बारह वर्षों में कितना बदला भारत
मोदी सरकार के बारह वर्षों में भारत की वैश्विक भूमिका बदली है। कूटनीति, रक्षा, तकनीक और रणनीतिक स्वायत्तता के दम पर भारत अब विश्व व्यवस्था में प्रभावशाली शक्ति के रूप में उभरा...

मोदी युग
हरीश मलिक,
लेखक, विश्लेषक
Table Of Content
- मोदी युग
- एक दशक में बदली भारत की जगह
- अमेरिका से अब रणनीतिक साझेदारी
- रूस से दोस्ती को मिले नए अर्थ
- चालाक चीन के मोर्चे पर अभी भी चुनौती
- पश्चिम एशिया में संतुलन की नई मिसाल बना भारत
- यूरोप-भारत में साझेदारी अब व्यापार से आगे
- जी-20 से बनी ग्लोबल साउथ की बुलंद आवाज
- क्वाड और हिंद-प्रशांत में बढ़ता प्रभाव
- डिफेंस: आयातक भारत से निर्यातक न्यू इंडिया तक
- मोदी की व्यक्तिगत कूटनीति में भी ‘नेशन फर्स्ट’
- भारत बनाम न्यू इंडिया की झलक दिखाते आंकड़े
बीते बारह वर्षों में भारत की वैश्विक स्थिति में आया बदलाव केवल आंकड़ों की कहानी नहीं है, बल्कि यह बदलते आत्मविश्वास, सामर्थ्य और निर्णायक नेतृत्व की कहानी है। देश ने अपनी क्षमताओं को वैश्विक प्रभाव में बदलने की दिशा में जिस गति और शक्ति से कदम बढ़ाए हैं, उसने दुनियाभर का नजरिया बदला है। युद्ध और शांति के सवालों से लेकर आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई तक, यूपीआई जैसी डिजिटल क्रांति से लेकर अंतरिक्ष की नई उड़ानों तक, कोरोना वैक्सीन से लेकर रक्षा आत्मनिर्भरता तक, आज भारत अपनी आवश्यकताओं के साथ-साथ दुनिया की जरूरतों का समाधान देने की क्षमता भी दिखा रहा है। स्टार्टअप, नवाचार और तकनीक ने भारत को नई आर्थिक शक्ति के रूप में स्थापित किया है, जबकि ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूती देने में अहम भूमिका रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विजन पर चलते हुए दुनिया आज भारत को केवल एक बड़े बाजार के रूप में ही नहीं, बल्कि भरोसेमंद साझेदार और भविष्य को दिशा देने वाले देश के रूप में देख रही है।
एक दशक में बदली भारत की जगह
एक दशक पहले तक भारत वैश्विक शक्ति-संतुलन में एक बड़ी संभावना था, लेकिन आज वह उसके समीकरणों को प्रभावित करने वाली मजबूत शक्ति है। 2014 के बाद भारतीय विदेश नीति ने अपनी परंपरागत सीमाओं से बाहर निकलकर वॉशिंगटन से मॉस्को, टोक्यो से तेल अवीव और खाड़ी से अफ्रीका तक संवाद और साझेदारी के नए रास्ते बनाए हैं। जापान के साथ भारत का संबंध बाजार और व्यापार से आगे बढ़कर रणनीतिक हो गया है। मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल से लेकर सेमीकंडक्टर, स्वच्छ ऊर्जा, अंतरिक्ष और हिंद-प्रशांत सुरक्षा तक दोनों देशों की साझेदारी बढ़ी है। चीन की चुनौती कायम है, लेकिन सीमा पर प्रतिरोध मजबूत हुआ है। सबसे अहम यह कि भारत ने किसी एक शक्ति-धुरी का हिस्सा बनने के बजाय अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को नई धार दी। नई कूटनीति ने ‘न्यू इंडिया’ को वैश्विक मंच का मुखर चेहरा बना दिया है। बड़ा सवाल यह है कि क्या मोदी-युग में दुनिया के साथ भारत के रिश्ते बदले हैं या दुनिया में भारत की जगह ही बदल गई है?
