काले सोने का नया भारत : रेत से उठती ऊर्जा क्रांति
ये शायद दो हजार के दशक की शुरुआत के दिन थे। जोधपुर कलक्ट्री में एक बड़े अधिकारी के पास फैक्स से एक संदेश आता है। तकनीकी भाषा देखकर पहले तो उनके चेहरे पर उलझन उभरती है, लेकिन कुछ ही क्षणों बाद वही चेहरा ऐसी चमक से भर उठता है जैसे रेगिस्तान में अचानक कोई मीठा कुआं फूट पड़ा हो।
Table Of Content
- काले सोने का नया भारत : रेत से उठती ऊर्जा क्रांति
- जब पहली बार देश को पता चला
- राष्ट्रीय ऊर्जा मानचित्र पर उभरा रेगिस्तान
- पाइपलाइन, राजनीति और लंबा इंतजार
- पचपदरा : रेगिस्तान में उग रहा है औद्योगिक शहर
- भारत का नया ‘एनर्जी कॉरिडोर’ बनेगा पश्चिमी राजस्थान?
- रोजगार, निवेश और बदलती सामाजिक संरचना
- कुबेर का खजाना
- चमक जाएगी किस्मत
- विकास की चमक और पर्यावरण की छाया
- जब दुनिया ग्रीन एनर्जी की ओर बढ़ रही है…
- रेगिस्तान की नई इबारत
मैंने सहज जिज्ञासा में पूछा, ‘कोई बड़ी खबर है क्या?’ वे पहले थोड़ी देर चुप रहे। फिर मुस्कराते हुए फैक्स का पन्ना मेरी ओर सरका दिया। उस अंग्रेज़ी तकनीकी भाषा में दो शब्द साफ पढ़े जा सकते थे, बाड़मेर बेसिन और हाइड्रोकार्बन। इतना समझना काफी था कि मामला साधारण नहीं है। कुछ देर बाद वे अपने चैम्बर से बाहर आए और लगभग फुसफुसाते हुए बोले, ‘बधाई हो… अब बाड़मेर काले पानी की सजा वाला इलाका नहीं रहेगा। कुछ साल बाद देखना, यह पूरा इलाका दुबई या शारजाह जैसा दिखाई देगा। बहुत बड़ा तेल भंडार मिला है वहां।’
उस वक्त शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि थार की रेत के नीचे दबा यह ‘काला सोना’ आने वाले वर्षों में केवल राजस्थान ही नहीं, बल्कि भारत के औद्योगिक और ऊर्जा भूगोल को बदलने वाली सबसे बड़ी कहानियों में बदल जाएगा।
जब पहली बार देश को पता चला
पत्रकारिता में खबर केवल सूचना नहीं होती, उसके पीछे प्रमाण और विवरण भी चाहिए होते हैं। लेकिन वह संदेश गोपनीय था। अधिकारी ने मित्रतावश उसे दिखाया जरूर, मगर शर्त यही थी कि स्रोत का नाम कभी बाहर नहीं आएगा। सौभाग्य से उन्हीं दिनों कलक्ट्री में एक भू-वैज्ञानिक अधिकारी से अच्छा परिचय था। मैंने हाथ से लिखे नोट्स उनके सामने रख दिए। वे तकनीकी बातें समझाते गए और मैं तेजी से डायरी में लिखता गया। धीरे-धीरे तस्वीर साफ होती गई कि यह देश की सबसे बड़ी तेल खोजों में से एक थी।
अगले दिन अखबार के पहले पन्ने पर मोटे शीर्षक के साथ खबर छपी, ‘बाड़मेर में मिला अथाह तेल भंडार’ और उसी दिन देश ने पहली बार महसूस किया कि सीमा से लगा यह वीरान जिला अब सिर्फ युद्ध, सूखा और पलायन की पहचान नहीं रहेगा।
राष्ट्रीय ऊर्जा मानचित्र पर उभरा रेगिस्तान
वर्ष 2004-05 का दौर। विख्यात अर्थशास्त्री डॉ. मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री थे। बाड़मेर में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने तेल कुओं का नामकरण मंगला और भाग्यम किया। उस समय राष्ट्रीय मीडिया में एक पंक्ति बार-बार लिखी जा रही थी, ‘बाड़मेर जल्दी ही भारत का दुबई बन सकता है।’ लेकिन भारत में सपनों और परियोजनाओं के बीच राजनीति, नौकरशाही और वित्तीय फाइलों का लंबा रेगिस्तान भी होता है।
