भारत के दो ध्रुव: जुझारू हाशिया और कटे हुए परिसर
भारत के विश्वविद्यालय और जुझारू हाशिए का समाज दो समानांतर दुनिया बनते जा रहे हैं। शिक्षा को वास्तविक जीवन, स्थानीय अर्थव्यवस्था और व्यावहारिक अनुभवों से जोड़ना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता...

किताबी ज्ञान की दीवारें और हाशिए का असली संघर्ष
हाल ही में मेरा इंदौर जाना हुआ। गंतव्य आगे उज्जैन और ओंकारेश्वर था, लेकिन रास्ते में इंदौर भी पड़ा। यात्रा के दौरान अचानक आईआईटी इंदौर का विशाल और आकर्षक साइनबोर्ड नजर आया। उसके पीछे फैला आधुनिक और भव्य परिसर देश की उच्च शिक्षा की उपलब्धियों का प्रतीक लग रहा था। लेकिन उसी सड़क पर कुछ ही दूरी पर एक दूसरा दृश्य भी मौजूद था। सड़क किनारे चाय की टपरियां, पोहे की रेहड़ियां, फल बेचते युवा और धूल-धुएं के बीच दिनभर मेहनत करते लगभग बीस-बाईस वर्ष के लड़के। कोई केतली में चाय उबाल रहा था, कोई ग्राहकों के लिए पोहे की प्लेटें सजा रहा था, तो कोई आम के टिकोरे बेच रहा था।
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यह दृश्य केवल दो अलग-अलग जीवन स्थितियों का नहीं था; यह भारत के दो समानांतर संसारों का प्रतीक था। एक ओर उच्च शिक्षा संस्थानों में भविष्य गढ़ने की कोशिश करता युवा वर्ग, दूसरी ओर सीमित संसाधनों के बीच अपने श्रम, कौशल और उद्यमिता के बल पर जीवन का रास्ता बनाता हुआ भारत। यहीं से एक सवाल जन्म लेता है कि क्या हमारे परिसर और समाज के बड़े हिस्से के बीच की दूरी लगातार बढ़ती जा रही है?
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आपदा को चुनौती देता ‘हाशिए का भारत’
जब हम ‘हाशिए’ की बात करते हैं, तो उसका अर्थ केवल गरीबी नहीं होता। इसमें वह विशाल भारत शामिल है जो औपचारिक अर्थव्यवस्था के बाहर रहते हुए भी देश की आर्थिक गतिविधियों को गति देता है। छोटे दुकानदार, रेहड़ी-पटरी वाले, कारीगर, स्वरोज़गार से जुड़े लोग और सूक्ष्म उद्यमी इसी दुनिया का हिस्सा हैं।
इन लोगों के पास बड़ी कंपनियों जैसी सुरक्षा नहीं होती। न स्थायी वेतन, न बीमा, न सामाजिक प्रतिष्ठा। फिर भी परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढाल लेने की उनकी क्षमता अद्भुत होती है। महामारी और लॉकडाउन के कठिन दौर में भी लाखों लोगों ने छोटे-छोटे उद्यमों, स्थानीय सेवाओं और वैकल्पिक रोजगार के माध्यम से जीवनयापन के रास्ते खोजे।
इनका ज्ञान किसी डिग्री या प्रमाणपत्र में दर्ज नहीं होता, यह अनुभव, जोखिम उठाने की क्षमता और रोजमर्रा के संघर्षों से अर्जित होता है। यही कारण है कि भारत की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था आज भी करोड़ों लोगों के लिए आजीविका का आधार बनी हुई है।
हकीकत से दूर होते परिसर
दूसरी ओर हमारे विश्वविद्यालय और कॉलेज हैं, जो ज्ञान, शोध और नवाचार के महत्वपूर्ण केंद्र हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि देश के विकास, विज्ञान, तकनीक और प्रशासनिक नेतृत्व के निर्माण में इन संस्थानों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।लेकिन इसके साथ एक चिंता भी उभरती है। आज बड़ी संख्या में छात्र डिग्रियां लेकर निकल रहे हैं, परंतु रोजगार बाजार बार-बार ‘स्किल गैप’ की समस्या की ओर संकेत करता है। अनेक उद्योगों का कहना है कि डिग्रीधारी युवाओं में व्यावहारिक कौशल, समस्या-समाधान क्षमता और वास्तविक कार्य-परिस्थितियों की समझ का अभाव है।
समस्या शिक्षा के अस्तित्व की नहीं, बल्कि उसके समाज और बाजार से जुड़ाव की है। कई पाठ्यक्रम आज भी ऐसे ढांचे में संचालित हो रहे हैं जिनका वास्तविक जीवन की चुनौतियों से सीमित संबंध दिखाई देता है। परिणामस्वरूप, छात्रों के सामने डिग्री और रोजगार के बीच एक असहज दूरी खड़ी हो जाती है।
निस्संदेह देश के प्रतिष्ठित संस्थानों से निकलने वाले हजारों युवा शोध, नवाचार और उद्यमिता में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। फिर भी यह प्रश्न बना हुआ है कि क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था पर्याप्त संख्या में ऐसे युवा तैयार कर रही है जो समाज की वास्तविक समस्याओं को समझकर उनके समाधान विकसित कर सकें?
