बिहार में नीतीश के बाद कौन!
नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के साथ बिहार की राजनीति नए मोड़ पर खड़ी है। लंबे समय तक सत्ता की धुरी रहे नेतृत्व के हटने से अब सबसे बड़ा सवाल उत्तराधिकारी का है। भाजपा के भीतर कई दावेदार उभर रहे हैं,...

बिहार की सत्ता में नेतृत्व परिवर्तन की आहट, भाजपा की अब पांच राज्यों पर नजर
लगभग साढ़े 19 वर्षों तक बिहार की सत्ता की धुरी रहे नीतीश कुमार अब राज्यसभा सदस्य बनकर केंद्र की राजनीति में चले गए हैं। इसी के साथ यह तय हो गया है कि अब बिहार की बागडोर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के हाथों में रहेगी। ऐसा इसलिए कि बिहार विधानसभा में भाजपा ही 2020 से बड़े भाई की भूमिका में है। 2020 के विधानसभा चुनाव में नीतीश की जदयू तीसरे नंबर की पार्टी थी। 243 सदस्यीय बिहार विधानसभा में उसके महज 43 विधायक थे, लेकिन तब विपक्ष मजबूत था। इसलिए नीतीश अपनी सुविधा के अनुसार महागठबंधन के साथ मिलकर पाला बदल लिए थे। अब विपक्ष खुद ही औंधेमुंह गिरा पड़ा है। इसलिए इसकी गुंजाइश नहीं है। नीतीश के लिए भी आगे कुआं, पीछे खाई की स्थिति है। अगर फिर भी जोड़तोड़ में जुटे तो पार्टी टूटने का खतरा है। भाजपा ने उनके इर्दगिर्द जमकर घेराबंदी कर दी है। राजनीतिक गलियारों में पूछा जा रहा है कि नीतीश की विदाई में किसका हाथ है!
Table Of Content
- बिहार की सत्ता में नेतृत्व परिवर्तन की आहट, भाजपा की अब पांच राज्यों पर नजर
- पहले भी चौंकाते रहे हैं नीतीश
- नीतीश का विकल्प बनना निशांत के लिए कठिन
- हतप्रभ विपक्ष की उम्मीदों पर ओले
- आखिर भाजपा को मौका मिल ही गया
- नीतीश के बाद बिहार की सत्ता का सम्राट कौन?
- बिहार की चाल से पांच राज्यों में बढ़त में भाजपा
- क्यों चूक गए नीतीश!
नीतीश अपनी पार्टी जनता दल (यूनाईटेड) के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। वह जब चाहते राज्यसभा जा सकते थे, क्योंकि विधानसभा में जदयू के 85 विधायक हैं। 243 सदस्यीय बिहार विधानसभा में राज्यसभा की एक सीट के लिए 41 विधायकों का वोट जरूरी होता है। ऐसे में जदयू अपने कोटे से हर दो साल बाद होने वाले राज्यसभा चुनाव में दो सदस्यों को राज्यसभा भेजने की क्षमता रखती है। फिर, नीतीश अभी राज्यसभा में क्यों चले गए? क्या उन पर कोई दबाव था या पार्टी में टूट की आशंका थी? क्या एनडीए में भाजपा ने उनकी कसकर घेराबंदी कर दी थी? क्या बिहार के शासन पर नीतीश का कोई नियंत्रण नहीं रह गया था? क्या पिछले साल चुनाव के दौरान नीतीश द्वारा की गई घोषणाएं अब उनके गले की घंटी बन गई थीं? ये तमाम सवाल राजनीतिक गलियारे में घूम रहे हैं। लेकिन इसका जवाब एकमात्र नीतीश के पास है और वह इस पर कोई बात करना नहीं चाहते।
