क्या पाकिस्तान के हाथ से फिसल रहा है पीओके?
पीओके में पाकिस्तान विरोधी प्रदर्शनों ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या वहां के लोग भारत में शामिल होना चाहते हैं, क्या अलग देश बनने की मांग मजबूत हो रही है, या इसके पीछे कोई बड़ी रणनीतिक चाल...

पीओके में बढ़ते असंतोष के बीच भविष्य के संभावित परिदृश्य
पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) एक बार फिर वैश्विक चर्चा के केंद्र में है। पाकिस्तान विरोधी प्रदर्शन, सरकार के खिलाफ नारेबाजी और भारत को लेकर उठती चर्चाओं ने सोशल मीडिया पर दावों और अटकलों का बाजार गर्म कर दिया है। आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पीओके में बढ़ता असंतोष पाकिस्तान की पकड़ को कमजोर करने लगा है? और यदि ऐसा होता है, तो क्या वह भारत में शामिल होगा या एक स्वतंत्र देश के रूप में उभरेगा? इन सुलगते सवालों के जवाब भावनाओं में नहीं, बल्कि जमीनी भू-राजनीति में छिपे हैं।
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क्या यह भारत समर्थक आंदोलन है?
अंतरराष्ट्रीय मामलों के अधिकांश विशेषज्ञ मानते हैं कि फिलहाल पीओके में चल रहा आंदोलन सीधे तौर पर भारत समर्थक नहीं, बल्कि पाकिस्तान की व्यवस्था के खिलाफ है। वहां के नागरिकों की मुख्य शिकायतें बुनियादी जरूरतों से जुड़ी हैं, जैसे आसमान छूती महंगाई, बेरोजगारी, बिजली और आटे पर भारी टैक्स, सीमित राजनीतिक अधिकार और स्थानीय संसाधनों पर इस्लामाबाद का एकतरफा नियंत्रण।
इसके साथ ही वहां पाकिस्तानी सेना का बढ़ता हस्तक्षेप स्थानीय लोगों को रास नहीं आ रहा है। यानी, असंतोष वास्तविक और गहरा है, लेकिन इसका यह अर्थ निकाल लेना जल्दबाजी होगी कि पूरा पीओके भारत में विलय के लिए तैयार बैठा है।
क्या यह पाकिस्तान की कोई नई चाल है?
यहीं एक दूसरा महत्वपूर्ण सवाल उठता है, क्या पाकिस्तान इस पूरे घटनाक्रम का इस्तेमाल किसी नई रणनीति के लिए कर सकता है? इतिहास में कई अवसरों पर पाकिस्तान के आंतरिक राजनीतिक या आर्थिक संकट के दौरान भारत के साथ तनाव बढ़ने की घटनाएं भी देखने को मिली हैं। इसलिए रणनीतिकार इस आशंका को पूरी तरह खारिज नहीं करते कि भविष्य में अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए पाकिस्तान इस असंतोष को कोई नया रंग दे दे। हालांकि, इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण फिलहाल सामने नहीं हैं। लेकिन रणनीतिक विश्लेषक इसे एक संभावित परिदृश्य के रूप में देखते हैं।
चीन का दांव और वैश्विक रुख
इस पूरे समीकरण में चीन की चिंताएं सबसे अलग और बड़ी हैं। चीन का अरबों डॉलर का निवेश ‘चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा’ (CPEC) इसी क्षेत्र से होकर गुजरता है। इसलिए बीजिंग की पहली प्राथमिकता किसी भी कीमत पर इस इलाके में स्थिरता बनाए रखना है। दूसरी ओर, अमेरिका और पश्चिमी देश भी इस संवेदनशील क्षेत्र में किसी बड़े भू-राजनीतिक बदलाव या सीमा परिवर्तन के पक्ष में नहीं हैं। उनका मानना है कि ऐसे किसी भी बड़े फेरबदल से दो परमाणु शक्ति संपन्न पड़ोसियों (भारत और पाकिस्तान) के बीच सैन्य टकराव का खतरा बढ़ सकता है।
वहीं भारत का आधिकारिक रुख वर्षों से स्पष्ट रहा है कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर भी कई अवसरों पर दोहरा चुके हैं कि जम्मू-कश्मीर पर भारत की संवैधानिक स्थिति में कोई बदलाव नहीं है और पाकिस्तान के साथ सामान्य संबंधों की पहली शर्त सीमा पार आतंकवाद का समाप्त होना है।
यदि पाकिस्तान का नियंत्रण हटा, तो क्या होगा?
अब सबसे रोचक और पेचीदा सवाल यह है कि यदि भविष्य में पीओके पाकिस्तान के नियंत्रण से बाहर हो जाता है, तो आगे के परिदृश्य क्या होंगे? इसके मुख्य रूप से दो रास्ते दिखाई देते हैं:
भारत में विलय का परिदृश्य:
यदि पीओके भारत में शामिल होता है, तो यह भारत के दशकों पुराने संवैधानिक और कानूनी दावे की सबसे बड़ी जीत होगी। भारत की संसद ने 1994 में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित कर स्पष्ट किया था कि पूरा जम्मू-कश्मीर, जिसमें पाकिस्तान के कब्जे वाला क्षेत्र भी शामिल है, भारत का अभिन्न अंग है। हालांकि, इस विलय के साथ ही भारत के सामने सुरक्षा, प्रशासनिक प्रबंधन, पुनर्वास और पाकिस्तान व चीन की संभावित प्रतिक्रिया जैसी बड़ी चुनौतियां भी होंगी।
स्वतंत्र राष्ट्र का परिदृश्य:
यदि पीओके एक स्वतंत्र देश बनता है, तो चारों तरफ जमीन से घिरा होने और कमजोर अर्थव्यवस्था के कारण उसके लिए आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनना बेहद कठिन होगा। ऐसा देश चीन या पाकिस्तान के प्रभाव में आकर भारत के लिए नया सामरिक जोखिम भी बन सकता है। यदि वह स्वयं को पूरे कश्मीर का प्रतिनिधि बताने लगे, तो घाटी में सक्रिय अलगाववादी ताकतों को भी नया राजनीतिक आधार मिल सकता है।
हालांकि, रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऐसा कोई देश कभी अस्तित्व में आता भी है, तो उसकी पहली और सबसे बड़ी लड़ाई भारत से टकराने की नहीं, बल्कि अपनी बदहाल अर्थव्यवस्था को संभालने और अंतरराष्ट्रीय मान्यता हासिल करने की होगी।
सोशल मीडिया बनाम जमीनी हकीकत
पीओके की वास्तविक तस्वीर फिलहाल सोशल मीडिया के दावों से कहीं अधिक जटिल है। वहां का असंतोष वास्तविक है, लेकिन उसकी अंतिम दिशा अभी स्पष्ट नहीं है। ऐसे में भारत के लिए यह उत्साह या आशंकाओं में बहने का नहीं, बल्कि धैर्य, सतर्कता और दूरदर्शिता के साथ पूरे घटनाक्रम पर नजर रखने का समय है। आखिर पीओके का भविष्य केवल पाकिस्तान ही नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की सामरिक राजनीति को भी प्रभावित कर सकता है।





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