फिर वह दृश्य भी आया जब एक ही परियोजना का शिलान्यास दो अलग-अलग राजनीतिक युगों में दो बार हुआ। पहले सोनिया गांधी ने और बाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने। यह भारतीय लोकतंत्र का एक दिलचस्प सत्य भी है कि परियोजनाएं सरकारों से लंबी उम्र पाती हैं, लेकिन श्रेय की राजनीति हर दौर में नई हो जाती है।
पाइपलाइन, राजनीति और लंबा इंतजार
बाड़मेर से निकलने वाला कच्चा तेल केवल ऊर्जा की कहानी नहीं था, वह तकनीक और धैर्य की कहानी भी था। लगभग दो दशक तक यह तेल पाइपलाइन के जरिए गुजरात के सलाया तक पहुंचता रहा। लेकिन यह कोई साधारण पाइपलाइन नहीं थी।
थार से निकलने वाला यह कच्चा तेल अत्यधिक गाढ़ा और मोम जैसा है, जिसे सामान्य तापमान पर बहाना आसान नहीं। इसलिए पाइपलाइन में विशेष हीटिंग तकनीक का इस्तेमाल किया गया, ताकि निश्चित तापमान बनाए रखते हुए तेल को लगातार प्रवाह में रखा जा सके। उस समय यह तकनीक राजस्थान ही नहीं, देश के ऊर्जा क्षेत्र के लिए भी किसी अजूबे से कम नहीं मानी गई।
देश-विदेश से विशेषज्ञ इस पाइपलाइन को देखने आते रहे। रेगिस्तान के नीचे बिछी यह गर्म पाइपलाइन अपने आप में आधुनिक भारत की इंजीनियरिंग क्षमता का प्रतीक बन गई। ब्रिटेन की कम्पनी केयर्न एनर्जी ने यहां तेल उत्पादन शुरू किया और उत्पादन का आंकड़ा एक समय 1.60 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया। इस कम्पनी को बाद में वेदांता लिमिटेड ने अधिग्रहित किया। लेकिन, विडंबना यह रही कि जिस राजस्थान की धरती से तेल निकल रहा था, उसी राजस्थान में रिफाइनरी की फाइलें वर्षों तक सरकारी दफ्तरों में धूल फांकती रहीं।
कांग्रेस सरकार ने इसकी रूपरेखा तैयार की, लेकिन सत्ता बदलते ही परियोजना वित्तीय व्यवहार्यता के सवालों में उलझ गई। फिर सरकार बदली तो फाइल दोबारा आगे बढ़ी। केंद्र की तत्कालीन यूपीए सरकार ने हिंदुस्तान पेट्रोलियम और राजस्थान सरकार के संयुक्त उपक्रम को मंजूरी दी। लेकिन इसके बाद भी परियोजना कभी लीलाणा और कभी पचपदरा के बीच अटकती रही। आखिरकार पचपदरा के नाम पर सहमति बनी।
पचपदरा : रेगिस्तान में उग रहा है औद्योगिक शहर
लंबे समय तक धीमी गति से चलने वाली परियोजना ने पिछले दो वर्षों में अचानक रफ्तार पकड़ी। आज पचपदरा की तरफ जाते हुए रेगिस्तान के बीच उठते विशाल स्टील स्ट्रक्चर, क्रूड प्रोसेसिंग यूनिट्स और पाइपलाइनों का जाल यह अहसास कराता है कि पश्चिमी राजस्थान का भूगोल बदल रहा है। करीब 79 हजार करोड़ रुपए लागत वाली यह 9 एमएमटीपीए क्षमता की एकीकृत रिफाइनरी केवल ईंधन उत्पादन केंद्र नहीं है। इसके साथ विकसित हो रहा पेट्रो-केमिकल कॉम्पलेक्स भारत के सबसे बड़े औद्योगिक क्लस्टरों में से एक बन सकता है।
यहां पेट्रोल और डीजल के साथ पॉलीप्रोपाइलीन, पॉलीएथिलीन, बेंजीन और ब्यूटाडाइन जैसे पेट्रो-केमिकल उत्पाद तैयार होंगे। विशेषज्ञों का अनुमान है कि इसके बाद पश्चिमी राजस्थान में प्लास्टिक, पैकेजिंग, फाइबर, पेंट, फार्मा और केमिकल उद्योगों की नई शृंखला विकसित हो सकती है। यदि ऐसा हुआ तो बाड़मेर से जोधपुर तक का इलाका केवल तेल उत्पादक क्षेत्र नहीं रहेगा, बल्कि भारत के नए औद्योगिक गलियारे के रूप में उभर सकता है।
भारत का नया ‘एनर्जी कॉरिडोर’ बनेगा पश्चिमी राजस्थान?
