आखिर क्या आशिकी है दुनिया को भारत से?
जी-7 सम्मेलन में डोनाल्ड ट्रम्प ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की खुलकर प्रशंसा की और भारत को अमेरिका का सच्चा मित्र बताया। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में प्रशंसा के पीछे अक्सर बड़े रणनीतिक और आर्थिक...

जी-7 में मोदी-ट्रम्प मुलाकात के पीछे क्या हैं असली मायने?
डोनाल्ड ट्रम्प जैसे नेता यूं ही किसी की तारीफ नहीं करते। वे अनुभवी कारोबारी भी हैं और दुनिया के सबसे प्रभावशाली राजनीतिज्ञों में भी गिने जाते हैं। इसलिए जब उन्होंने जी-7 सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मजबूत, शांत और प्रभावी वार्ताकार बताते हुए भारत को अमेरिका का मित्र कहा, तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि इस प्रशंसा के पीछे केवल मित्रता है या कोई बड़ा रणनीतिक संदेश भी छिपा है।
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वैसे केवल अमेरिका ही नहीं, आज दुनिया की अधिकांश बड़ी शक्तियां भारत के साथ अपने संबंधों को मजबूत बनाए रखना चाहती हैं। इसकी वजह भावनात्मक नहीं, बल्कि भारत की बढ़ती आर्थिक ताकत, विशाल उपभोक्ता बाजार, कुशल मानव संसाधन और वैश्विक राजनीति में बढ़ती भूमिका है। यही बदलती वास्तविकता आज भारत को विश्व राजनीति और अर्थव्यवस्था के केंद्र में ला खड़ा कर रही है।
फ्रांस के एवियन में आयोजित जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान मोदी और ट्रम्प की मुलाकात ने वैश्विक राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी। करीब 16 महीने बाद आमने-सामने आए दोनों नेताओं के बीच दिखाई दी गर्मजोशी ने इस चर्चा को और तेज कर दिया। ट्रम्प ने मोदी को मजबूत, शांत और प्रभावी वार्ताकार बताया तथा भारत की सुरक्षा को लेकर समर्थन का संकेत भी दिया। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शब्दों से अधिक महत्व उनके पीछे छिपे हितों का होता है। यही कारण है कि इस मुलाकात को केवल व्यक्तिगत समीकरणों के दायरे में नहीं देखा जा सकता।
वैश्विक अर्थव्यवस्था का प्रमुख केन्द्र
दरअसल आज का भारत विश्व की महत्वपूर्ण आर्थिक शक्तियों में शामिल है। 140 करोड़ से अधिक आबादी और विशाल उपभोक्ता बाजार उसे वैश्विक अर्थव्यवस्था का प्रमुख केंद्र बना रहे हैं। अमेरिका, यूरोप, जापान, दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित देश भारत के साथ अपने आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को मजबूत बनाए रखना चाहते हैं। इसके पीछे केवल कूटनीतिक कारण नहीं, बल्कि स्पष्ट आर्थिक हित भी जुड़े हैं।
भारत केवल एक बड़ा बाजार ही नहीं है, बल्कि दुनिया के सबसे बड़े प्रतिभा केंद्रों में भी शामिल है। सूचना प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग, स्वास्थ्य सेवाओं और शोध के क्षेत्र में भारतीय पेशेवरों की भूमिका लगातार बढ़ रही है। ट्रम्प द्वारा भारतीय प्रतिभा और एच-1बी वीजा को लेकर दिए गए सकारात्मक संकेत भी इसी वास्तविकता की ओर इशारा करते हैं। यह स्वीकारोक्ति है कि आने वाले समय में वैश्विक अर्थव्यवस्था और तकनीकी विकास में भारतीय मानव संसाधन की भूमिका और बढ़ने वाली है।
भारत के बढ़ते महत्व को समझने के लिए चीन का उदाहरण भी पर्याप्त है। सीमा विवाद और राजनीतिक तनाव के बावजूद भारत चीन के लिए एक महत्वपूर्ण बाजार बना हुआ है। यही स्थिति दुनिया की अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की भी है। वे भारत को केवल एक साझेदार नहीं, बल्कि भविष्य की आर्थिक वृद्धि के प्रमुख केंद्र के रूप में देख रही हैं।