वैसे भी, नीतीश कुमार ने जबसे राज्यसभा सांसद संजय झा को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया है, तभी से राजनीतिक गलियारे में जदयू के भाजपा की बी टीम बनने के कयास लगाए जाते रहे हैं। इसके ठोस कारण भी हैं। संजय भाजपा की पृष्ठभूमि से आते हैं। जदयू में आने से पहले वह बिहार विधान परिषद में भाजपा के सदस्य रह चुके हैं। जानकार तो यहां तक कहते हैं कि संजय की ताजपोशी ही केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह के कहने पर हुई थी। यह तो जगजाहिर है कि जब-जब नीतीश की महागठबंधन के नेताओं से बात बिगड़ी तब-तब संजय ही एनडीए से मिलाने में मददगार बने। संजय के अलावा केन्द्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह से भी जदयू के कुछ कार्यकर्ता नाराज बताए जाते हैं। उनका मानना है कि ललन ने भी नीतीश की पीठ में चाकू घोंपा है। ललन सिंह और नीतीश कुमार के बीच पहले भी मतभेद होते रहे हैं। वर्षों पहले, राज्यसभा सदस्य नहीं बनाने पर एक समय तो ललन नीतीश को ‘कृपा कुमार’ तक कहने लगे थे। लेकिन पता नहीं दोनों की मजबूरी क्या रही कि दोनों नेता एक-दूसरे से ज्यादा दिन तक अलग भी नहीं रह पाते हैं। जदयू कार्यकर्ताओं का गुस्सा राज्य सरकार में मंत्री और नीतीश के हनुमान कहे जाने वाले विजय चौधरी को लेकर भी है। बताया जाता है कि अमित शाह ने विजय चौधरी के माध्यम से ही नीतीश कुमार को सम्मानजनक विदाई के लिए राज्यसभा जाने की सलाह दी थी। ज्ञात रहे कि भाजपा वर्षों से नीतीश को दरकिनार करने की जुगत में थी।
पहले भी चौंकाते रहे हैं नीतीश
कहना गलत नहीं होगा कि समाज को चौंकाते रहना समाजवादियों का शगल रहा है। नीतीश कुमार भी समाजवादी विचारधारा से ही आते हैं। ऐसा भी नहीं है कि नीतीश ने पहली बार चौंकाया है। वह पहले भी चौंकाते रहे हैं। कभी अपने धुर विरोधी लालूप्रसाद यादव के महागठबंधन से हाथ मिलाकर सत्ता सुख भोगने के लिए, तो कभी भाजपा और एनडीए के साथ गठबंधन करके। अपने इसी हुनर के कारण नीतीश करीब साढ़े 19 वर्षों से बिहार की सत्ता पर काबिज रहे। इसीलिए विरोधी उन्हें कुर्सी कुमार भी कहते रहे हैं। लेकिन, इन सबके बीच यह कहना गलत नहीं होगा कि नीतीश कुमार की स्वीकार्यता पक्ष-विपक्ष दोनों में तीन दशक से बनी हुई है। सही मायनों में नीतीश पिछले दो दशकों से बिहार की सत्ता की धुरी रहे हैं।
फिलहाल, बिहार में सबकुछ ठीक चल रहा था। 2025 में हुए विधानसभा चुनाव में एनडीए को उम्मीद से अधिक वोट और सीटें मिली थीं। कुल 243 सदस्यीय विधानसभा में एनडीए को 202 सीटें मिली थीं। नीतीश कुमार ने 20 नवंबर को 10वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। लेकिन अचानक होली के दूसरे दिन नीतीश ने ट्वीट कर पक्ष-विपक्ष समेत बिहार के आम अवाम को चौंका दिया। अपने ट्वीट में नीतीश ने लिखा, ‘दो दशक से अधिक समय से आपने मेरे साथ लगातार विश्वास और समर्थन बनाए रखा। इसकी ही ताकत थी कि बिहार आज विकास और सम्मान का नया आयाम प्रस्तुत कर रहा है। संसदीय जीवन शुरू करने के समय से ही इच्छा थी कि बिहार विधानमंडल के दोनों सदनों के साथ संसद के दोनों सदनों का भी सदस्य बनूं। इसी क्रम में राज्यसभा सदस्य बनना चाह रहा हूं। बिहार की नई सरकार को मेरा पूरा समर्थन रहेगा।’ और फिर तीन घंटे के भीतर उन्होंने केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह की मौजूदगी में राज्यसभा के लिए पर्चा दाखिल कर दिया।
नीतीश का विकल्प बनना निशांत के लिए कठिन