अमेरिका से अब रणनीतिक साझेदारी
भारत-अमेरिका संबंधों में परिवर्तन शायद मोदी काल की विदेश नीति का सबसे स्पष्ट उदाहरण है। पिछले 12 वर्षों में रक्षा और तकनीक के क्षेत्र में रिश्तों ने रणनीतिक रूप ले लिया है। 2023 में प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिकी यात्रा के दौरान GE के F-414 जेट इंजन के भारत में सह-उत्पादन और MQ-9B ड्रोन से जुड़ी घोषणाएं हुईं। 2025 में दोनों देशों ने रक्षा बिक्री और सह-उत्पादन बढ़ाने का निर्णय दोहराया। हालांकि रिश्ते में व्यापार, टैरिफ और रूस से तेल खरीद जैसे मतभेद भी सामने आए हैं। 2025-26 में अमेरिकी टैरिफ को लेकर तनाव इसका प्रमाण है। इसलिए भारत-अमेरिका संबंध मजबूत जरूर हुए हैं, लेकिन वे अधीनता पर नहीं, साझे हित और बातचीत की क्षमता पर आधारित हैं।
रूस से दोस्ती को मिले नए अर्थ
रूस के साथ भारत के संबंधों का चरित्र बदला है। यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों के दबाव के बावजूद भारत ने व्लादिमीर पुतिन के साथ संवाद कायम रखा। रक्षा-निर्भरता के साथ शुरू हुआ रिश्ता अब व्यापार, परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष और रणनीतिक संवाद तक फैल चुका है। आर्थिक पक्ष इस दोस्ती का जीवंत उदाहरण है। 2024-25 में द्विपक्षीय व्यापार 68.7 अरब डॉलर का रिकॉर्ड स्तर छू गया, जो 2014-15 में करीब 10 अरब डॉलर था। रूसी तेल की 2026 में भारत के कुल कच्चे तेल आयात में हिस्सेदारी 50.83 प्रतिशत तक पहुंच गई। भारत ने रूस को पश्चिम के विकल्प के रूप में नहीं चुना और अमेरिका को रूस का विकल्प नहीं बनाया। हमने दोनों के साथ रिश्तों को अपने हितों के अनुरूप अलग-अलग संभाला।
चालाक चीन के मोर्चे पर अभी भी चुनौती
चीन भारत की सबसे बड़ी दीर्घकालिक रणनीतिक चुनौतियों में से एक है और यह कहना सही नहीं होगा कि मोदी सरकार ने इस चुनौती को पूरी तरह समाप्त कर दिया है। 2020 का गलवान संघर्ष, सीमा पर भारी सैन्य तैनाती और वास्तविक नियंत्रण रेखा पर जारी तनाव इसका प्रमाण हैं। लेकिन असल परिवर्तन भारत के ‘एक्शन मोड’ से आया है। भारत ने सीमा पर बुनियादी ढांचे और सैन्य तैयारी को मजबूत किया। क्वाड को भी सक्रिय किया है, हिंद-प्रशांत में साझेदारियां बढ़ाई हैं और चीन के सामने आर्थिक-सामरिक निर्भरता घटाने की दिशा में अहम कदम उठाए। अक्टूबर 2024 में दोनों देशों के बीच पूर्वी लद्दाख में गश्त और सैनिकों की वापसी को लेकर समझौता हुआ, जिससे 2020 से बने सैन्य गतिरोधों को कम करने का रास्ता खुला। हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि इससे सीमा विवाद का मूल समाधान नहीं हुआ है।
पश्चिम एशिया में संतुलन की नई मिसाल बना भारत
पश्चिम एशिया में भारत की भूमिका पिछले 12 वर्षों में काफी बदली है। कभी यह मुख्यतः तेल और प्रवासी भारतीयों का क्षेत्र माना जाता था। आज संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, इजरायल और अन्य पश्चिमी एशियाई देशों के साथ भारत के संबंध रणनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा सहयोग तक पहुंच चुके हैं। भारत ने इजरायल के साथ रक्षा और तकनीकी साझेदारी मजबूत की तो दूसरी ओर यूएई और सऊदी अरब के साथ निवेश, ऊर्जा और व्यापार संबंधों को भी नई ऊंचाई दी। भारत की कूटनीति इसलिए अहम है, क्योंकि वह एक ही समय में इजरायल और अरब देशों के साथ संवाद बनाए रखने में सक्षम है। पश्चिम एशिया के लगातार बदलते समीकरणों के बीच यह संतुलन आसान नहीं है।
