गलत खबर की कीमत कौन चुकाएगा?
भारतीय रिजर्व बैंक के स्वर्ण भंडार को लेकर प्रकाशित एक रिपोर्ट ने कुछ ही घंटों में चर्चा, आशंकाओं और सवालों का माहौल बना दिया। बाद में जब रिपोर्ट वापस ले ली गई, तब एक बड़ा प्रश्न सामने आया कि क्या...

ब्लूमबर्ग की वापस ली गई रिपोर्ट ने उजागर की डिजिटल दौर की सबसे बड़ी पत्रकारिता चुनौती
‘एक झूठ दुनिया का चक्कर लगा सकता है जबकि सच अभी अपने जूते ही पहन रहा होता है।’ डिजिटल युग में यह कहावत पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक दिखाई देती है। भारतीय रिजर्व बैंक के स्वर्ण भंडार को लेकर ब्लूमबर्ग की हालिया रिपोर्ट और उसका बाद में वापस लिया जाना इसी वास्तविकता की याद दिलाता है।
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ब्लूमबर्ग ने अपने विश्लेषण में संकेत दिया था कि मई माह के दौरान भारतीय रिजर्व बैंक ने अपने स्वर्ण भंडार का एक हिस्सा बेचा हो सकता है। रिपोर्ट सामने आते ही सोशल मीडिया, आर्थिक विश्लेषकों और सार्वजनिक विमर्श में इसे लेकर चर्चा शुरू हो गई। कई लोगों ने इसे भारत की आर्थिक स्थिति और नीतिगत दिशा से जोड़कर देखना शुरू कर दिया। लेकिन जल्द ही भारतीय रिजर्व बैंक ने स्पष्ट किया कि उसके स्वर्ण भंडार में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं आई है। इसके बाद ब्लूमबर्ग ने भी अपनी रिपोर्ट वापस लेते हुए स्वीकार किया कि उसके विश्लेषण में मूल्यांकन संबंधी त्रुटि हुई थी और इसी कारण गलत निष्कर्ष सामने आया।
गलती से बड़ा सवाल
पत्रकारिता में गलतियां नई बात नहीं हैं। किसी भी संस्था से त्रुटि हो सकती है। लेकिन इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू गलती नहीं, बल्कि उसका प्रभाव है। जब मूल खबर सामने आई, तब वह तेजी से फैली। सोशल मीडिया पर साझा हुई। उस पर टिप्पणियां हुईं। उसके आधार पर निष्कर्ष निकाले गए। लेकिन जब सुधार आया, तब क्या वह भी उतनी ही तेजी से लोगों तक पहुंचा? यही वह प्रश्न है जो इस पूरे प्रकरण को एक सामान्य त्रुटि से कहीं बड़ा बना देता है।
डिजिटल दौर की सबसे बड़ी विडंबना
आज खबरें केवल अखबारों और टीवी चैनलों तक सीमित नहीं हैं। एक सूचना कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुंच जाती है। सोशल मीडिया के एल्गोरिदम अक्सर उन्हीं खबरों को आगे बढ़ाते हैं जो अधिक सनसनीखेज, विवादास्पद या चौंकाने वाली हों।
यही कारण है कि नकारात्मक खबरें बहुत तेजी से फैलती हैं। लेकिन जब उनका खंडन आता है, तो वह अक्सर उसी स्तर की पहुंच हासिल नहीं कर पाता। नतीजा यह होता है कि तथ्य बदल जाने के बाद भी धारणाएं बनी रहती हैं। कई बार लोग मूल खबर याद रखते हैं, लेकिन उसका सुधार नहीं।
सत्यापन क्यों जरूरी है?
पत्रकारिता के शुरुआती प्रशिक्षण में ही सिखाया जाता है कि किसी भी सूचना को प्रकाशित करने से पहले उसके तथ्यों की कई स्तरों पर जांच होनी चाहिए। विशेष रूप से तब, जब वह किसी व्यक्ति, संस्था या राष्ट्र की साख को प्रभावित करने की क्षमता रखती हो।
ब्लूमबर्ग का यह मामला किसी सामान्य विषय से जुड़ा नहीं था। यह भारत के केंद्रीय बैंक और उसके स्वर्ण भंडार से संबंधित था। ऐसे विषय निवेशकों, वित्तीय संस्थानों और वैश्विक बाजारों की धारणा को भी प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए ऐसे मामलों में अनुमान और तथ्य के बीच की दूरी को बहुत सावधानी से मापा जाना चाहिए।
पहले भी उठते रहे हैं सवाल
भारत पहले भी लोकतंत्र, प्रेस स्वतंत्रता, भूख सूचकांक और आर्थिक आंकड़ों की व्याख्या से जुड़ी कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों पर आपत्तियां दर्ज कराता रहा है तथा उनके निष्कर्षों पर सवाल उठाता रहा है।
हालांकि उन मामलों में मतभेद और दृष्टिकोण का प्रश्न अधिक था। लेकिन ब्लूमबर्ग का यह मामला इसलिए अलग है क्योंकि यहां रिपोर्ट को वापस लेना पड़ा। इससे यह स्पष्ट हुआ कि मूल विश्लेषण में त्रुटि थी।
सबसे पहले या सबसे सही?
डिजिटल मीडिया के दौर में सबसे पहले खबर देने की होड़ लगातार बढ़ रही है। प्रतिस्पर्धा के इस वातावरण में कई बार सत्यापन की प्रक्रिया कमजोर पड़ जाती है। खबर पहले प्रकाशित होती है और सुधार बाद में आता है। लेकिन तब तक उसका प्रभाव अपना काम कर चुका होता है।
भारत आज दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। उसकी आर्थिक नीतियां और संस्थागत विश्वसनीयता वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। ऐसे में उससे जुड़ी संवेदनशील आर्थिक सूचनाओं को प्रकाशित करते समय अतिरिक्त सावधानी अपेक्षित है।
आखिर बात क्या है?
पत्रकारिता का उद्देश्य केवल सबसे पहले सूचना देना नहीं, बल्कि सबसे सही सूचना देना है।
क्योंकि एक गलत खबर कुछ घंटों में दुनिया का चक्कर लगा सकती है, जबकि सच को लोगों तक पहुंचने में कहीं अधिक समय लगता है। और कई बार तब तक धारणाएं बन चुकी होती हैं।
यही कारण है कि सत्यापन केवल पत्रकारिता की प्रक्रिया नहीं, उसकी आत्मा है। क्योंकि खबर तो वापस हो सकती है, लेकिन उसका असर लौटाना हमेशा संभव नहीं होता।






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