बहरहाल, नीतीश अब राज्यसभा के लिए विधिवत निर्वाचित हो गए हैं। इसलिए उनका मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना तय है। उनके बिहार छोड़कर जाने से आक्रोशित जदयू कार्यकर्ताओं का गुस्सा भी अब शांत हो गया है। उनके आंसू सूख चुके हैं। और तो और, नीतीश भी शायद इसे नियति का खेल समझकर राज्यभर में समृद्धि यात्रा पर निकल गए हैं। बेटे निशांत को भी जदयू की सदस्यता दिला दी गई है, लेकिन क्या निशांत नीतीश का विकल्प बन सकेंगे! संदेह है।
हतप्रभ विपक्ष की उम्मीदों पर ओले
उधर, नीतीश की इस चाल से विपक्ष की बोलती बंद हो गई। उनकी रही-सही उम्मीदों पर ओले गिर गए। विपक्ष के नेता भले ही नीतीश कुमार को कुछ वर्षों से ‘पलटूराम’ कहा करते थे, लेकिन उनके मन में हमेशा यह बात रहती थी कि नीतीश कभी न कभी भाजपा के दबाव से ऊबकर उनके साथ आ सकते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो पिछले विधानसभा चुनाव में मतदाताओं ने महागठबंधन को इतनी सीटें नहीं दी, जिससे नीतीश उनके साथ कोई जोड़तोड़ कर पाते। महागठबंधन के सबसे बड़े दल राष्ट्रीय जनता दल को महज 25 सीटें मिली हैं। मुश्किल से तेजस्वी को नेता प्रतिपक्ष का दर्जा मिला है। कांग्रेस और कमजोर हुई है।
आखिर भाजपा को मौका मिल ही गया
हां, नीतीश के इस कदम से भाजपा की बाछें खिल गई है। बिहार में पहली बार उसे सरकार बनाने का मौका मिल रहा है। पिछले 21 वर्षों से भाजपा नीतीश की पिछलग्गू बनी हुई थी। नीतीश महागठबंधन के पाले में जाते थे तो उसे विपक्ष में बैठना पड़ता था। बीच के वर्षों में दो बार ऐसा हो चुका है। अब पहली बार उसे खुलकर खेलने का मौका मिलेगा। इसके अलावा नीतीश के शासनकाल की चुनावी घोषणाओं को पूरा करने की उसकी जवाबदेही भी नहीं रहेगी। साढ़े चार साल तक उसका निष्कंटक राज चलेगा। गठबंधन में शामिल जदयू के नेता समय के साथ या तो भाजपा में चले जाएंगे अथवा खंड-खंड हो जाएंगे। भाजपा का यही इतिहास रहा है। यकीन न हो तो इंडियन नेशनल लोकदल, अकाली दल, शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस आदि का इतिहास देख लें। पता चल जाएगा।
जानकार दावा तो यह भी करते हैं कि भाजपा अपनी मुहिम में काफी पहले से लगी थी। 2020 के विधानसभा चुनाव में लोगों ने बखूबी देखा कि किसके इशारे पर चिराग की लोजपा ने भाजपा के टिकट से वंचित नेताओं को अपने बैनर तले जदयू उम्मीदवारों के खिलाफ मैदान में उतार दिया था। नतीजतन, जदयू 43 सीटों पर सिमट गई थी। 2025 चुनाव के दौरान टिकट बंटवारे में भाजपा ने जदयू की सीटिंग सीटें भी लोजपा को दे दी थी। जदयू की ओर से सीटों की बातचीत कर रहे पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा और मंत्री राजीव रंजन सिंह ऊर्फ ललन सिंह तो मान भी गए थे। लेकिन समय रहते नीतीश सचेत हो गए और उन्होंने करीब आधा दर्जन सीटों पर उम्मीदवार उतार दिए थे। वे जीतकर आ भी गए। तब भाजपा के चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह मन मसोस कर रह गए थे। यही नहीं विधानसभा चुनाव के दौरान भी एक टीवी इंटरव्यू में अमित शाह ने साफ कहा था कि मुख्यमंत्री का फैसला विधायक करेंगे। हालांकि नुकसान होता देख भाजपा नेताओं को चुनाव के बीच नीतीश के नाम पर मुहर लगानी पड़ी थी।
नीतीश के बाद बिहार की सत्ता का सम्राट कौन?
