जीत के सूत्रों की बिगड़ रही ‘गणित’
राजस्थान कांग्रेस में अशोक गहलोत, सचिन पायलट और गोविंदसिंह डोटासरा की अलग-अलग राजनीतिक ताकत और महत्वाकांक्षाएं पार्टी के लिए चुनौती बन रही हैं। 2028 से पहले निकाय-पंचायत चुनाव तीनों नेताओं के प्रभाव...

राजस्थान कांग्रेस
राजेश कसेरा,
वरिष्ठ पत्रकार
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राजस्थान कांग्रेस की राजनीति में इस समय सबसे बड़ा सवाल भाजपा से मुकाबले का नहीं, बल्कि अपने ही तीन शक्ति केन्द्रों के बीच संतुलन का है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंदसिंह डोटासरा, तीनों की अपनी राजनीतिक ताकत, महत्वाकांक्षा और समर्थकों का आधार है। समस्या तब पैदा होती है, जब ये ताकतें कांग्रेस की सामूहिक रणनीति के बजाय एक-दूसरे के समानांतर चलने लगती हैं। बीते दिनों पूर्व मंत्री महेन्द्रजीतसिंह मालवीय की ‘घर वापसी’ ने इसी खींचतान को एक बार फिर सतह पर ला दिया।
मालवीय के कांग्रेस में लौटने के बाद उनका पार्टी कार्यालय जाने के बजाय सीधे गहलोत के आवास पर पहुंचना प्रदेश अध्यक्ष डोटासरा को बुरी तरह खटका। ऊपर से वहां गहलोत को चौथी बार मुख्यमंत्री बनाए जाने के नारे गूंजे तो मामला और गरमा गया। इसके बाद डोटासरा ने गहलोत का सीधा नाम लिए बिना तल्ख टिप्पणी की, ‘यदि कोई अपना ब्रांड बनाने के लिए काम करता है तो उसे सफलता मिले। मैं कांग्रेस के लिए काम करता हूं। जब तक कांग्रेस में हूं, पार्टी के लिए काम करूंगा। मैं किसी व्यक्ति विशेष को ब्रांड बनाने के लिए काम नहीं करूंगा।’ इस बयान के पीछे कांग्रेस के भीतर चल रही उस पुरानी प्रतिस्पर्धा की झलक साफ दिखाई देती है, जिसमें सवाल सिर्फ आज के संगठन का नहीं, बल्कि 2028 के बाद राजस्थान की सत्ता में कांग्रेस का चेहरा कौन होगा, इसका भी है।
इधर, सचिन पायलट 2020 की राजनीतिक उठापटक को अब तक भुला नहीं पाए हैं। उस समय मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से टकराव के बाद पायलट को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद गंवाना पड़ा था। ऐसे में पायलट और उनके समर्थक भी मौके की तलाश में हैं। राजनीति में मौका जब आता है तो पुराने हिसाब-किताब भी अक्सर सामने आ जाते हैं।
मुद्दा सिर्फ मतभेद नहीं, सत्ता की अगली लड़ाई है
राजस्थान कांग्रेस में गहलोत, पायलट और डोटासरा के बीच खींचतान को केवल व्यक्तिगत मतभेद मानना राजनीतिक तस्वीर को अधूरा समझना होगा। असल संघर्ष संगठन पर प्रभाव, राजनीतिक वर्चस्व, भविष्य की भूमिका और सबसे बढ़कर 2028 के विधानसभा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री पद की दावेदारी का है।
कांग्रेस के भीतर यह सवाल अभी औपचारिक रूप से भले न पूछा जा रहा हो, लेकिन राजनीतिक गतिविधियां संकेत दे रही हैं कि दावेदारियां आकार लेने लगी हैं। तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके गहलोत के पास प्रशासनिक अनुभव के साथ संगठन का लंबा नेटवर्क है। पायलट के पास युवा चेहरा, व्यक्तिगत लोकप्रियता और भविष्य के नेतृत्व की संभावना है। डोटासरा के पास प्रदेश संगठन की कमान व कार्यकर्ताओं के बीच सक्रिय संपर्क है। यानी तीनों के पास वह सब कुछ है, जो उन्हें मुख्यमंत्री पद की संभावित दौड़ में प्रासंगिक बनाए रखता है। यही कांग्रेस की ताकत भी है और यही उसकी सबसे बड़ी चुनौती भी।
