सुरों की मल्लिका आशा भोंसले की विदाई के बाद उनके संगीत की गूंज पर एक नजर
सुधांशु टाक,
समीक्षक, लेखक
सुरों की मल्लिका आशा भोंसले अब भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज आज भी उतनी ही जीवंत है। उनका जाना भारतीय संगीत के एक स्वर्णिम दौर का विराम है, जिसकी गूंज हर पीढ़ी में सुनाई देती रहेगी। उनके निधन ने संगीत जगत में एक ऐसी रिक्तता छोड़ दी है, जिसे भर पाना आसान नहीं है।
आशा के व्यक्तित्व को अगर किसी ने सही मायनों में समझा और जीवन भर उनका साथ निभाया तो वह था उनका अपना दुःख। बचपन में पिता का साया उठ जाना, दस वर्ष की आयु में परिवार का सहारा बनने की जिम्मेदारी, कम उम्र में विवाह और उसके बाद वैवाहिक जीवन की कठिनाइयां, इन सबने उनके जीवन को लगातार परखा। पति का असहयोग, आर्थिक दबाव, गर्भावस्था में घर से निकाला जाना और दो बच्चों की जिम्मेदारी, इन परिस्थितियों में भी उन्होंने हार नहीं मानी। फिल्म जगत में जगह बनाने के लिए उन्हें संघर्ष करना पड़ा और कई बार उपेक्षा का सामना भी करना पड़ा।
इसके बाद भी जीवन ने उन्हें और परखा। राहुल देव बर्मन से विवाह, उनका कठिन पेशेवर दौर और असमय निधन। बेटी वर्षा और बेटे हेमंत का खोना, ये आघात किसी भी व्यक्ति को तोड़ सकते थे। लेकिन आशा ने हर बार खुद को संभाला और आगे बढ़ीं। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि संघर्ष चाहे जितना गहरा हो, संकल्प उससे बड़ा हो सकता है।
आशा भोंसले ने संगीत को कभी किसी एक शैली या सीमा में नहीं बांधा। उनके स्वर में अद्भुत लचीलापन था, जो हर भाव और परिस्थिति के अनुरूप ढल जाता था। ‘पिया तू अब तो आजा’ में उनकी आवाज चंचल और आकर्षक लगती है, तो ‘इन आंखों की मस्ती’ में वही स्वर शास्त्रीय गरिमा और नफासत से भर उठता है। ‘दम मारो दम’ में उनका स्वर एक नई पीढ़ी की बेबाक अभिव्यक्ति बन जाता है। यही बहुआयामी प्रतिभा उन्हें विशिष्ट बनाती है और उन्हें शीर्ष पर स्थापित करती है।
जीवन के कुछ अनकहे पड़ाव
– संगीतकार हंसराज बहल उनके जीवन के महत्वपूर्ण स्तंभ रहे। वर्ष 1948 की फिल्म ‘चुनरिया’ में उन्हें एक पंक्ति गाने का अवसर मिला। उस समय स्थापित गायिकाओं के बीच यह मौका उनके लिए बहुत बड़ा था। इसी शुरुआत ने उनके भीतर आत्मविश्वास जगाया और वे इसे जीवन भर याद करती रहीं।
– संगीत के साथ-साथ उन्हें पाक कला का भी शौक था। उन्होंने रेस्टोरेंट शृंखला में निवेश किया और कई बार स्वयं भी खाना बनाया। उनका नाम गिनीज बुक में दर्ज हुआ और मैडम तुसाद संग्रहालय में उनका मोम प्रतिरूप स्थापित हुआ। पद्म विभूषण और दादासाहेब फाल्के पुरस्कार सहित अनेक सम्मान उनके खाते में जुड़े।
– संगीतकार ओ.पी. नैयर के साथ उनकी जोड़ी ने उन्हें नई पहचान दी। इस सहयोग ने उनकी चंचल और लयात्मक शैली को लोकप्रियता के शिखर तक पहुंचाया और उन्हें मुख्यधारा में स्थापित किया।
– खय्याम के साथ उनकी गायकी ने एक अलग रूप लिया। ‘उमराव जान’ के गीतों में उनका स्वर बेहद नियंत्रित और शास्त्रीय संवेदना से परिपूर्ण दिखाई देता है, जिसने उनकी कलात्मक परिपक्वता को नई ऊंचाई दी।
– पंचम दा यानी राहुल देव बर्मन के साथ उनकी साझेदारी हिंदी फिल्म संगीत में प्रयोग और आधुनिकता का प्रतीक बनी। इस जोड़ी ने ऐसे गीत दिए जो आज भी श्रोताओं के मन में बसे हुए हैं और समय के साथ उनकी लोकप्रियता और बढ़ी है।
– जीवन भर उन्हें अनेक सम्मान मिले। पद्म विभूषण, दादासाहेब फाल्के पुरस्कार, फिल्मफेयर और राष्ट्रीय पुरस्कार, ये सभी उनकी उपलब्धियों के प्रमाण हैं। वे स्वयं मानती थीं कि सबसे बड़ा सम्मान श्रोताओं का प्रेम है, जो उन्हें लगातार मिलता रहा।
आशा भोंसले केवल एक नाम नहीं, बल्कि एक ऐसा स्वर हैं जो समय के साथ और भी गूंजता रहेगा। उनका जाना एक क्षति है, लेकिन उनकी आवाज वह धरोहर है, जो पीढ़ियों तक जीवित रहेगी।







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