मायने रखती है मोदी की सक्रियता
जी-7 सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी की सक्रियता भी उल्लेखनीय रही। उन्होंने अमेरिका सहित कई देशों के नेताओं से मुलाकात की और विभिन्न वैश्विक मुद्दों पर भारत का पक्ष रखा। विशेष रूप से पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े समुद्री व्यापार तथा भारतीय नाविकों की सुरक्षा का मुद्दा उठाना यह दर्शाता है कि भारत अब वैश्विक मंचों पर अपने आर्थिक और मानवीय हितों को अधिक मजबूती से रख रहा है।
वैश्विक मंचों पर भारत की बढ़ती स्वीकार्यता भी इस सम्मेलन में साफ दिखाई दी। जी-20 की सफल अध्यक्षता के बाद भारत की अंतरराष्ट्रीय साख और मजबूत हुई है। यही कारण है कि अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, जापान और यहां तक कि चीन भी भारत के साथ संबंधों को मजबूत बनाए रखना चाहते हैं। दुनिया समझ चुकी है कि 21वीं सदी की बड़ी आर्थिक और रणनीतिक पहेलियों का समाधान भारत को साथ लिए बिना संभव नहीं होगा।
भारत व अमेरिका के मीडिया की राय
इस पूरे घटनाक्रम का एक रोचक पहलू भारतीय और अमेरिकी मीडिया की प्रस्तुति में भी दिखाई देता है। भारतीय मीडिया के बड़े हिस्से ने ट्रम्प की प्रशंसा, सुरक्षा संबंधी आश्वासनों और दोनों नेताओं की मित्रता को प्रमुखता दी। वहीं एपी और रॉयटर्स जैसी अमेरिकी समाचार एजेंसियों की रिपोर्टों में व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री हितों और रणनीतिक सहयोग जैसे मुद्दों पर अधिक जोर दिखाई दिया। यह अंतर बताता है कि जहां भारत में इस मुलाकात को प्रतिष्ठा और प्रभाव के नजरिए से देखा गया, वहीं अमेरिका में इसे राष्ट्रीय हितों और व्यावहारिक परिणामों के संदर्भ में समझा गया।
इस संदर्भ में यह भी ध्यान देने योग्य है कि भारत-पाकिस्तान तनाव के दौरान ट्रम्प ने कई बार दावा किया था कि अमेरिका ने दोनों देशों के बीच तनाव कम कराने में भूमिका निभाई थी। भारत सरकार ने इस दावे की कभी स्पष्ट पुष्टि नहीं की। इसलिए उनके हालिया बयानों और आश्वासनों को भी उसी सावधानी से देखने की आवश्यकता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय राजनीति के अन्य दावों को परखा जाता है।
वास्तविकता यह है कि अमेरिका भारत को इसलिए महत्व देता है क्योंकि भारत उसके लिए रणनीतिक, आर्थिक और भू-राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। वहीं भारत भी अमेरिका के साथ संबंध इसलिए मजबूत रखना चाहता है क्योंकि इससे उसे तकनीक, निवेश, रक्षा सहयोग और वैश्विक मंचों पर प्रभाव बढ़ाने में सहायता मिलती है। दोनों देशों के रिश्तों की असली नींव भावनाओं से अधिक साझा हितों पर टिकी हुई है।
जी-7 में दिखाई दी मोदी-ट्रम्प की गर्मजोशी का सबसे बड़ा संदेश यही है कि आज विश्व की प्रमुख शक्तियां भारत को नजरअंदाज करने की स्थिति में नहीं हैं। भारत अब केवल एक उभरती अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति, व्यापार और रणनीतिक संतुलन का एक अनिवार्य केंद्र बन चुका है। कूटनीति की भाषा भले मित्रता की हो, लेकिन उसके पीछे काम कर रहे सूत्र भारत की बढ़ती शक्ति और वैश्विक आवश्यकता की कहानी कहते हैं।





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