यह है कि हम अपने बच्चों और आने वाली पीढ़ियों के लिए कैसी थाली छोड़कर जा रहे हैं। क्योंकि भारत का स्वास्थ्य अस्पतालों में नहीं, सबसे पहले उसकी थाली में तय होगा।






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