संसद में संवाद की जगह शोर
मानसून सत्र में संसद का बड़ा हिस्सा हंगामे, विरोध और बहिष्कार की भेंट चढ़ गया। सत्ता पक्ष और विपक्ष ने एक-दूसरे पर सदन न चलने देने के आरोप लगाए, लेकिन सवाल जनता के धन और लोकतांत्रिक व्यवस्था का है।...

मानसून सत्र
संविधान निर्माताओं ने संसद की परिकल्पना इसलिए नहीं की थी कि वह विरोध के नाम पर अशांति और शोरगुल का केंद्र बन जाए। संसद के संचालन में जनता का पैसा खर्च होता है। वह भी प्रति मिनट करीब ढाई लाख रुपये। भारत जैसे गरीब देश के लिए यह रकम कम नहीं है। संसद को भारतीय लोकतंत्र का मंदिर माना जाता रहा है। वहां देशभर से जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि देश, समाज और जनता की भलाई के लिए नीति-निर्धारण का काम करते हैं। बाद में कार्यपालिका उसे अमलीभूत करती है। संविधान निर्माताओं ने भारतीय लोकतंत्र के चार स्तंभ बताए थे– विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और प्रेस। इन चार स्तंभों के काम भी बांटे गए थे। विधायिका का काम नीति-निर्धारण करना, कार्यपालिका का उसपर अमल करना, न्यायपालिका का काम यह देखना कि नीति-निर्धारण और उसके कार्यान्वयन में कोई चूक तो नहीं हो रही है और प्रेस का काम उसे जन-जन तक पहुंचाना और समाज की समस्याओं को उजागर करना है।
Table Of Content
ऐसा नहीं है कि संसद सिर्फ हंगामें की जगह रही है। वहां पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल, वीके कृष्णमेनन, डॉ भीमराव अंबेडकर, डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी, जेबी कृपलानी, लालबहादुर शास्त्री, डॉ राममनोहर लोहिया आदि एक से बढ़कर एक विद्वान और मनीषी बैठकर देश की दिशा तय करते रहे। संसद के उच्च सदन राज्यसभा में भी कई उद्योगपति, साहित्यकार, कलाकार सदन की गरिमा को सुशोभित करते रहे। तब संसद की कार्यवाही देखते- सुनते बनती थी। 80 के दशक तक संसद की बहसें जन सरोकारी लगती थीं। लेकिन बाद के दिनों में जैसे-जैसे राजनीति का अपराधीकरण होता गया, वैचारिक दिवालियापन और सांसदों की सुख-सुविधा (वेतन-भत्ता-पेंशन) बढ़ती गई, संसद की गरिमा का क्षरण होता गया।
25 दिनों में महज 9 मिनट चला प्रश्नकाल
इस बार भी संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई से 13 अगस्त तक चला। कुल 25 दिन चले सत्र का अधिकांश समय शोरगुल और विपक्ष के बहिष्कार में बीत गया। दोनों सदनों लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही बार-बार बाधित हुई। हमारे जनप्रतिनिधि जनता के सवालों को लेकर कितने गंभीर हैं, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 25 दिनों में प्रश्नकाल महज 9 मिनट ही चल पाया। यह भी बताना जरूरी लगता है कि मानसून सत्र के आयोजन में करीब 225 करोड़ रुपये खर्च किए गए। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने बताया कि लोकसभा में कामकाज 19 फीसदी, जबकि राज्यसभा में 39 फीसदी ही हो पाया। उन्होंने बताया कि ऐसा विपक्ष के चर्चा से बार-बार भाग जाने के कारण हुआ। लोकसभा में कुल 12 विधेयक पारित किए गए, जबकि एक विधेयक पर चर्चा की गई। राज्यसभा में सभी विधेयकों पर चर्चा की गई। रिजिजू ने कहा कि अपने संसदीय जीवन में उन्होंने पहली बार विपक्ष को चर्चा से भागते देखा। यह दुर्भाग्यपूर्ण है। संसदीय कार्य मंत्री ने इतने हंगामे के बीच 12 विधेयक पारित करा लेना अपनी सरकार की उपलब्धि बताया।
