अभिव्यक्ति – दो सौ वर्ष की हिंदी पत्रकारिता
दिनेश सिंदल,
कवि, लेखक
आज से दो सौ वर्ष पहले कम्प्यूटर नहीं थे, ऑफसेट मशीनें भी नहीं थीं। लोहे व लकड़ी से बनी हाथ से चलने वाली प्रेस थी। तब सीसे से बनी स्याही को हाथों से रोलर के जरिए सांचों पर लगाया जाता था। उसके बाद हाथ की मशीन द्वारा कागज पर प्रिंट किया जाता था। ऐसे निकला था हिंदी का पहला अखबार उदंत मार्तंड।
राजस्थान टुडे- जुलाई 2026 – पूरा अंक देखें
RAJASTHAN TODAY_2026_JULY UPDATE PAGE.indd
आज हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूर्ण हो चुके हैं। इस लंबी यात्रा में उसने अनेक उतार-चढ़ाव देखे। पत्रकारों और साहित्यकारों ने उसे गरिमा प्रदान की तथा लोकतंत्र में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका स्थापित की। जहां पत्रकारों ने समाज के सच को जन-जन तक पहुंचाने का काम किया, वहीं साहित्यकारों ने उसे संवेदनशील बनाया। भारतेंदु हरिश्चंद्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, गणेश शंकर विद्यार्थी, प्रेमचंद, माखनलाल चतुर्वेदी, अज्ञेय आदि ने इस धारा को सतत प्रवाहित रखा।
अकबर इलाहाबादी साहब का एक शेर है कि-
खींचों न कमानों को, न तलवार निकालो
जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो..
यह है छपे हुए शब्द की ताकत। तोप से नहीं, कई बार अखबार से क्रांति जन्म लेती है। अखबार समाज सुधार का काम तो करता ही है। समाज की विद्रूपताओं, विसंगतियों को भी जनता के सामने रखता है। वह जनमत निर्माण का काम भी करता है। इसीलिए इसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा गया है।
अखबार जनता के सवालों को उठाता है। वह जनता की आवाज हुआ करता है। किसी ने कहा है कि-
फिर मेरे सर पे कड़ी धूप की बौछार गिरी
मैं जहां जा के छुपा था वही दीवार गिरी
लोग किस्तों में मुझे कत्ल करेंगे शायद
सबसे पहले मेरी आवाज पे तलवार गिरी..
पत्रकारिता भाषा, समाज, संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना को दिशा देती है। और साहित्य समाचार को संवेदनशील, विचारशील बनाता है और अभिव्यक्ति की शक्ति देता है। समाचार तात्कालिक घटना पर होता है लेकिन साहित्य उसे सर्वकालिक, कालजयी बना देता है।
आज क्रांति धर्मा पत्रकारिता के गले में बाजार का शिकंजा कसता जा रहा है। आज बाजार जीवन के लगभग हर क्षेत्र को संचालित कर रहा है। आज मीडिया का बड़ा हिस्सा और साहित्य की कुछ धाराएं भी बाजार के दबावों से अछूती नहीं रह गई हैं। कभी पत्रकारिता का उद्देश्य जनता के सामने सच लाना होता था। आज पत्रकारिता पर व्यावसायिक दबाव पहले से कहीं अधिक हावी दिखाई देते हैं। खबरें गौण हो गई हैं। मुखपृष्ठ पर विज्ञापन! साहित्य तो हाशिए और कॉलम का आइटम बन गया है। अखबारों से साहित्य परिशिष्ट गायब हो गए हैं।
साहित्य विभाजनों की दीवारें गिराकर मनुष्य को मनुष्य की तरह देखने का आग्रह करता है। यह स्थिति बाजार और राजनीति के लिए अनुकूल नहीं होती। क्योंकि राजनीति का हित इसी में है कि मनुष्य बंटा रहे। बाजार चाहेगा कि मनुष्य बंटा हुआ रहे। इसी में उसका लाभ है।
साहित्य और राजनीति में छत्तीस का आंकड़ा है। यहां मैं पत्रकारिता को भी साहित्य में शामिल मानता हूं। साहित्यकार कहता है एकला चलो रे। वह अकेले की यात्रा है। लेकिन राजनेता को भीड़ चाहिए। वह तभी बड़ा नेता होता है जब उसके पीछे भीड़ बड़ी होती है। राष्ट्रपति दिल्ली में बैठा है तो उसके पीछे 140 करोड़ की भीड़। एक सौ चालीस करोड़ का वह राष्ट्रपति। उसे अगर आप जंगल में छोड़ आए, वहां वह किसका राष्ट्रपति? लेकिन एक कवि को अगर आप जंगल में छोड़ आए तो वह पक्षियों को भी अपने गीत सुना देगा।
जब बाजार ने बदली पत्रकारिता की प्राथमिकताएं
हमारी पत्रकारिता, हमारा साहित्य आज बाजारोन्मुख हो गया। मेरे घर में प्रतिदिन एक चौबीस पेज का अखबार तीन रुपए पचास पैसे में कोई डाल जाता है। अगर मैं उसे कहूं की इन चौबीस पन्नों पर तुम प्रिंटिंग का खर्चा करते हो, बिजली का खर्च, बड़ी-बड़ी मशीनों की ईएमआई, फिर इसमें लिखने वालों को भी कुछ न कुछ देते ही होंगे? तुम कुछ मत करो ये 24 पन्ने मुझे रोज़ कोरे दे जाया करो। क्या वह मुझे दे पाएगा? नहीं, क्योंकि कोरे चौबीस पन्नों की लागत ही कई गुना अधिक बैठती होगी। फिर वह उन कोरे पन्नों पर इतना खर्च करने के बाद भी मुझे तीन रुपए पचास पैसे में कैसे दे रहा है? कैसे पूरा करता है वह अपना ये घाटा? कहां से आता है यह पैसा? यह पैसा आता है विज्ञापन से। अब आप ही सोचिए कि अखबार का मालिक अपने पाठक की चिंता करेगा या अपने विज्ञापनदाता की।
पहले छपे हुए शब्द पर लोगों को भरोसा था। अखबार को लोग किसी घटना के प्रमाण की तरह काम में लेते थे।
आज सबके अपने-अपने अखबार हैं। सबके अपने-अपने टीवी चैनल हैं। लेकिन इतने सारे अखबारों व टीवी चैनलों के बीच में भी आम आदमी की खबर कोई नहीं दे पा रहा।
कोई नहीं जो पता दे दिलों की हालत का
कि सारे शहर के अखबार है खबर के बगैर
– सलीम अहमद
अंत में एक बात-
एक पत्रकार साइकिल पर करियर लगवाने रिपेयरिंग वाले के पास गया। मिस्त्री ने दो घंटे बाद आने को कहा। पत्रकार जब दो घंटे बाद पहुंचा तो देखा साइकिल में करियर तो लग गया, लेकिन स्टैंड गायब था। उसने मिस्त्री से कहा- तुमने करियर तो लगा दिया, लेकिन क्यों स्टैंड हटा दिया। इस पर उस साइकिल वाले का जवाब था मित्रों, उसने कहा- पत्रकार महोदय अगर आप करियर चाहते हैं तो फिर स्टैंड नहीं ले सकते। और अगर आप स्टैंड लेते हैं तो फिर करियर की चिंता मत करिए। शायद यही दुविधा आज की पत्रकारिता के सामने भी खड़ी है।







No Comment! Be the first one.