पर्यटन अब संस्कृति, अनुभव और जीवनशैली का नया संगम
डा. मुदिता पोपली,
पत्रकार एवं लेखिका
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राजस्थान को लंबे समय तक केवल किलों, महलों, ऊंटों और लोकनृत्य वाले पर्यटन राज्य के रूप में देखा जाता रहा। यहां आने वाले पर्यटक कुछ दिन बिताते, ऐतिहासिक धरोहरें निहारते, लोकसंगीत सुनते और लौट जाते थे। लेकिन अब राजस्थान का पर्यटन बदल रहा है। पर्यटक अब यहां की संस्कृति को दूर से देखने नहीं, बल्कि उसे महसूस करने और उसमें कुछ समय तक जीने की इच्छा लेकर आ रहे हैं।
राजस्थान के कई शहर इस बदलाव के केंद्र बनते जा रहे हैं। जयपुर, जैसलमेर, जोधपुर, बीकानेर और शेखावाटी क्षेत्र में पर्यटन का स्वरूप अब पहले जैसा नहीं रहा। अब पर्यटक केवल बड़े होटल और प्रसिद्ध पर्यटन स्थल नहीं खोज रहे, बल्कि वे असली लोकजीवन, पुरानी गलियां, पारंपरिक भोजन, लोकसंगीत और ग्रामीण संस्कृति को करीब से समझना चाहते हैं। इस बदलते पर्यटन मॉडल की सबसे रोचक तस्वीर बीकानेर में दिखाई दे रही है। लंबे समय तक बीकानेर को केवल भुजिया, ऊंट और जूनागढ़ किले वाले शहर के रूप में देखा जाता रहा। लेकिन अब बीकानेर की पर्यटन पहचान तेजी से बदल रही है। यह शहर अब केवल घूमने की जगह नहीं रहा बल्कि अनुभव करने वाला सांस्कृतिक केंद्र बनता जा रहा है।
देहाती जीवन बना आकर्षण का केन्द्र
हजार हवेलियों के शहर के रूप में पहचाने जाने वाले बीकानेर की पुरानी गलियां, हवेलियां, चौक और देहाती जीवन अब पर्यटकों के लिए सबसे बड़ा आकर्षण बनते जा रहे हैं। यहां पर्यटक उस असली राजस्थान को तलाश रहे हैं जो बड़े शहरों की चमक से दूर है। यही वजह है कि यहां अनुभव आधारित पर्यटन तेजी से उभर रहा है। लोग अब केवल होटल में ठहरना नहीं चाहते, बल्कि पुराने मोहल्लों की सुबह, चौखटों पर बैठी बुजुर्ग पीढ़ी की बातचीत, मिट्टी के चूल्हे पर बनती रोटियां और लोकगीतों की जीवंत धुनों को महसूस करना चाहते हैं। बीकानेर के पुराने शहर में स्थित अनेक पुश्तैनी हवेलियां अब नए रूप में सामने आ रही हैं। जिन हवेलियों में कभी बड़े परिवारों की रौनक होती थी वहां अब हेरिटेज होम स्टे, सांस्कृतिक कैफे और कला केंद्र विकसित हो रहे हैं। लकड़ी के पुराने दरवाजे, रंगीन झरोखे, चौक में बनी बैठकें और दीवारों पर बनी पारंपरिक चित्रकारी अब पर्यटन का नया आकर्षण बन चुके हैं। पर्यटक यहां केवल ठहरते नहीं बल्कि उस दौर की जीवनशैली को समझने की कोशिश करते हैं।
दरअसल यह बदलाव केवल बीकानेर तक सीमित नहीं है। जैसलमेर, जोधपुर और शेखावाटी क्षेत्र में भी बड़ी संख्या में लोग अपनी पुरानी हवेलियां छोड़कर नई कॉलोनियों में बस चुके हैं। जिन हवेलियों को कभी बोझ समझा जा रहा था वहीं अब वे सांस्कृतिक पूंजी बनती जा रही हैं। राजस्थान में ‘हेरिटेज होम स्टे’ और ‘हेरिटेज होटल’ का नया ट्रेंड तेजी से बढ़ रहा है। लोग अपनी पुश्तैनी धरोहरों को तोड़ने की बजाय उन्हें संरक्षित कर पर्यटन से जोड़ रहे हैं। इससे रोजगार भी बढ़ रहा है और पुरानी स्थापत्य कला भी बच रही है।
विदेशी पर्यटकों के व्यवहार में भी बड़ा बदलाव दिखाई दे रहा है। पहले जहां विदेशी पर्यटक केवल जयपुर या जैसलमेर तक सीमित रहते थे, वहीं अब वे अपेक्षाकृत शांत और कम भीड़भाड़ वाले शहरों की ओर आकर्षित हो रहे हैं। बीकानेर और जैसलमेर में कई विदेशी पर्यटक अब कई दिनों या महीनों तक रुक रहे हैं। वे केवल किले देखने नहीं आते बल्कि स्थानीय संस्कृति को समझने आते हैं। कुछ लोग मंगणियार और लंगा कलाकारों से लोकसंगीत सीख रहे हैं तो कुछ ऊंट पालन, उस्ता कला, मिनिएचर आर्ट, पारंपरिक भोजन और ग्रामीण जीवनशैली को समझने में रुचि दिखा रहे हैं।