सवाल उठता है कि नीतीश के बाद बिहार की सत्ता किसके हाथों में होगी? भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री पद के लिए उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, उप मुख्यमंत्री विजय सिन्हा, केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय, विधायक संजीव चौरसिया, मंत्री श्रेयसी सिंह, पूर्व उप मुख्यमंत्री तारकेश्वर प्रसाद समेत कई नाम चर्चा में हैं। लेकिन जानकार सूत्र सम्राट चौधरी को दौड़ में सबसे आगे बता रहे हैं। इसका कारण यह कि सम्राट के पिता शकुनि चौधरी, नीतीश कुमार के साथ समता पार्टी के संस्थापकों में शामिल थे। शकुनि की सलाह पर ही नीतीश ने ‘लव-कुश’ (कुर्मी-कुशवाहा) समीकरण बनाया था। इसमें ‘लव’ की तरफदारी नीतीश तो ‘कुश’ की शकुनि किया करते थे। यही कारण है कि नीतीश अपनी समृद्धि यात्रा में सम्राट को साथ लेकर घूम रहे हैं। साथ ही जनता को बता भी रहे हैं कि आगे के काम अब सम्राट करेंगे।
बीते दिनों हुए राज्यसभा के चुनाव में भी एनडीए की गोलबंदी और विपक्ष के वोट में सेंधमारी की कमान सम्राट चौधरी के हाथों में ही थी। यहां भी सम्राट कसौटी पर खरे उतरे। उन्होंने कांग्रेस के तीन और राष्ट्रीय जनता दल के एक विधायक को मतदान से अनुपस्थित कराकर एनडीए के सभी उम्मीदवारों की जीत आसान कर दी। लेकिन चौंकाने में भाजपा भी किसी से कम नहीं है। हरियाणा में मनोहरलाल खट्टर हों या नायबसिंह सैनी, मध्यप्रदेश के मोहन यादव हों, छत्तीसगढ़ के विष्णु देव साय हों, दिल्ली की रेखा गुप्ता हों या राजस्थान के भजनलाल शर्मा अथवा असम में हिमंता विश्वशर्मा स्काईलैब की तरह अचानक अपने राज्य की सियासत के सिरमौर बन गए और दिग्गज ताकते रह गए। अगर, बिहार में भी भाजपा वही चाल दोहरा दे तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
बिहार की चाल से पांच राज्यों में बढ़त में भाजपा
बिहार में सरकार और राज्यसभा चुनावों में एनडीए की एकतरफा जीत से भाजपा को पांच राज्यों पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुद्दुचेरी के होने वाले चुनावों में बढ़त मिलने की संभावना है, क्योंकि उसके कार्यकर्ता उत्साह में हैं।
क्यों चूक गए नीतीश!
नीतीश चाहते तो देश में सर्वाधिक दिन तक मुख्यमंत्री बनने का रिकॉर्ड अपने नाम कर सकते थे। लेकिन इस उपलब्धि से चूक क्यों गए? इसका जवाब तो नीतीश ही दे सकते हैं। फिलहाल, देश में सबसे अधिक दिनों 24 वर्ष 166 दिन मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड सिक्किम के पवन कुमार चामलिंग के नाम है। नवीन पटनायक (ओडिशा) 24 वर्ष 94 दिन, ज्योति बसु (पश्चिम बंगाल) 23 वर्ष 137 दिन, गेगोंग अपांग (अरुणाचल प्रदेश) 22 वर्ष 250 दिन, ललथनहवला (मिजोरम) 22 वर्ष 60 दिन, वीरभद्र सिंह (हिमाचल प्रदेश) 21 वर्ष 13 दिन, और माणिक सरकार (त्रिपुरा) 19 वर्ष 363 दिनों तक मुख्यमंत्री रहे। नीतीश का नंबर आठवें पायदान पर आता है।






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