वृहत् सांस्कृतिक मनीषा का पर्याय है हिन्दी
हिन्दी केवल भाषा नहीं, भारतीय संस्कृति, इतिहास और चिंतन की जीवंत अभिव्यक्ति है। इसकी समावेशी प्रकृति ने इसे विविध भाषाओं और बोलियों को आत्मसात करने वाली शक्ति दी...

हिन्दी दिवस (14 सितम्बर)
डॉ. राकेश तैलंग,
शिक्षाविद् एवं पूर्व शिक्षा अधिकारी
हिन्दी मात्र एक भाषा नहीं, वह भारतीय इतिहास, दर्शन, संस्कृति की अभिव्यक्ति का एक शाब्दिक, अनुभूतिपरक व संप्रेषणीय सार्थक प्रस्तुति शैलियों का सशक्त माध्यम है और स्वयं में एक वृहत् सांस्कृतिक मनीषा का पर्याय ही है। ग्यारहवीं शताब्दी में तलवारों की खनखनाहटों के साथ वीरगाथाओं और आल्हा के माध्यम से जोश की अभिव्यक्ति बन पन्द्रहवीं सदी में सूर, मीरां और तुलसी की जुबां पर कृष्ण और राम की भक्ति का गान करती हुई सत्रहवीं शताब्दी तक आते-आते अलंकार, छंद, रस, रीति से दरबारों की प्रिय ललित ललाम अभिव्यक्ति बन गई हिन्दी। कब भारतीय स्वतंत्रता के ओजस्वी गान का माध्यम बन कभी बदलते भारतीय समाज के विकास की गाथा तो कभी नक्षत्रों से निमंत्रण देती मौन अनुभूत ईश्वरीय छाया की रहस्यात्मक अभिव्यक्ति बन कवि वाणी में फूटकर शनै:-शनै: आधुनिक समाज के विविध रंगों से स्नात हो आधुनिकता बोध की व्यंजना का माध्यम बन गयी, पता ही न चला। ऐसी विविध रूपा हिन्दी प्रतिदिन कथित आधुनिक भारतीयों द्वारा अपमानित होते रहने के बाद आज भी हिन्दी इन कूढ़मगजों के मानवीय एहसासों को सरलता के साथ व्यक्त करने का कार्य कर रही है। इस भाषा के बिना हर्षवर्धन युग से लेकर अब तक के साहित्य-सृजन और प्रयोजनमूलक सभी विषयों पर हुए लेखन को समझना कठिन है। इसे उपेक्षित करने वालों के अभिव्यक्ति-स्तर को समझने का प्रयास करें। सच तो यह कि इन भाषाओं की प्रकृति को जानने समझने की तहज़ीब ही पैदा की नहीं। फिर अपनी अभिव्यक्ति के लिये प्रभावी सम्प्रेषण की भाषा का चयन तो बहुत दूर की बात है। ऐसे शून्य में अभिव्यक्ति के तीर छोड़ने वालों के लिए “अंतःप्रेक्षण” (यह शब्द इनको समझ नहीं आएगा) का दिन है आज।
इन पंक्तियों के लेखक को ऐसा प्रतीत होता है कि किसी भी अभिव्यक्ति के मौलिक या लिखित माध्यम की प्रभावी सम्प्रेषणीयता का एक प्रधान मानक है उसकी बहिर्मुखता या समाहारमूलक प्रकृति। अन्य शब्दों में हिन्दी संस्कृत के समान संश्लेषणात्मक भाषा न होकर विश्लेषणात्मक अथवा विरल भाषा है। और अधिक स्पष्ट कहें तो अन्य भाषाओं व बोलियों को स्वयं में समाहित या स्वीकार करने की दिशा में अत्यधिक उदार है। यह विशेषता हिन्दी के शब्दकोश के विस्तार का कारण बनी है और अन्य भाषाभाषियों, वैदेशिक, प्रान्तीय, आंचलिक- सभी के लिए स्वीकार और वह भी सुमन व सुगन्ध के रूप में स्वीकार का कारण बनी है। ऐसी समाहारी प्रकृति वाली हिन्दी हमारी भाषा हो, यह गौरव का विषय क्यों न हो?
हिन्दी मिलनसार भी, सर्वसमावेशी भी
हम भारतीयों की भांति हमारी हिन्दी भी मिलनसार भी है, सर्वसमावेशी भी है। अन्य भाषाओं व बोलियों के प्रति यह उदार व्यवहार हिन्दी की प्रकृति व प्रवृत्ति है। जीवित भाषाएं इसी निपुणता से एक विशेष शिल्प, बहिर्मुख और स्वीकार-सहकार की राह पर चलकर नेतृत्व की डोर देर ही सही, अपने हाथ में लेकर बढ़ सकती हैं।
क्योंकि निरंतर विकसित होते जा रहे हिन्दी शब्दकोश ने हमारी हिन्दी को भाव व भाषागत अभिव्यक्ति शिल्प की दृष्टि से बहुत अधिक सम्प्रेषणीय बनाया है, अतएव हमें हिन्दी प्रयोग से किसी को भी प्रभावित व उत्प्रेरित करने में कोई समस्या नहीं हो सकती। यह भाषायी अभिव्यक्ति में नैपुण्य हमारी भाषा की अन्तर्हित क्षमता है। इस पर हमें गौरवान्वित होना चाहिये। यह आत्मविश्लेषण का विषय है कि भाव-विचार, शैली, प्रस्तुति की नवीन प्रविधियां हिन्दी भाषा, साहित्य व व्यावहारिक व्याकरण (Functional Grammar) के क्षेत्र में कैसे नए से नए अभिव्यक्ति परिदृश्य खोल सकती हैं? यह व्यापकता हिन्दी में अन्य भाषा-साहित्य व परिभाषिक शब्दावलियों के लिए स्वयं के निरंतर विकसित होते जा रहे शब्दकोश के कारण विपुल संभावनाएं प्रशस्त कर सके, ऐसी उम्मीद हम कर सकते हैं।






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