राष्ट्रीय हित सर्वोपरि: माता-पिता की गंभीर बीमारी भी एयरफोर्स अधिकारी का ट्रांसफर नहीं रोक सकती
राजस्थान हाईकोर्ट ने रिपोर्टेबल जजमेंट में कहा- सशस्त्र बलों की ऑपरेशनल जरूरतों के आगे व्यक्तिगत असुविधा नहीं बन सकती कानूनी आधार जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और रिपोर्टेबल फैसले में...

राजस्थान हाईकोर्ट ने रिपोर्टेबल जजमेंट में कहा- सशस्त्र बलों की ऑपरेशनल जरूरतों के आगे व्यक्तिगत असुविधा नहीं बन सकती कानूनी आधार
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और रिपोर्टेबल फैसले में कहा है कि सशस्त्र बलों के अधिकारियों की पोस्टिंग और ट्रांसफर से जुड़े मामलों में राष्ट्रीय हित, रणनीतिक तैनाती और ऑपरेशनल आवश्यकताओं को व्यक्तिगत कठिनाइयों पर प्राथमिकता दी जानी चाहिए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल मानवीय या सहानुभूतिपूर्ण आधार पर ट्रांसफर आदेशों में न्यायिक हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।
Table Of Content
डिवीजन बेंच ने भारतीय वायुसेना के स्क्वाड्रन लीडर दीपक सिंधु के ट्रांसफर मामले में केंद्र सरकार और वायुसेना की अपील स्वीकार करते हुए सिंगल बेंच के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें ट्रांसफर आदेश को निरस्त किया गया था। साथ ही अधिकारी की याचिका भी खारिज कर दी गई।
जोधपुर से तेजपुर कर दिया था तबादला
स्क्वाड्रन लीडर दीपक सिंधु एयरफोर्स स्टेशन जोधपुर में लीगल ऑफिसर के रूप में कार्यरत थे। फरवरी 2026 में उनका तबादला जोधपुर से असम के तेजपुर एयरफोर्स स्टेशन कर दिया गया था। अधिकारी ने इस आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।
याचिका में कहा गया कि उनके पिता किडनी कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं और उनकी एक किडनी निकाली जा चुकी है। वहीं उनकी मां 50 प्रतिशत बर्न इंजरी सर्वाइवर हैं और उन्हें लगातार देखभाल की जरूरत है। अधिकारी ने स्वयं को माता-पिता की एकमात्र संतान बताते हुए ट्रांसफर रद्द करने की मांग की थी।
सिंगल बेंच ने दी थी राहत
सिंगल बेंच ने मार्च 2026 में अधिकारी की याचिका स्वीकार करते हुए ट्रांसफर आदेश रद्द कर दिया था। इसके खिलाफ केंद्र सरकार और वायुसेना ने डिवीजन बेंच में विशेष अपील दायर की।
हाईकोर्ट ने क्या कहा
डिवीजन बेंच ने माना कि अधिकारी के माता-पिता की स्वास्थ्य संबंधी परिस्थितियां सहानुभूति और मानवीय दृष्टिकोण से विचार योग्य हैं, लेकिन केवल इन्हीं आधारों पर ट्रांसफर आदेश को अवैध नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड से यह भी स्पष्ट नहीं होता कि माता-पिता पूरी तरह अधिकारी पर ही निर्भर थे या उनकी निरंतर शारीरिक उपस्थिति अनिवार्य थी।
कोर्ट ने कहा कि यदि हर व्यक्तिगत या चिकित्सीय कठिनाई के आधार पर ट्रांसफर में छूट दी जाने लगे तो इससे सशस्त्र बलों की कार्यक्षमता, अनुशासन और ऑपरेशनल तैयारी प्रभावित हो सकती है।
पोस्टिंग पॉलिसी कानूनी अधिकार नहीं
फैसले में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एयरफोर्स की पोस्टिंग पॉलिसी केवल प्रशासनिक दिशानिर्देश है, कोई वैधानिक कानून नहीं। इसलिए कोई अधिकारी यह दावा नहीं कर सकता कि उसे किसी विशेष स्टेशन पर निर्धारित अवधि तक बने रहने का कानूनी अधिकार प्राप्त है।
अदालत ने कहा कि पोस्टिंग पॉलिसी में सामान्य कार्यकाल दो से चार वर्ष बताया गया है, लेकिन उसी नीति में यह भी प्रावधान है कि ऑपरेशनल और प्रशासनिक जरूरतों के कारण इस अवधि को घटाया या बढ़ाया जा सकता है।






No Comment! Be the first one.