नुकसान किसका हो रहा है?
‘जुझारू हाशिए’ और ‘कटे हुए परिसरों’ के बीच बढ़ती दूरी का असर केवल शिक्षा तक सीमित नहीं है। इसके व्यापक सामाजिक और आर्थिक परिणाम हैं।
नीतियों और वास्तविकता के बीच दूरी – जब निर्णय लेने वाले लोग जमीनी परिस्थितियों को पर्याप्त रूप से नहीं समझते, तो अनेक योजनाएं और नीतियां व्यवहारिक स्तर पर अपेक्षित परिणाम नहीं दे पातीं। छोटे व्यापारियों, श्रमिकों और ग्रामीण समुदायों की वास्तविक चुनौतियां अक्सर कागजी दस्तावेजों में पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं हो पातीं।
युवाओं में बढ़ती निराशा – डिग्री प्राप्त करने के बाद रोजगार की अनिश्चितता कई युवाओं में निराशा और असुरक्षा की भावना पैदा करती है। उन्हें लगता है कि शिक्षा ने उन्हें ज्ञान तो दिया, लेकिन जीवन और रोजगार की वास्तविक चुनौतियों के लिए पर्याप्त रूप से तैयार नहीं किया।
संसाधनों का सीमित उपयोग – शिक्षा और शोध पर होने वाला निवेश तब अधिक सार्थक बनता है जब उसका लाभ समाज की वास्तविक समस्याओं के समाधान में दिखाई दे। यदि अकादमिक जगत और समाज के बीच संवाद कमजोर होगा, तो यह संभावना भी सीमित हो जाएगी।
आगे की राह: दोनों दुनिया को जोड़ना – भारत को यदि ज्ञान-आधारित और आत्मनिर्भर राष्ट्र बनना है, तो शिक्षा और अनुभव के बीच पुल बनाना होगा। इसके लिए कुछ ठोस कदम आवश्यक हैं।
व्यावहारिक और भारतीय संदर्भ आधारित पाठ्यक्रम
विदेशी उदाहरणों के साथ-साथ स्थानीय उद्यमों, सहकारी संस्थाओं, सामाजिक नवाचारों और छोटे व्यवसायों की सफल कहानियों को भी पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। छात्रों को अपने आसपास की अर्थव्यवस्था को समझने का अवसर मिलना चाहिए।
ग्राउंड-जीरो इंटर्नशिप – शिक्षा केवल कक्षा और पुस्तकालय तक सीमित नहीं रह सकती। विद्यार्थियों को गांवों, कस्बों, स्वयं सहायता समूहों, छोटे उद्योगों और स्थानीय बाजारों के बीच काम करने का अवसर मिलना चाहिए। इससे वे भारत की वास्तविक सामाजिक-आर्थिक संरचना को बेहतर ढंग से समझ सकेंगे।
अनुभव को भी ज्ञान मानना – विश्वविद्यालयों को केवल अकादमिक विशेषज्ञों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। सफल किसान, उद्यमी, कारीगर, सामाजिक कार्यकर्ता और छोटे व्यवसाय संचालक भी छात्रों को ऐसे जीवन-पाठ दे सकते हैं जो किसी पाठ्यपुस्तक में उपलब्ध नहीं होते।
नवाचार को समाज से जोड़ना
शोध और नवाचार का लक्ष्य केवल शोधपत्र प्रकाशित करना नहीं होना चाहिए, बल्कि समाज की वास्तविक समस्याओं रोजगार, कृषि, जल, स्वास्थ्य और स्थानीय उद्योगों के समाधान खोजना भी होना चाहिए।
चाय की टपरी, पोहे की रेहड़ी और विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी के बीच की दूरी केवल भौतिक नहीं है। यह उस मानसिक और संरचनात्मक खाई का प्रतीक है जो शिक्षा और जीवन के अनुभवों के बीच मौजूद है। भारत को न तो अपने विश्वविद्यालयों की उपेक्षा करनी है और न ही अपने जुझारू हाशिए की। दोनों ही इस राष्ट्र की शक्ति हैं। आवश्यकता इस बात की है कि ज्ञान और अनुभव, सिद्धांत और व्यवहार, परिसर और समाज, इनके बीच संवाद स्थापित हो।
जब विश्वविद्यालयों का ज्ञान और समाज का व्यावहारिक अनुभव एक-दूसरे के पूरक बनेंगे, तभी शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य पूरा होगा। तब डिग्रियां केवल कागज का प्रमाण नहीं रहेंगी, बल्कि जीवन, रोजगार और सामाजिक परिवर्तन का सशक्त माध्यम बन सकेंगी।






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