बीते समय में कई कार्यक्रमों और संगठनात्मक गतिविधियों में तीनों नेताओं की दूरी दिखाई दी। जुलाई 2026 में भी गहलोत और पायलट कई प्रमुख कार्यक्रमों में एक साथ नहीं दिखे। पायलट के कार्यक्रमों के पोस्टरों में गहलोत और डोटासरा की तस्वीरों की गैरमौजूदगी ने राजनीतिक संदेश दिया। दूसरी ओर, राहुल गांधी के राजस्थान दौरे के दौरान तीनों नेताओं को एक मंच पर दिखाने वाली तस्वीरों ने यह संदेश देने की कोशिश जरूर की कि मतभेदों के बावजूद पार्टी एकजुट है। लेकिन दौरा खत्म होते ही तीनों नेताओं की अपनी-अपनी राजनीतिक गतिविधियां फिर अलग-अलग नजर आने लगीं।
तीन शक्ति केन्द्र, एक पार्टी
गहलोत और पायलट के बीच प्रतिस्पर्धा पुरानी कहानी है। इसमें अब डोटासरा एक महत्वपूर्ण तीसरे शक्ति केन्द्र के रूप में उभरे हैं। प्रदेश अध्यक्ष के रूप में डोटासरा ने संगठन को सक्रिय रखने और कार्यकर्ताओं के साथ सीधा संपर्क बनाए रखने पर जोर दिया है। छह साल के कार्यकाल ने उन्हें संगठन के भीतर एक अलग आधार दिया है। वे सरकार के खिलाफ लगातार मुखर रहते हैं।
गहलोत की राजनीति का आधार अनुभव और व्यापक नेटवर्क है। पायलट की राजनीति का आधार व्यक्तिगत जन अपील और युवा नेतृत्व की छवि है। डोटासरा की ताकत संगठन और कार्यकर्ताओं से सीधा संपर्क है। तीनों की ताकत अलग-अलग है, लेकिन यदि ये तीनों ताकतें एक-दूसरे से मुकाबला करने में लग गईं तो पार्टी की सामूहिक ताकत कमजोर होगी। इसके उलट यदि इन्हें एक साझा चुनावी रणनीति में जोड़ा गया तो यही समीकरण भाजपा के लिए मुश्किल खड़ी कर सकता है। यही वह बिंदु है जहां राजस्थान कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा खड़ी है।
निकाय-पंचायत चुनाव पहला इम्तिहान
प्रदेश में निकाय और पंचायत चुनाव कांग्रेस के लिए सिर्फ स्थानीय चुनाव नहीं हैं। 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले इन्हें सत्ता का सेमीफाइनल माना जाएगा। इन चुनावों में पार्टी का प्रदर्शन यह संकेत देगा कि संगठन जमीन पर कितना मजबूत है, किस नेता की पकड़ कितनी है और कार्यकर्ता किसके साथ कितनी मजबूती से खड़ा है। यहीं तीनों नेताओं की वास्तविक परीक्षा भी होगी।
टिकट वितरण से लेकर स्थानीय नेतृत्व को साधने और चुनावी अभियान तक, हर स्तर पर यह देखा जाएगा कि तीनों नेता पार्टी की साझा रणनीति के तहत काम करते हैं या अपने-अपने राजनीतिक प्रभाव क्षेत्र को मजबूत करने में जुटते हैं।
यदि निकाय और पंचायत चुनाव में कांग्रेस एकजुट होकर अच्छा प्रदर्शन करती है तो यह 2028 के लिए मजबूत संदेश होगा। लेकिन यदि टिकटों और स्थानीय नेतृत्व को लेकर गुटबाजी सामने आई तो नुकसान सिर्फ इन चुनावों तक सीमित नहीं रहेगा। इससे लगेगा कि कांग्रेस वापसी से पहले ही मुख्यमंत्री पद की दौड़ में उलझ गई है।
सत्ता पक्ष को बैठे-बिठाए मुद्दा
कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान भाजपा के लिए राजनीतिक अवसर है। विपक्ष के लिए इससे बेहतर मुद्दा क्या होगा कि जिस पार्टी को सत्ता में वापसी का दावा करना है, उसके तीन बड़े नेता ही अलग-अलग शक्ति केन्द्र बनकर खड़े दिखाई दें।
भाजपा चुनाव में कांग्रेस के मतभेदों को गुटबाजी और मुख्यमंत्री पद की महत्वाकांक्षा के मुद्दे के रूप में जनता के सामने रख सकती है। कांग्रेस के सामने चुनौती यह है कि जनता को यह भरोसा दिलाया जाए कि पार्टी के भीतर नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा, संगठन की सामूहिक लड़ाई पर हावी नहीं होगी। राजनीति में मतभेद होना सामान्य है। समस्या तब होती है, जब मतभेद सार्वजनिक संदेश बन जाएं और कार्यकर्ता असमंजस में पड़ जाएं कि आखिर पार्टी की लाइन क्या है।
गहलोत, पायलट और डोटासरा, तीनों की अपनी जमीन
