कॉपीकैट नहीं, विवेकशील बनें
जीवन में अनेक समस्याओं का कारण है- खुद को न पहचानकर, दूसरों जैसा बनने की चाहत पालना। खुद की तुलना दूसरों से करना। यह गलत है। गाय घास खाती है और पुष्ट हो जाती है, लेकिन अगर श्वान घास खाता है तो वह मर...

जीवन प्रबंध
हर व्यक्ति अद्वितीय है, अलग है और सम्पूर्ण प्रकृति से कहीं न कहीं कनेक्टेड है। इसका अभिप्राय है कि जब हर व्यक्ति विशिष्ट है, अद्भुत है तो फिर वह दूसरों जैसा बनने का प्रयास क्यों करे? पूरे विश्व में किन्हीं दो व्यक्तियों के फिंगरप्रिंट आपस में एक जैसे नहीं होते। इसका अर्थ है हर व्यक्ति अद्भुत है और ईश्वर ने उसे कुछ नया करने को भेजा है। यदि ऐसा है तो किसी की नकल कर भेड़चाल में क्यों उलझना?
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जीवन में अनेक समस्याओं का कारण है- खुद को न पहचानकर, दूसरों जैसा बनने की चाहत पालना। खुद की तुलना दूसरों से करना। यह गलत है। गाय घास खाती है और पुष्ट हो जाती है, लेकिन अगर श्वान घास खाता है तो वह मर जाता है। जो वस्तु एक के लिए अमृत है, वही दूसरे के लिए विष हो सकती है। सबका अपना जीवन, प्राथमिकताएं और इच्छाएं हैं। दूसरे का व्यक्तित्व, कृतित्व और सामाजिक स्थिति आपसे भिन्न है तो तुलना काहे की? ईश्वर ने आपको जो उपहार, प्रतिभा और शक्ति दी है, उस पर ध्यान दें, दूसरों को मिले आशीर्वाद से ईर्ष्या न करें और भेड़चाल में न पड़ें। भेड़चाल या नकल इंसान की सर्जनात्मक शक्ति खत्म कर देती है।
क्या है भेड़चाल?
भेड़ बनने का अर्थ है बिना सोचे समझे किसी भी व्यक्ति, सिद्धांत या कार्य को फॉलो करना। कोई सिद्धांत भले ही अपने व्यक्तित्व से मेल खाए या न खाए, अच्छा लगे या न लगे; फिर भी उसे सिर्फ इसलिए स्वीकारना क्योंकि अन्यजनों ने भी इसे स्वीकार किया हुआ है। वर्तमान युवा इस बीमारी में त्रस्त है। “फीयर ऑफ़ मिसिंग आउट: फोमा” यानी “कहीं मैं अकेला न पड़ जाऊं” के भय से कुछ भी स्वीकार लेना गलत है। अकेले पड़ जाने के इस भय और आत्मविश्वास की कमी के चलते आज युवा वर्ग भेड़ बनने की ओर अग्रसर है। मैनेजमेंट की कहावत है, “नेवर इमीटेट, ऑलवेज़ क्रीएट।” यानि सृजन करें और नया सोचें। “सभी दिशाओं से उत्तम विचार मेरे मस्तिष्क में आते रहें”, यह तो भारतीय दर्शन का प्राणसत्त्व है। अतः नए विचारों का स्वागत करना और खुद को किसी परिपाटी में न बांधना आज की आवश्यकता है।
क्या कहता है शोध?
लियोन फेस्टिंगर की सोशल कम्पेरिजन थ्योरी के अनुसार, लोग खुद का मूल्यांकन करने के लिए दूसरों से तुलना करते हैं। जब यह तुलना “अपवर्ड कम्पैरिजन” अर्थात अपने से बेहतर दिखने वाले लोगों की नकल करने की ओर ले जाती है; तो इससे ईर्ष्या, हीनभावना और चिंता जन्म लेती है।
अल्बर्ट बंडुरा की सोशल लर्निंग थ्योरी के डॉल एक्सपेरिमेंट के अनुसार, जो लोग बिना विवेक के दूसरों का अनुकरण करते हैं तो वे अपनी “सेल्फ एफिकेसी” अर्थात खुद की क्षमता पर भरोसा करने की शक्ति खो देते हैं।
कथा कौवे की
एक कौवे को अपने काले कलूटे रूप से नफरत थी। एक दिन उसने कहीं मोरपंख पड़े देखे। स्वयं को तो वह मोरों से कमज़ोर समझता ही था। ऐसे में उसने कुछ मोरपंख अपनी पूंछ के पास चिपका दिए और सभी से कहने लगा कि वो भी मोर है। यह बात मोरों को नागवार गुज़री, क्योंकि उसने नक़ल की थी। अतः मोरों ने उसे पीटा। अब कौवा इसकी शिकायत लेकर प्रधान कौवे के पास गया तो प्रधान कौवे ने कहा कि जिस कौवे को अपने कुल और राष्ट्र पर ही गर्व नहीं है तो ऐसे कौवे का क्या मोल? अतः कौवों ने भी उस नकलची कौवे की पिटाई कर डाली। संकेत समझें कि बिना अकल के की गई नकल मुसीबत में डाल सकती है।
ज़रा सोचिये। शेर और शार्क दोनों पेशेवर शिकारी हैं, लेकिन शेर महासागर में शिकार नहीं कर सकता और शार्क जंगल में शिकार नहीं कर सकती। अब क्या यह कहना तर्कसंगत लगता है कि शेर चूंकि सागर में शिकार नहीं कर सकता, अतः वो तो बेकार है? शायद नहीं। यही स्थिति हमारी है। हम भी किसी न किसी कार्य में उत्कृष्ट होते ही हैं। आवश्यकता उस उत्कृष्टता को पहचानने की है।
नियंता कौन?
अपने जीवन को दूसरों द्वारा नियंत्रित होने देने का अर्थ है आत्मविश्वास में कमी। यह कमी ही मनुष्य को गलत और अवांछनीय कार्यों की ओर अग्रसर करती है। दूसरों द्वारा नियंत्रित कठपुतली न बनें। युवाओं में नशे की प्रवृत्ति, अनैतिक कार्य करने में सहमति के पीछे सबसे बड़ी वजह भेड़ बनना ही है। नशे की प्रवृत्ति की जन्मदाता; भेड़ बनने की प्रवृत्ति ही है। यह मानसिक गुलामी का संकेत है। मानसिक दासता से ग्रस्त न हों। दासता का अर्थ है कि आपके स्वयं के तो कोई विचार हैं ही नहीं? आपकी कोई सोच है ही नहीं। आपको कोई भी बरगला सकता है। सही और गलत में भेद करने की अपने विवेक की ताकत का इस्तेमाल किए बगैर किसी की भी बात मान लेना क्या खुद को धोखा देना नहीं है? भीड़ में अकेले खड़े होकर सही को सही और गलत को गलत कहने का साहस विकसित करना ही मनुष्य होना है। रीढ़ की हड्डी को इतना भी लचीला न बनाएं कि सीधा खड़ा होना ही दुश्वार लगे। स्वयं पर विश्वास रखें और भेड़ होने से बचें। यही जीवन मन्त्र है।






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