भाजपा-कांग्रेस को अपनों का डर
अजमेर नगर निगम चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के सामने विपक्ष से ज्यादा अपने असंतुष्टों को संभालने की चुनौती है। टिकट बंटवारे के बाद गुटबाजी और भीतरघात निर्णायक हो सकते...

अजमेर चुनाव राजनीति
धर्मेंद्र प्रजापति,
वरिष्ठ पत्रकार
Table Of Content
- अजमेर चुनाव राजनीति
- भाजपा : धर्मेंद्र गहलोत के इस्तीफे से बदले समीकरण
- भाजपा में टिकट वितरण सबसे बड़ी परीक्षा
- कांग्रेस : पुरानी गुटबाजी बन सकती है सिरदर्द
- बागी से ज्यादा ‘निष्क्रियता’ का खतरा
- महापौर की महिला सीट ने बढ़ाई प्रतिस्पर्धा
- 80 वार्ड, 80 अलग-अलग समीकरण
- टिकट घोषित होने के बाद सामने आएगी असली तस्वीर
- मुकाबला भाजपा-कांग्रेस का, लेकिन चाबी ‘अपनों’ के हाथ
अजमेर नगर निगम चुनाव की बिसात बिछ चुकी है। 80 वार्डों का आरक्षण तय होने के बाद दावेदार सक्रिय हैं और महापौर की कुर्सी महिला के लिए आरक्षित होने से मुकाबला दिलचस्प हो गया है। लेकिन इस चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के सामने बड़ी चुनौती एक-दूसरे को हराने की बजाय अपने ही घर को संभालने की है।
भाजपा में पूर्व महापौर धर्मेंद्र गहलोत के इस्तीफे ने लंबे समय से अंदरखाने चल रहे मतभेद को सार्वजनिक संघर्ष में बदल दिया है। वहीं कांग्रेस में अशोक गहलोत और सचिन पायलट से जुड़े स्थानीय राजनीतिक खेमों के बीच दूरी कोई नई बात नहीं है। चुनाव से पहले अलग-अलग शक्ति प्रदर्शन यह संकेत दे रहे हैं कि टिकट वितरण के बाद असली परीक्षा शुरू होगी।
भाजपा : धर्मेंद्र गहलोत के इस्तीफे से बदले समीकरण
अजमेर भाजपा के भीतर लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक खींचतान अब खुले संघर्ष में बदल गई है। पूर्व महापौर धर्मेंद्र गहलोत ने भाजपा की प्राथमिक सदस्यता के साथ निकाय चुनाव के लिए मिले नागौर जिला प्रभारी पद से भी इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष एवं अजमेर उत्तर विधायक वासुदेव देवनानी के साथ अपने राजनीतिक और वैचारिक मतभेदों को सार्वजनिक करते हुए तीखे आरोप लगाए हैं। जबकि देवनानी ने कहा है कि उनका किसी से कोई मतभेद नहीं है। नगर निगम की राजनीति में धर्मेंद्र गहलोत का लंबा अनुभव है। हालांकि इस्तीफे का वास्तविक चुनावी असर कितना होगा, यह प्रत्याशी चयन और आने वाले दिनों की राजनीतिक गतिविधियों से स्पष्ट होगा। भाजपा को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि अंदरूनी नाराजगी मतदान केंद्र तक न पहुंचे।
भाजपा में टिकट वितरण सबसे बड़ी परीक्षा
नगर निगम के 80 वार्डों की आरक्षण लॉटरी ने कई पुराने दावेदारों की जमीन बदल दी है। कुछ मौजूदा और पूर्व पार्षदों के वार्ड आरक्षित होने से उन्हें नया वार्ड तलाशना पड़ सकता है, जबकि कई नए दावेदार टिकट की कतार में आ गए हैं। नगर निगम चुनाव विधानसभा या लोकसभा चुनाव से अलग है। यहां एक वार्ड में कुछ सौ वोटों का उलटफेर भी परिणाम बदल सकता है। यदि टिकट नहीं मिलने वाला नेता खुलकर बगावत न कर सिर्फ निष्क्रिय हो जाए, तो भी पार्टी प्रत्याशी को नुकसान संभव है। कार्यकर्ताओं का घर बैठ जाना, समर्थकों को सक्रिय नहीं करना अथवा दूसरे प्रत्याशी के प्रति नरम रुख अपनाना भी स्थानीय चुनाव में निर्णायक साबित हो सकता है।
धर्मेंद्र गहलोत प्रकरण के बाद भाजपा नेतृत्व के सामने इसलिए दोहरी चुनौती है, टिकट का सही चयन और नाराज कार्यकर्ताओं का प्रबंधन। सत्ता में रहने वाली पार्टी में दावेदार ज्यादा हैं तो असंतुष्ट भी ज्यादा हैं। गहलोत स्वयं कह चुके हैं कि देवनानी के साथ उनका राजनीतिक संघर्ष आगे भी जारी रहेगा। इसलिए अब नजर इस बात पर रहेगी कि गहलोत आगे क्या राजनीतिक रुख अपनाते हैं और उनके साथ जुड़े स्थानीय कार्यकर्ता नगर निगम चुनाव में किस भूमिका में दिखाई देते हैं।