यूरोप-भारत में साझेदारी अब व्यापार से आगे
भारत अब यूरोप के लिए केवल एक बाजार नहीं, बल्कि रणनीतिक और तकनीकी साझेदार के रूप में उभर रहा है। जी-20 शिखर सम्मेलन में घोषित भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा यानी IMEC हमारी कूटनीति का बड़ा उदाहरण है। इसका उद्देश्य भारत को पश्चिम एशिया के रास्ते यूरोप से जोड़ना है। यह गलियारा पारंपरिक लाल सागर और स्वेज नहर मार्ग की तुलना में व्यापारिक परिवहन समय को 40 प्रतिशत और लॉजिस्टिक्स लागत को करीब 30 प्रतिशत कम कर देगा। इससे वैश्विक सप्लाई चैन में भारत के निर्यात में तेजी आएगी, मध्य पूर्व और यूरोप के बाजारों तक सीधी पहुंच मिलेगी। इसके साथ ही यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने 2025 में एक ऐतिहासिक और बड़े प्रतिनिधिमंडल के साथ भारत का दौरा किया, जो हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपनी तरह की पहली उच्चस्तरीय यात्रा थी। भारत में यह अब तक का सबसे बड़ा यूरोपीय प्रतिनिधिमंडल था। 2026 के भारत-यूरोपीय संघ एजेंडे में हाई-स्पीड रेल, डिजिटलाइजेशन और डीकार्बोनाइजेशन जैसे क्षेत्रों में सहयोग को आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया है।
जी-20 से बनी ग्लोबल साउथ की बुलंद आवाज
भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक उपलब्धियों में 2023 की जी-20 अध्यक्षता को रखा जा सकता है। 125 देशों की भागीदारी के बीच भारत ने जी-20 को केवल विकसित और बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का मंच न बनाकर विकासशील देशों की चिंताओं को भी मुखर किया। अफ्रीकी संघ को जी-20 का स्थायी सदस्य बनाए जाने में भी भारत की भूमिका अहम रही। यहीं हमारी विदेश नीति का एक नया चेहरा नजर आया। भारत स्वयं को केवल ‘विकासशील देश’ के रूप में प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि विकासशील दुनिया और विकसित शक्तियों के बीच संवाद-सेतु के रूप में स्थापित भी किया।
क्वाड और हिंद-प्रशांत में बढ़ता प्रभाव
क्वाड (QUAD) यानि चतुर्भुज सुरक्षा संवाद में भारत की भूमिका मोदी काल में बढ़ी है। अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत का यह समूह अब केवल रणनीतिक संवाद का मंच नहीं रह गया है। इसका महत्व केवल चीन के संदर्भ में नहीं है, बल्कि समुद्री सुरक्षा, आपदा राहत, महत्वपूर्ण तकनीक, ऊर्जा और सप्लाई चैन तक सहयोग का विस्तार हो चुका है। 2024 के क्वाड शिखर सम्मेलन और मई 2026 में नई दिल्ली में हुई क्वाड विदेश मंत्रियों की बैठक में Indo-Pacific Energy Security Initiative शुरू करने की घोषणा हुई। समुद्री निगरानी, लॉजिस्टिक्स नेटवर्क और क्षेत्रीय बंदरगाह इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी सहयोग बढ़ाने की पहल हुई। इसके मायने यह हैं कि हिंद-प्रशांत में भारत अब केवल भौगोलिक रूप से मौजूद देश नहीं, बल्कि क्षेत्रीय व्यवस्था को प्रभावित करने वाला प्रमुख शक्ति-केंद्र बन गया है।
