आजादी की तीसरी लड़ाई
भारत की आजादी केवल तलवार और सत्याग्रह से नहीं मिली। साहित्यकारों, कवियों और पत्रकारों ने भी अपनी लेखनी से जनचेतना जगाकर स्वतंत्रता आंदोलन को वैचारिक शक्ति दी। यह उसी अनदेखे मोर्चे की कहानी...

अभिव्यक्ति- स्वाधीनता विशेष
दिनेश सिंदल,
कवि, लेखक
15 अगस्त 2026 हमारे देश की आजादी की 79वीं वर्षगांठ है। इस आजादी के लिए हमें कई मोर्चों पर लड़ना पड़ा।
पहला सशस्त्र आंदोलन 1857 में बहादुर शाह जफर के नेतृत्व में हुआ। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, मंगल पांडे, नाना साहब, तात्या टोपे, बेगम हजरत महल इत्यादि कई देशभक्तों ने अपने देश की आजादी के लिए अंग्रेजों से जमकर लोहा लिया।
दूसरा आंदोलन गांधी का अहिंसात्मक आंदोलन कहा जा सकता है। अन्याय व अत्याचार के खिलाफ अनशन, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और स्वदेशी अपनाने की अपील। इस आंदोलन का भी अंग्रेजों पर कुछ प्रभाव पड़ा। लेकिन इन दोनों के समानांतर एक तीसरा आंदोलन भी चलता रहा। वहां न शस्त्र था, न ही गांधी का चरखा। इस तीसरे मोर्चे पर देश की आजादी के लिए कलम लड़ रही थी। यह कवियों, शायरों व साहित्यकारों का मोर्चा था। यहां शस्त्र नहीं, शास्त्र की शक्ति काम कर रही थी। कविता सामाजिक विसंगतियों पर चोट करती है। शांति के समय वह गीत बनती है और संघर्ष के समय क्रांति का नारा।
सच्चे अर्थों में देश की आजादी के संघर्ष का ऐलान हिंदी की पत्र-पत्रिकाओं और हिंदी लेखकों की विविध कृतियों से ही हुआ। साहित्यकारों ने देश के लोगों में आजादी की चेतना जगाने का काम अपने कंधों पर लिया। भारतेंदु हरिश्चंद्र जैसे लेखकों ने अपनी रचनाओं से आंदोलन को धार दी। कवियों ने पराधीनता से मुक्त होने का बिगुल बजाया।
जब तक स्वराज हिंद में लाया न जाएगा,
शैतानी हुकूमत को मिटाया न जाएगा।
हर रोज हो रही है तबाही जो हिंद में,
मिट जाएंगे, गर इसको घटाया न जाएगा।
– हरिद्वार प्रसाद
देशभक्त वीरो, मरने से नेक नहीं डरना होगा।
प्राणों का बलिदान देश की वेदी पर करना होगा।
– कवि शंकर
इस काल के सभी साहित्यकारों ने स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग पर लगातार बल दिया।
हमारे हिंद वालों के चलन सारे स्वदेशी हों।
पढ़े सब देश की भाषा, वचन सारे स्वदेशी हों।
– राम कवि
इंसान जिस धरती पर रहता-बसता है, उसके आर्थिक और सांस्कृतिक रिश्तों की जड़ें उस धरती में बहुत गहरी होती हैं और यही वह बंधन है, जो देशभक्ति की भावना की बुनियाद है। मातृभूमि की महिमा का गान भी देशभक्ति का ही अंग है, जिसकी ओर अनेक कवियों ने आग्रहपूर्वक ध्यान दिया।
अजीमुल्ला खान द्वारा संपादित एक छोटे से अखबार पयामे आजादी ने यह घोषणा कर दी कि,
हम हैं इसके मालिक, हिंदुस्तान हमारा।
पाक वतन है कौम का, जन्नत से भी प्यारा।
इसकी सभी प्रतियां अंग्रेजों ने जब्त करके जला दीं।
भारतेंदु हरिश्चंद्र की पत्रिका कविवचन सुधा ने स्वदेशी आंदोलन का बिगुल फूंका। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने अपनी कविता भारत-दुर्दशा के माध्यम से देश की दुर्दशा को जनता के सामने रखा।
मैथिलीशरण गुप्त ने भारत-भारती के द्वारा देशवासियों में जाति और देश के प्रति गर्व और गौरव की भावनाओं का संचार किया।
मुंशी प्रेमचंद ने अपनी कृति सोजे वतन में अंग्रेजों की खुली खिलाफत की थी। इस पुस्तक को अंग्रेजों ने जब्त कर लिया था।
सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झांसी वाली रानी थी तथा भारत के गौरव को परिभाषित करता जयशंकर प्रसाद का करुणालय आदि कई रचनाएं देश में अंग्रेजों की खिलाफत कर रही थीं।
रामधारी सिंह दिनकर, माखनलाल चतुर्वेदी, रामनरेश त्रिपाठी, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, प्रेमधन, प्रताप नारायण मिश्र, राधाकृष्ण दास आदि अनेक कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से अतीत के प्रेरणादायी प्रसंगों को गाकर नवयुवाओं को पुनर्जागरण का मंत्र दिया।
अंग्रेजों ने क्रांति के इन स्वरों को दबाने की कड़ी कोशिशें कीं। कई रचनाओं पर प्रतिबंध लगे। कई रचनाकारों को जेल की सजाएं काटनी पड़ीं। किंतु यह स्वर रुका नहीं। कई रचनाकार छद्म नामों से लिखकर जनजागरण का काम करते रहे। इससे एक जन आंदोलन खड़ा हुआ।
एक सांस्कृतिक एवं वैचारिक आंदोलन
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन केवल एक राजनीतिक संघर्ष नहीं था, बल्कि एक सांस्कृतिक एवं वैचारिक आंदोलन भी था।
आजादी का अर्थ केवल राजनीतिक या भौगोलिक स्वतंत्रता नहीं है, बल्कि व्यक्तिगत, सामाजिक और मानसिक स्वतंत्रता भी है।
आजादी केवल बाहरी गुलामी से मुक्ति नहीं, बल्कि व्यक्ति के विचार, निर्णय और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी है। स्वतंत्रता अर्थात अपने विवेक के अनुसार जीवन जीने की स्थिति, जहां बाहरी दबाव, परतंत्रता और भेदभाव का स्थान न हो।
यह धरती अनेक धर्मों, ज्ञान परंपराओं और कलाओं की जन्मभूमि रही है। इसने वेद, उपनिषद, महाभारत, रामायण, गीता और धम्मपद जैसी पवित्र किताबें दुनिया को दीं। गणित, दशमलव प्रणाली, ज्योतिष और खगोलविद्या में दूसरे देशों का मार्गदर्शन किया।
1947 में हमने राजनीतिक आजादी तो पा ली, लेकिन हम मानसिक और सामाजिक रूप से मुक्त नहीं हो पाए। क्या हमारी भाषा को, हमारी कलाओं को और हमारे संगीत को आजादी मिली?






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