कांग्रेस : पुरानी गुटबाजी बन सकती है सिरदर्द
अजमेर कांग्रेस की समस्या कुछ अलग है। यहां लंबे समय से अलग-अलग राजनीतिक खेमे सक्रिय रहे हैं। अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच रही राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की छाया अजमेर की स्थानीय राजनीति पर भी दिखाई देती रही है। पिछले पांच साल से सचिन पायलट समर्थक विजय जैन ही शहर जिला कांग्रेस अध्यक्ष की जिम्मेदारी वहन कर रहे थे, लेकिन करीब तीन माह पहले ही प्रदेश आलाकमान ने गहलोत समर्थक पूर्व विधायक राजकुमार जयपाल को अध्यक्ष की कमान सौंप दी। इसके पीछे गहलोत समर्थक पूर्व आरटीडीसी चेयरमैन धर्मेन्द्र राठौड़ का हाथ माना जा रहा है। निगम चुनाव के ऐन वक्त यह बदलाव गुटबाजी को और बढ़ा सकता है। दोनों खेमे अलग-अलग कार्यक्रमों के माध्यम से शक्ति प्रदर्शन कर चुके हैं। पायलट समर्थकों ने पूर्व अध्यक्ष विजय जैन और वरिष्ठ कांग्रेस नेता हेमंत भाटी के नेतृत्व में श्रीनगर रोड खंडेलवाल धर्मशाला में कार्यकर्ता संवाद और गहलोत समर्थकों ने वर्तमान अध्यक्ष डा. राजकुमार जयपाल, पूर्व आरटीडीसी चेयरमैन धर्मेन्द्र राठौड़, डेयरी अध्यक्ष रामचंद्र चौधरी, प्रतिपक्ष नेता द्रोपदी कोली के नेतृत्व में नसीराबाद रोड स्थित निजी समारोह स्थल में कार्यकर्ता सम्मेलन कर अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया। ऐसे में कांग्रेस के लिए चुनावी वैतरणी पार करना चुनौती भरा है।
अब कांग्रेस के सामने असली सवाल यह है कि टिकट वितरण के समय किस खेमे के कितने लोगों को टिकट मिलता है। यदि टिकटों में किसी एक समूह के वर्चस्व की धारणा बनती है तो दूसरे खेमे की नाराजगी चुनाव में भारी पड़ सकती है। यह स्थिति इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि पार्टी निकाय चुनाव के टिकटों के लिए ऑनलाइन आवेदन जैसी प्रक्रिया अपना रही है और कांग्रेस का प्रदेश नेतृत्व चयन प्रक्रिया की निगरानी करेगा। इसका उद्देश्य पारदर्शिता बढ़ाना है।
बागी से ज्यादा ‘निष्क्रियता’ का खतरा
नगर निगम चुनाव में पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार के खिलाफ निर्दलीय मैदान में उतरना भीतरघात का सबसे दिखाई देने वाला रूप है। लेकिन इससे कहीं अधिक खतरनाक वह कार्यकर्ता है जो पार्टी में रहते हुए चुनाव से दूरी बना ले। अजमेर दक्षिण क्षेत्र में कांग्रेस के कई वार्ड हैं, जहां प्रत्याशी की जीत संगठन के वोट से ज्यादा स्थानीय नेटवर्क, जातीय समीकरण और व्यक्तिगत संपर्क पर निर्भर करेगी। कोली बाहुल्य वार्डों में कांग्रेस नेता हेमंत भाटी का वर्चस्व माना जाता है। इस क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ीं द्रोपदी कोली की हार के पीछे भी भाटी का वर्चस्व प्रमुख कारण माना जाता है। भाटी इस क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट पर दो बार चुनाव हारने के बाद तीसरी बार टिकट मांग रहे थे, लेकिन अशोक गहलोत गुट की द्रोपदी कोली को टिकट दिया गया और उन्हें हार का सामना करना पड़ा। अब निगम चुनाव में कोली समाज बाहुल्य वार्डों में टिकट वितरण को लेकर गहलोत गुट के डा. राजकुमार जयपाल, विधानसभा प्रत्याशी द्रोपदी कोली और हेमंत भाटी के बीच रस्साकसी जारी है। ऐसे में टिकट से वंचित किसी मजबूत दावेदार के समर्थक यदि निष्क्रिय हो गए तो कुछ सौ वोटों का अंतर भी परिणाम पलट सकता है। इसलिए कांग्रेस को उम्मीदवार तय करने के साथ ही बाकी दावेदारों को भी उम्मीदवार के साथ खड़ा करना होगा। धर्मेन्द्र राठौड़ हालांकि हेमंत भाटी, द्रोपदी कोली और डा. राजकुमार जयपाल के बीच सुलह की कोशिश कर रहे हैं। 14 अगस्त को हेमंत भाटी के जन्मदिन पर गहलोत समर्थक नेताओं ने उनके निवास पर पहुंचकर शुभकामनाएं दी थीं और बातचीत के रास्ते बहाल किए।