दूसरी ओर, विपक्ष का कहना है कि सरकार की मनमानी के कारण सदन चलने में दिक्कत हुई। सरकार बिना चर्चा के मनमानी करने पर तुली हुई है। विपक्ष को अपनी बात कहने का मौका ही नहीं दिया जाता है। विपक्ष 20 जुलाई को संसद का घेराव कर रहे छात्रों पर बर्बर लाठीचार्ज, पेलेट गन से हमला और छात्राओं के कपड़े फाड़े जाने का मुद्दा उठाना चाहता था। वह गृहमंत्री से सफाई चाहता था, लेकिन संसद भवन में मौजूद रहने के बावजूद गृहमंत्री सदन में नहीं आए। ऐसे में विपक्ष सदन का बहिष्कार नहीं करता तो क्या करता? विपक्ष अयोध्या के राममंदिर में हुए चढ़ावा चोरी का मामला उठाना चाहता था, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन सरकार ने किया था। इसलिए ट्रस्ट के काम में गड़बड़ी के मामले की शिकायत सरकार से नहीं तो किससे की जाती। क्या ही अच्छा होता प्रधानमंत्री राममंदिर के मसले पर विपक्ष के सवालों का जवाब देते और देशवासियों को संतुष्ट करते। लेकिन प्रधानमंत्री दिल्ली में मौजूद होने के बाद भी सदन में नहीं आए। दरअसल, इस सरकार को लोकतंत्र पर भरोसा ही नहीं है। सरकार तानाशाह हो गई है। कांग्रेस सांसद तारिक अनवर कहते हैं कि सदन तभी चलता है जब सत्तापक्ष और विपक्ष आपस में बातचीत करें और सदन चलाने का रास्ता ढूंढें, लेकिन सरकार ने अपनी हठधर्मिता नहीं छोड़ी। प्रधानमंत्री और गृहमंत्री पूरे सत्र सदन में उपस्थित नहीं हुए। इससे पता चलता है कि उनके लिए सदन का कोई महत्त्व नहीं है।
संसद चलाने में प्रतिदिन 9 करोड़ से ज्यादा खर्च
वर्ष 2012 में तत्कालीन संसदीय कार्य मंत्री पवन कुमार बंसल ने बताया था कि संसद चलाने में प्रति मिनट 2.5 लाख का खर्च आता है। इनमें सांसदों के वेतन-भत्ते भी शामिल हैं। आमतौर पर संसद की बैठकें प्रतिदिन 11 बजे से शाम 6 बजे तक होती है। कभी-कभी विशेष परिस्थितियों में संसद की कार्यवाही आधी रात तक भी चलती है। अगर प्रतिदिन 6 घंटे के सदन के कार्यकाल की गणना की जाए तो यह प्रतिदिन 9 करोड़ रुपए से ज्यादा बैठती है। ज्ञात रहे कि 2012 के बाद पिछले 14 सालों का कोई अनुमान अभी तक नहीं आया है।
पारित किए गए विधेयक
संसद में लोक परीक्षाओं में पेपर लीक से जुड़ी छात्रों की चिन्ताओं को दूर करने के लिए लोक परीक्षा (अनुचित साधन निवारण) संशोधन विधेयक पारित किया गया। इस विधेयक में लोक परीक्षा प्रणाली की ईमानदारी और विश्वसनीयता को मजबूत करने की एक बड़ी पहल के रूप में पुनःस्थापित किया गया, ताकि 2024 के मूल अधिनियम को संशोधित किया जा सके। इस विधेयक का उद्देश्य अधिनियम के तहत परीक्षा में कदाचार संबंधी अपराधों की त्वरित जांच और समय पर ट्रायल सुनिश्चित करना, राज्य सरकारों और संघ राज्य क्षेत्र प्रशासनों को स्पेशल ट्रायल पक्का करना, राज्य सरकारों और संघ राज्य क्षेत्र प्रशासनों को स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने और स्पेशल पब्लिक प्रोसिक्यूटर नियुक्त करने का अधिकार देना, दो महीने के अन्दर जांच और तीन महीने के अन्दर ट्रायल पूरा करना, केंद्र सरकार को जहां भी जरूरी हो जांच के लिए स्पेशल टास्क फोर्स गठित करने में मदद करना, परीक्षा संबंधी अपराधों के लिए सजा में बढ़ोत्तरी करना और उच्च न्यायालय की डिवीजन बेंच के समक्ष एक समयबद्ध अपीली तंत्र का उपबंध करना है। ख़ास बात यह कि इस विधेयक में परीक्षा में पेपर लीक रोकने की कोई ठोस व्यवस्था का कहीं कोई जिक्र नहीं है, जबकि कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले आंदोलन करनेवाले छात्रों की यही मुख्य मांग थी। करीब 17 घंटे की बहस के बाद यह विधेयक न सिर्फ दोनों सदनों से पारित हो गया, बल्कि राष्ट्रपति ने भी इसकी मंजूरी दे दी है।
इसके अलावा सात विधेयक महज 36 मिनट में ही दोनों सदनों से बिना किसी चर्चा के पारित कर दिए गए। जो विधेयक पारित किए गए, वे हैं-
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास (संशोधन) विधेयक 2026 : इसका उद्देश्य वर्ष 2006 के अधिनियम में संशोधन करके सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के नि:शुल्क और स्वैच्छिक पंजीकरण के लिए एक राष्ट्रीय डिजिटल प्लेटफार्म पर उपलब्ध कराना, वित्तीय पहुंच को बेहतर बनाकर एमएसएमई सेक्टर को मजबूत करना, सूक्ष्म और छोटे व्यापार के विलंबित भुगतान से पैदा विवादों का तेजी से निपटारा करना, व्यापार करने में आसानी को बढ़ावा देना और कुछ नियमों के उल्लंघन से जुड़े अपराधों में सजा कम करने का प्रावधान है।
बैंककार बही साक्ष्य विधेयक 2026 : इसका उद्देश्य बैंककार बही की परिभाषा का दायरा बढ़ाना है, ताकि इसमें बैंकों द्वारा रखे जाने वाले सभी तरह के रिकॉर्ड शामिल हो सकें, चाहे वे फिजिकल, इलेक्ट्रॉनिक, डिजिटल, वर्चुअल, क्लाउड बेस्ट या किसी और रूप में हों। यह विधेयक केंद्र सरकार को वित्तीय क्षेत्र में कवरेज बढ़ाने का अधिकार देता है।
काराधन और अन्य विधियां (संशोधन) विधेयक 2026 : यह विधेयक 5 जून 2026 को जारी आयकर (संशोधन) अध्यादेश को निरस्त करके उसके स्थान पर नया अध्यादेश लाने की स्वीकृति प्रदान करता है।
राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (संशोधन) विधेयक 2026 : इस विधेयक का उद्देश्य राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम अधिनियम 1962 में संशोधन करके केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित की जाने वाली किसी भी दूसरी खाद्य वस्तु को खाद्य पदार्थों की सूची में शामिल करने के लिए उसकी परिभाषा बढ़ाना, औद्योगिक सामानों पर लागू भौगोलिक रोक को हटाना, सहकारिता क्षेत्र को मजबूत करना और निगम को आकस्मिक अधिकार देना है।
केरल (नाम परिवर्तन) विधेयक 2026 : इस विधेयक में संविधान के अनुच्छेद- 3 के अनुसार केरल राज्य का नाम बदलकर केरलम करके संविधान की पहली अनुसूची में संशोधन करने का प्रस्ताव है।
अधिकरण सुधार विधेयक 2026 : इस विधेयक को लाने का मकसद विभिन्न अधिकरणों के अध्यक्षों और सदस्यों की योग्यता, नियुक्ति, सेवा की शर्तों और कामकाज की दक्षता में सुधार करना है।
खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक 2026 : इस विधेयक में खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम 1957 में संशोधन करके खनिज के क्षेत्र वित्तीय प्रणाली में निश्चितता और स्थिरता तथा पूर्वानुमान का उपबंध करना है, जिससे देश के आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलेगा। साथ ही आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य पूरे होंगे और विकसित भारत 2047 का विजन हासिल होगा।
इसके अलावा जो अन्य विधेयक पारित किए गए, वे हैं–
राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक 2026 : इसका उद्देश्य वर्ष 1971 के मूल अधिनियम में संशोधन कर उसे राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम की धारा 3 के दायरे में लाना है। साथ ही यह उपबंध करना है कि जान-बूझकर वंदेमातरम् जिसे राष्ट्रीय गीत माना जाता है, उसे गाने से रोकना या अवरोध करना दंडनीय अपराध होगा।
जन्म और मृत्यु रजिस्ट्रीकरण (संशोधन) विधेयक 2026 : इसमें 1969 के मूल अधिनियम में संशोधन करके नियमों को सख्त बनाने का प्रावधान किया गया है। इसके तहत जन्म और मृत्यु के तुरंत बाद रजिस्ट्रेशन न कराने पर एक से दो वर्ष तक रजिस्ट्रीकरण केवल सक्षम एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की मंजूरी से और दो वर्ष के बाद केवल फर्स्ट क्लास ज्युडिशियल मजिस्ट्रेट की मंजूरी से कराने का प्रावधान किया गया है।
उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीश संख्या) संशोधन विधेयक 2026 : इसके तहत सर्वोच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश सहित कुल जजों की संख्या 34 से बढ़ाकर 38 करने का प्रावधान है। इसका उद्देश्य मुकदमों के बढ़ते बैकलॉग को कम करके न्याय में तेजी लाना है।
भारतीय सांख्यिकी संस्थान विधेयक 2026 : यह विधेयक कोलकाता स्थित भारतीय सांख्यिकी संस्थान को 1959 के अधिनियम को निरस्त कर पंजीकृत सोसायटी से आईआईटी और आईआईएम की तर्ज पर एक वैधानिक कॉर्पोरेट निकाय बनाता है। यह विधेयक लोकसभा में रखा गया था, लेकिन शोरगुल में चर्चा नहीं हो पाई।
विनियोग (संख्यांक-3) विधेयक 2026 : यह विधेयक वित्त वर्ष 2022-23 के दौरान स्वीकृत राशि से अधिक हुए खर्च लगभग 54,067 करोड़ को देश की संचित निधि से पूरा करने के लिए कानूनी मंजूरी देता है।
इसके अलावा संसद के सदस्यों की सहमति न बन पाने के कारण विदेशी अभिदाय (विनियमन) संशोधन (FCRA) विधेयक 2026 को विस्तृत परीक्षण के लिए दोनों सदनों की संयुक्त समिति (जेपीसी) को भेजा गया। साथ ही सरकार महत्वपूर्ण परिसीमन विधेयक को संसद के पटल पर रखने की हिम्मत नहीं जुटा पाई। बताना जरूरी है कि सरकार की मंशा सत्र के पहले दिन से परिसीमन विधेयक को पारित कराने की रही है। इसी के लिए तृणमूल कांग्रेस, शिवसेना (उद्धव गुट) और आम आदमी पार्टी के सांसदों को एनडीए में शामिल कराया गया था। कुल मिलाकर मानसून सत्र में संसद और हमारे सांसदों की स्थिति ‘आए थे हरिभजन को, ओटन लगे कपास’ की ही रही।






No Comment! Be the first one.