जादूगर अशोक गहलोत : गहलोत की ताकत उनका लंबा राजनीतिक और प्रशासनिक अनुभव है। प्रदेश की राजनीति के साथ-साथ कांग्रेस संगठन में भी उनका व्यापक नेटवर्क है। चुनावी राजनीति की बारीकियों को समझने और आखिरी समय में समीकरण बदलने की उनकी क्षमता को उनके समर्थक उनकी बड़ी ताकत मानते हैं। यही वजह है कि उन्हें राजस्थान की राजनीति का ‘जादूगर’ कहा जाता है। वे भले ही उम्र के लिहाज से पुराने खिलाड़ी हों, लेकिन राजनीति से उनका बाहर होना अभी आसान नहीं दिखता।
युवा सचिन पायलट : पायलट कांग्रेस के भीतर सबसे चर्चित युवा चेहरा हैं। युवाओं के बीच उनकी लोकप्रियता और व्यक्तिगत राजनीतिक पहचान उनकी पूंजी है। 2018 के विधानसभा चुनाव में प्रदेश अध्यक्ष के रूप में कांग्रेस को सत्ता तक पहुंचाने में उनकी भूमिका ने कार्यकर्ताओं के बीच उनका आधार मजबूत किया। मुख्यमंत्री पद को लेकर 2018 में जो फैसला हुआ, उसकी कसक पायलट समर्थकों के बीच आज भी है। 2020 की बगावत के बाद भी पायलट का राजनीतिक प्रभाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ, बल्कि उनकी दावेदारी और अधिक स्पष्ट हुई है।
तेज-तर्रार गोविंदसिंह डोटासरा : डोटासरा की बड़ी ताकत संगठन है। प्रदेश अध्यक्ष के रूप में लंबे समय तक काम करने से कार्यकर्ताओं और संगठन के पदाधिकारियों के बीच उनकी सीधी पहुंच है। शेखावाटी की राजनीति में उनकी मजबूत पकड़ है और वे पार्टी के मुद्दों को आक्रामक अंदाज में उठाने के लिए जाने जाते हैं। यही तेवर उनकी राजनीतिक पहचान का हिस्सा भी है। अब सवाल यह है कि संगठन पर उनकी पकड़ को वे भविष्य की मुख्यमंत्री पद की दावेदारी में कितना बदल पाते हैं।
राहुल की तारीफ से आगे की असली परीक्षा
राहुल गांधी की ओर से डोटासरा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली की प्रशंसा संगठन के लिए उत्साह का संकेत हो सकती है, लेकिन इससे मुख्यमंत्री पद की दौड़ का फैसला नहीं होता। विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं और कांग्रेस के भीतर कई राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं।
डोटासरा की चुनौती यह है कि संगठन पर पकड़ को व्यापक जनाधार में बदलें। पायलट के सामने चुनौती अपनी व्यक्तिगत लोकप्रियता को संगठन की सामूहिक ताकत में बदलने की है। गहलोत के सामने चुनौती यह है कि लंबे राजनीतिक अनुभव और नेटवर्क को भविष्य की भूमिका के अनुरूप कैसे इस्तेमाल करें। इसलिए अभी किसी एक नेता को रेस में आगे या पीछे बताना जल्दबाजी होगी। असली मुकाबला आने वाले समय में उनके राजनीतिक प्रदर्शन, संगठनात्मक प्रभाव और चुनावी उपयोगिता से तय होगा।
यहीं से बनेगी जीत की ‘गणित’
राजस्थान में हर पांच साल में सत्ता बदलने का पैटर्न कांग्रेस के लिए उम्मीद जरूर जगाता है, लेकिन केवल सत्ता विरोधी माहौल से सत्ता में वापसी सुनिश्चित नहीं होती। उसके लिए संगठन, नेतृत्व और चुनावी रणनीति तीनों का एक दिशा में होना जरूरी है। कांग्रेस के सामने आज यही सबसे बड़ा सवाल है, क्या गहलोत का अनुभव, पायलट की लोकप्रियता और डोटासरा की संगठनात्मक ताकत एक-दूसरे को काटेंगी या एक-दूसरे के पूरक बनेंगी?
यदि तीनों अपने-अपने राजनीतिक प्रभाव को कांग्रेस की सामूहिक ताकत में बदल पाए तो पार्टी के लिए 2028 की लड़ाई आसान हो सकती है। कांग्रेस के लिए असली खतरा तीन नेताओं का होना नहीं है। खतरा यह है कि तीन शक्ति केन्द्र तीन अलग-अलग दिशाओं में खिंचने लगें। 2028 की सत्ता की लड़ाई भाजपा से बाद में होगी। उससे पहले राजस्थान कांग्रेस को अपने ही तीन शक्ति केन्द्रों के बीच संतुलन साधना होगा। यही संतुलन तय करेगा कि जीत की ‘गणित’ कांग्रेस के पक्ष में बनेगी या उसकी अपनी खींचतान उसे फिर सत्ता से दूर कर देगी।






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