यह कहानी सिर्फ एक रिफाइनरी की नहीं है। यह उस भू-भाग की कहानी है, जिसे दशकों तक केवल सीमा सुरक्षा, सूखा राहत और पलायन के संदर्भ में देखा गया। आज वही इलाका तेल उत्पादन कर रहा है, देश की सबसे बड़ी सोलर परियोजनाओं का केंद्र बन रहा है, ग्रीन हाइड्रोजन निवेश आकर्षित कर रहा है और अब पेट्रो-केमिकल हब बनने की ओर बढ़ रहा है।
यानी पश्चिमी राजस्थान धीरे-धीरे भारत के नए एनर्जी कॉरिडोर में बदलता दिखाई दे रहा है। यह बदलाव केवल आर्थिक नहीं, भू-राजनीतिक भी है। जिस इलाके को कभी सामरिक बफर माना जाता था, वही अब भारत की ऊर्जा सुरक्षा का प्रमुख स्तंभ बन सकता है।
रोजगार, निवेश और बदलती सामाजिक संरचना
रिफाइनरी परियोजना के निर्माण चरण में ही लगभग 35 हजार लोगों को रोजगार मिला। करीब एक लाख लोग अप्रत्यक्ष रूप से इससे जुड़े। पचपदरा, बालोतरा, बाड़मेर और जोधपुर जैसे शहरों में जमीनों के दाम, किराए, ट्रांसपोर्ट कारोबार और सेवा क्षेत्र की गतिविधियां तेजी से बढ़ी हैं। लेकिन, इसके साथ एक नया सामाजिक परिवर्तन भी दिखाई देने लगा है कि ग्रामीण इलाकों में पहली बार बड़े पैमाने पर तकनीकी और औद्योगिक नौकरियों की चर्चा हो रही है।
एक बड़ा प्रश्न फिर भी बाकी है, क्या स्थानीय युवाओं को इस नई अर्थव्यवस्था में पर्याप्त हिस्सेदारी मिलेगी, या यह विकास बाहर से आने वाली तकनीकी आबादी के हाथों केंद्रित हो जाएगा?