डिफेंस: आयातक भारत से निर्यातक न्यू इंडिया तक
एक दशक के परिवर्तन की कहानी केवल प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं, विश्व नेताओं से मुलाकातों या बड़े-बड़े सम्मेलनों की तस्वीरों में नहीं मिलती। इसके प्रमाण रक्षा निर्यात के आंकड़ों में भी मिलते हैं। रक्षा निर्यात 2013-14 के महज 686 करोड़ से बढ़कर 2025-26 में रिकॉर्ड 38,424 करोड़ रुपए हो गया है। एक समय भारत दुनिया के सबसे बड़े रक्षा आयातकों में शामिल था। आज भारतीय रक्षा उत्पाद 80 से अधिक देशों तक पहुंच रहे हैं। इसी अवधि में घरेलू रक्षा उत्पादन भी 2025-26 में रिकॉर्ड 1.78 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया। कभी भारत अत्याधुनिक हथियारों के लिए विदेशों पर निर्भर था, वही अब ब्रह्मोस जैसे सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल सिस्टम का निर्यात कर रहा है। 2026 में वियतनाम के साथ ब्रह्मोस का सौदा हुआ, जबकि इंडोनेशिया से करीब 450 मिलियन डॉलर का सौदा प्रक्रियाधीन है। इससे पहले फिलीपींस ने भी भारत के साथ यह सौदा किया था।
मोदी की व्यक्तिगत कूटनीति में भी ‘नेशन फर्स्ट’
मोदी की रणनीतिक कूटनीति ने भारत की विदेश नीति को एक नया आयाम दिया है। प्रवासी भारतीयों से बड़े जनसमुदायों में संवाद, भारतीय योग-संस्कृति का वैश्विक मंच पर बखान और विदेश यात्राओं को जन-कूटनीति में बदलना मोदी शैली की विशेषताएं हैं। यह बहुध्रुवीय विश्व में रणनीतिक स्वायत्तता का आधुनिक रूप है। भारत किसी एक खेमे का स्थायी अनुयायी बनने के बजाय विभिन्न मुद्दों पर अलग-अलग साझेदारों के साथ काम कर रहा है।
यह भी शाश्वत सत्य है कि व्यक्तिगत कूटनीति की भी एक सीमा है। किसी भी नेता की लोकप्रियता स्थायी शक्ति नहीं बन सकती। इसके पीछे मजबूत अर्थव्यवस्था, संस्थागत क्षमता, सैन्य शक्ति और तकनीकी सामर्थ्य जरूरी है। इसीलिए भारत आज वैश्विक व्यवस्था का दर्शक नहीं, बल्कि उसके निर्माण में अपनी भूमिका निभाने वाला खिलाड़ी बन गया है। भारत ने दुनिया से यह पूछना बंद कर दिया है कि उसे वैश्विक मंच पर कौन-सी भूमिका दी जाएगी? अब वह खुद अपनी भूमिका पूरे आत्मविश्वास और सामर्थ्य के साथ तय कर रहा है।
भारत बनाम न्यू इंडिया की झलक दिखाते आंकड़े
INFRA 2014 2026
स्टार्टअप 500 2.30 लाख
रक्षा निर्यात 700 करोड़ रु. 38,424 करोड़ रु.
एक्सप्रेसवे 1,000 किमी 6,700 किमी
डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर 0 2,843 किलोमीटर
पीएनजी कनेक्शन 25 लाख 1.6 करोड़
हर घर जल 17% घर कवर 80% घर कवर
बिजली उत्पादन 249 गीगावाट 540 गीगावाट
नवीकरणीय ऊर्जा 54 गीगावाट 248 गीगावाट
सौर ऊर्जा 2.6 गीगावाट 162 गीगावाट
मेट्रो रेल 250 किमी 1,000 किलोमीटर
हवाई अड्डे 74 एयरपोर्ट 164 एयरपोर्ट
रेलवे विद्युतीकरण 21,800 किमी 69,800 किलोमीटर
एम्स संस्थान 8 एम्स 23 एम्स
राष्ट्रीय राजमार्ग 18,371 किमी 45,516 किमी
कोयला उत्पादन 565 मि.टन 1,000 मिलियन टन
राष्ट्रीय जलमार्ग 5 जलमार्ग 32 जलमार्ग
अंतर्देशीय जलमार्ग 29 मिलियन 218 मिलियन
परिवहन मीट्रिक टन मीट्रिक टन
(सोत्र – प्रेस इन्फॉरमेशन ब्यूरो)





No Comment! Be the first one.