लोकप्रिय हुआ ‘स्लो टूरिज्म’ का ट्रेंड
जैसलमेर और बाड़मेर क्षेत्र में ‘स्लो टूरिज्म’ का ट्रेंड तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। पर्यटक अब जल्दबाजी में घूमने के बजाय किसी स्थान को धीरे-धीरे महसूस करना चाहते हैं। सुबह गांव की चाय, दोपहर में लोककला, शाम को लोकसंगीत और रात में रेगिस्तान की शांति। यह नया पर्यटन अनुभव लोगों को आकर्षित कर रहा है। यही कारण है कि अब राजस्थान केवल दर्शनीय स्थलों का राज्य नहीं बल्कि अनुभवों का प्रदेश बनता जा रहा है।
ग्रामीण पर्यटन भी अब तेजी से उभर रहा है। बीकानेर, बाड़मेर, नागौर और शेखावाटी क्षेत्र के गांव अब पर्यटन मानचित्र पर जगह बनाने लगे हैं। गांवों की मिट्टी की खुशबू, पारंपरिक खानपान, पशुपालन संस्कृति और लोककलाएं अब पर्यटकों को आकर्षित कर रही हैं। कई जगह ग्रामीण महिलाएं पर्यटकों को बाजरे की रोटी, खीचड़ा और पारंपरिक व्यंजन बनाना सिखा रही हैं। यह बदलाव ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भी नई संभावनाएं पैदा कर रहा है।
सोशल मीडिया से मिली नई पहचान
सोशल मीडिया ने राजस्थान की इस नई पर्यटन पहचान को तेजी से आगे बढ़ाया है। इंस्टाग्राम और यूट्यूब के दौर में लोग ऐसी जगहें तलाश रहे हैं जो भीड़ से अलग हों और जहां ‘रियल एक्सपीरियंस’ मिले। यही कारण है कि अब पुरानी गलियां, भुजिया बनाने की पारंपरिक इकाइयां, मिट्टी के घर, ऊंटों के साथ रेतीले दृश्य और गांवों की साधारण जिंदगी भी पर्यटन कंटेंट का हिस्सा बन रही है। कई युवा ट्रैवल ब्लॉगर अब राजस्थान को केवल राजमहलों का नहीं बल्कि “ऑथेंटिक कल्चर” का प्रदेश बताने लगे हैं।
राजस्थान में पर्यटन का एक और नया आयाम ‘एस्ट्रो टूरिज्म’ के रूप में सामने आ रहा है। जयपुर और उसके आसपास के क्षेत्रों में अब तारों और अंतरिक्ष आधारित पर्यटन को विकसित करने की दिशा में काम हो रहा है। शहरों की कृत्रिम रोशनी और भागदौड़ से दूर लोग अब साफ आसमान के नीचे तारों को देखने का अनुभव तलाश रहे हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि राजस्थान का विशाल रेगिस्तानी क्षेत्र और साफ वातावरण इस क्षेत्र के लिए बेहद अनुकूल है। आने वाले समय में रेगिस्तान की रातें केवल लोकगीतों के लिए नहीं बल्कि ‘स्टार गेजिंग’ के लिए भी पहचानी जा सकती हैं। इसके साथ ही वेलनेस टूरिज्म भी धीरे-धीरे राजस्थान में जगह बना रहा है। कई पर्यटक अब यहां शांति, योग, ध्यान और प्राकृतिक जीवनशैली की तलाश में आ रहे हैं। ग्रामीण परिवेश में बने रिसॉर्ट और सांस्कृतिक केंद्र अब लोकसंस्कृति के साथ मानसिक सुकून और स्वास्थ्य आधारित अनुभव भी जोड़ रहे हैं।
हालांकि इस पूरे बदलाव के बीच कुछ चिंताएं भी मौजूद हैं। कई जगह संस्कृति केवल प्रदर्शन बनकर रह जाती है। सोशल मीडिया आधारित पर्यटन के कारण कुछ स्थानों पर मूल सांस्कृतिक स्वरूप प्रभावित होने का खतरा भी बढ़ रहा है। चुनौती यह है कि आधुनिक पर्यटन और असली सांस्कृतिक पहचान के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। फिर भी यह स्पष्ट है कि राजस्थान का पर्यटन अब नए मोड़ पर खड़ा है। यहां अब केवल इतिहास नहीं बिक रहा बल्कि अनुभव, अपनापन और संस्कृति की आत्मा लोगों को आकर्षित कर रही है।







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