कुबेर का खजाना
हाइड्रोकार्बन इंडस्ट्री से जुड़े एक बड़े अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि आर्थिक रूप से यह रिफाइनरी राजस्थान के लिए तो गेम चैंजर साबित होने वाली है। इसके पूरी रफ्तार से काम में आने के बाद देश के पेट्रो आयात बिल में लगभग 26 हजार करोड़ रुपए की कमी आ सकती है। केंद्र और राज्य सरकार को लगभग 21 हजार करोड़ रुपए के राजस्व का अनुमान है। इसमें राजस्थान का हिस्सा करीब चार हजार करोड़ रुपए होगा। वैट, ट्रांसपोर्टेशन, सर्विस टैक्स और स्थापित होने वाली सहायक इकाइयों से मिलने वाली कर आय अलग है।
चमक जाएगी किस्मत
राजस्थान में यह बड़ी रिफाइनरी सिर्फ आर्थिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि यह कभी बीमारू कहे जाने वाले राज्य को आर्थिक रूप से सक्षम राज्य की दिशा में ले जाने वाला कदम साबित होने वाली है। इससे स्थानीय जीवन स्तर में उछाल तो आना ही है, साथ ही यह एक बहुआयामी औद्योगिक विकास इंजन के रूप में भी देखी जानी चाहिए। क्योंकि इससे आने वाले वर्षों में पश्चिमी राजस्थान की शहरी और आर्थिक सूरत बदली हुई नजर आएगी। विशेषज्ञ कहते हैं कि कौशल विकास पर निवेश और एमएसएमई इको सिस्टम को मजबूत करने के साथ यह रिफाइनरी राजस्थान को रेगिस्तान की दुर्गम स्थितियों से निकालकर इंडस्ट्रियल हब के रूप में प्रतिष्ठापित करने में सक्षम हो सकती है।
पेट्रो केमिकल कॉम्पलेक्स क्लस्टर बनने से पांच सौ से अधिक उद्योगों के लिए कच्चा माल उपलब्ध होने लगेगा। इससे प्लास्टिक, फाइबर, पेंट, केमिकल, पैकेजिंग और फार्मा जैसे क्षेत्रों में निवेश का नया रास्ता राजस्थान के लिए खुलेगा। साथ ही सड़क, रेल, आवास, होटल, ट्रांसपोर्ट और तकनीकी सेवाओं के लिए भी अवसर बढ़ने से शहरीकरण तेजी से होगा और यह पिछड़ा कहा जाने वाला रेगिस्तानी इलाका देश की व्यापारिक और औद्योगिक गतिविधियों के नए हब के रूप में सामने आएगा।
विकास की चमक और पर्यावरण की छाया
हर बड़ी औद्योगिक परियोजना अपने साथ कुछ असुविधाजनक प्रश्न भी लेकर आती है। पचपदरा रिफाइनरी भी इसका अपवाद नहीं है। रेगिस्तानी इलाके में भारी जल खपत वाली परियोजना भविष्य में जल संकट को कितना प्रभावित करेगी?
क्या पेट्रो-केमिकल विस्तार स्थानीय पर्यावरण और पारंपरिक पशुपालन पर दबाव डालेगा?
क्या थार की पारिस्थितिकी इस औद्योगिक विस्तार को संतुलित रख पाएगी?
ये वे सवाल हैं जिनका जवाब आने वाले वर्षों में ही मिलेगा।
जब दुनिया ग्रीन एनर्जी की ओर बढ़ रही है…
दिलचस्प विरोधाभास यह है कि जिस समय दुनिया जीवाश्म ईंधन से बाहर निकलने की तैयारी कर रही है, उसी समय राजस्थान पेट्रो-केमिकल युग में प्रवेश कर रहा है। हालांकि यही राजस्थान आज भारत का सबसे बड़ा सोलर और विंड एनर्जी हब भी बनता जा रहा है।
संभव है आने वाले वर्षों में पश्चिमी राजस्थान एक साथ दो विपरीत तस्वीरों का प्रतिनिधित्व करे, एक तरफ तेल और पेट्रो-केमिकल उद्योग, दूसरी तरफ सौर ऊर्जा और ग्रीन हाइड्रोजन। यानी थार केवल रेगिस्तान नहीं रहेगा, बल्कि भारत की ऊर्जा राजनीति का सबसे बड़ा प्रयोगशाला क्षेत्र बन सकता है।
रेगिस्तान की नई इबारत
कभी पश्चिमी राजस्थान का मतलब था वीरानी, पलायन, अकाल और सीमा का तनाव। अब वही इलाका ऊर्जा, उद्योग, निवेश और आधुनिक बुनियादी ढांचे की नई कहानी लिखता दिखाई दे रहा है। थार की रेत सदियों तक हवाओं के निशान संभालती रही। अब उसी रेत के नीचे दबा तेल राजस्थान ही नहीं, बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था की नई इबारत लिखने की तैयारी में है। लेकिन, अंतिम प्रश्न अभी भी बाकी है, क्या यह चमक केवल औद्योगिक टावरों तक सीमित रहेगी, या सचमुच रेगिस्तान के आखिरी गांव तक रोशनी पहुंचाएगी?







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