महापौर की महिला सीट ने बढ़ाई प्रतिस्पर्धा
इस बार अजमेर नगर निगम में महापौर का पद महिला के लिए आरक्षित है। इसके चलते भाजपा और कांग्रेस दोनों में महिला चेहरों को लेकर राजनीतिक सक्रियता बढ़ी है। कई प्रभावशाली नेता ऐसे वार्ड से अपनी पत्नी, परिवार की महिला सदस्य या समर्थक महिला नेता को टिकट दिलाने का प्रयास कर सकते हैं, जहां से जीत के बाद महापौर पद की दावेदारी बनाई जा सके।
यानी कुछ वार्डों का टिकट केवल ‘कौन पार्षद बनेगा’ के आधार पर नहीं, बल्कि ‘जीतने के बाद कौन बनेगा महापौर’ की रणनीति से भी देखा जाएगा। यही परिस्थिति भीतरघात का एक नया कारण पैदा कर सकती है।
80 वार्ड, 80 अलग-अलग समीकरण
आरक्षण व्यवस्था के बाद लगभग सभी 80 वार्डों में कई पुराने समीकरण बदल चुके हैं। शहर में एक साथ चुनाव होने के बावजूद हर वार्ड की अपनी अलग राजनीति होती है। कहीं जातीय समीकरण प्रभावी होता है, कहीं उम्मीदवार का व्यक्तिगत संपर्क। कहीं पार्टी का परंपरागत वोट निर्णायक है तो कहीं स्थानीय समस्या और पार्षद का पांच साल का काम। ऐसी परिस्थिति में पार्टी की अंदरूनी एकजुटता महत्वपूर्ण हो जाती है। लोकसभा चुनाव में पार्टी की बड़ी लहर असंतोष को दबा सकती है, लेकिन पार्षद के चुनाव में दस-पंद्रह प्रभावशाली परिवारों का रुख भी परिणाम बदल सकता है।
टिकट घोषित होने के बाद सामने आएगी असली तस्वीर
अभी दोनों पार्टियों में दावेदारी का दौर है। हर नेता निष्ठा की बात कर रहा है, लेकिन असली राजनीतिक तस्वीर उम्मीदवारों की सूची जारी होने के बाद सामने आएगी। तब तीन तरह के नेता दिखाई देंगे, टिकट पाने वाले, टिकट कटने के बाद पार्टी के साथ खड़े रहने वाले और टिकट कटने के बाद हिसाब चुकाने वाले। तीसरी श्रेणी भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए सबसे बड़ी चिंता होगी। नगर निगम चुनाव में कई बार पार्टी प्रत्याशी विरोधी दल से नहीं, बल्कि अपने ही संगठन की नाराजगी से हारता है। उम्मीदवार चुनाव मैदान में सामने वाले प्रत्याशी को देखता रहता है जबकि राजनीतिक जमीन उसके पीछे से खिसक जाती है।
मुकाबला भाजपा-कांग्रेस का, लेकिन चाबी ‘अपनों’ के हाथ
इस तरह नगर निगम चुनाव बेहद दिलचस्प रहने वाला है। एक तरफ भाजपा सत्ता, संगठन और अपने परंपरागत आधार के भरोसे मैदान में उतरेगी, लेकिन धर्मेंद्र गहलोत प्रकरण ने उसकी अंदरूनी राजनीति को चुनाव से ठीक पहले चर्चा के केंद्र में ला दिया है। दूसरी तरफ कांग्रेस भाजपा की इस कमजोरी का लाभ उठाना चाहेगी, लेकिन पहले उसे अपने ही गहलोत-पायलट खेमों के बीच राजनीतिक तालमेल की परीक्षा पास करनी होगी। इसलिए इस बार अजमेर नगर निगम चुनाव का सबसे महत्वपूर्ण सवाल शायद यह नहीं होगा कि भाजपा मजबूत है या कांग्रेस, बल्कि यह होगा कि कौन-सी पार्टी अपने नाराज नेताओं और टिकट से वंचित दावेदारों को बेहतर तरीके से संभाल पाती है? क्योंकि 80 वार्डों की इस लड़ाई में कई सीटों पर हार-जीत का अंतर बहुत छोटा हो सकता है। यदि टिकट वितरण के बाद दोनों दलों में बगावत और भीतरघात बढ़ा, तो अजमेर नगर निगम की सत्ता का फैसला सिर्फ मतदाता नहीं बल्कि पार्टी के भीतर बैठे असंतुष्ट चेहरे भी कर सकते हैं।






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