आरपीएससी: भर्ती का ‘ब्लैकहोल’
Table Of Content
- शीर्ष तक पहुंचती आंच: ‘करोड़ों’ की कुर्सी
- सिर्फ पेपर नहीं, पूरा सिस्टम ही फर्जी
- राजस्थान में पेपर लीक का ‘क्रॉनिक’ इतिहास
- राजनीतिक नूराकुश्ती: युवाओं के दर्द पर सिकती रोटियां
- नया ट्रेंड: ‘शैडो इन्वेस्टर्स’ और ‘पोस्ट-एग्जाम क्लीनअप’
- मरहम-पट्टी नहीं, गहरी ‘सर्जरी’ की जरूरत
- अपनाया जाए अन्य राज्यों का सख्त मॉडल
- युवाओं का दर्द
रमेश शर्मा,
वरिष्ठ पत्रकार
सरकारी नौकरी सिर्फ एक रोज़गार नहीं, बल्कि परिवार की सामाजिक सुरक्षा और सम्मान का दस्तावेज़ है। लेकिन आज राजस्थान लोक सेवा आयोग (आरपीएससी) जैसी संवैधानिक और प्रतिष्ठित संस्था एक ऐसे ‘ब्लैकहोल’ में तब्दील हो चुकी है, जहां प्रदेश के लाखों युवाओं का भविष्य, उनकी दिन-रात की मेहनत और खून-पसीने की गाढ़ी कमाई तंत्र की मिलीभगत के अंधेरे कुएं में स्वाहा हो रही है।
हाल ही में राष्ट्रीय स्तर पर गूंजे नीट पेपर लीक कांड और खुद आरपीएससी के भीतर से रिसकर आ रहे सच ने यह साफ कर दिया है कि पेपर लीक और भर्ती घोटालों की जड़ें सिर्फ बाहर बैठे अंडरवर्ल्ड या क्रिमिनल सिंडिकेट तक ही सीमित नहीं हैं। असल दीमक तो सिस्टम की ‘तिजोरी’ के भीतर ही कुंडली मारकर बैठे हैं, जो रिकॉर्ड रूम में घुसकर खुलेआम सबूतों का सौदा कर रहे हैं।
कल्पना कीजिए, जिस रिकॉर्ड रूम को आरपीएससी की शुचिता का ‘गर्भगृह’ होना चाहिए, जहां कड़े डिजिटल प्रोटोकॉल और ‘टू-पर्सन रूल’ (दो व्यक्तियों की अनिवार्य मौजूदगी) लागू होने चाहिए थे, वहां एक मामूली क्लर्क आराम से घुसता है और मेरिट की धज्जियां उड़ा देता है। एसओजी के हत्थे चढ़ा आयोग का यूडीसी मानसिंह मीणा इस संस्थागत पतन का जीता-जागता चेहरा है। मीणा ने स्कूल लेक्चरर भर्ती परीक्षा के एक अभ्यर्थी से सिर्फ 2 लाख रुपए की घूस लेकर रिकॉर्ड रूम में डमी कैंडिडेट की तस्वीरें और मूल दस्तावेज बदलने का दुस्साहस किया। सीसीटीवी फुटेज ने इस पूरे खेल का भंडाफोड़ किया। यह सिर्फ एक अदने से क्लर्क का व्यक्तिगत दुस्साहस नहीं था। एसओजी की पूछताछ में सामने आया है कि इस घिनौने खेल में आयोग के 7 से 9 अन्य आंतरिक कर्मचारी भी शामिल हैं। यानी आरपीएससी के भीतर ही एक समानांतर ‘इंटरनल सिंडिकेट’ सक्रिय था, जो सीधे तौर पर आधिकारिक रिकॉर्ड को दूषित कर “योग्य” और “अयोग्य” के बीच के अंतर को ही मिटा रहा था।
शीर्ष तक पहुंचती आंच: ‘करोड़ों’ की कुर्सी
भ्रष्टाचार की यह सरिता सिर्फ नीचे के पायदानों पर नहीं बह रही थी, इस धारा का असल उद्गम तो तंत्र के शीर्ष पर ही बैठा था। जांच की आंच जब आगे बढ़ी, तो आरपीएससी के सर्वोच्च पदों पर बैठे लोगों के चेहरे बेनकाब होने लगे। स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (एसओजी) ने पूर्व कार्यवाहक अध्यक्ष डॉ. शिवसिंह राठौड़ को हिरासत में लेकर 8 घंटे तक कड़ी पूछताछ की। यह कार्रवाई आयोग के ही निलंबित सदस्य बाबूलाल कटारा के उस कबूलनामे के बाद हुई, जिसने पूरे प्रदेश को सन्न कर दिया था। कटारा ने स्वीकार किया कि उसने कृषि विज्ञान भर्ती परीक्षा-2022 (कुल 54 पद) का प्रश्नपत्र 60 लाख रुपए की भारी-भरकम रकम में बेचा था। जब परीक्षा कराने वाली संस्था के जज और जूरी ही खुद ‘बिक्री’ के लिए बाजार में उपलब्ध हों, तो वहां मेरिट या निष्पक्षता की बात करना ही बेमानी है।
सिर्फ पेपर नहीं, पूरा सिस्टम ही फर्जी
एडीजी विशाल बंसल के नेतृत्व में एसओजी की जांच ने इस घोटाले का एक और डरावना और व्यापक आयाम उजागर किया है। यह खेल अब सिर्फ ‘पेपर लीक’ करने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसके पीछे दो तरह के बड़े संगठित नेटवर्क काम कर रहे हैं-
1. डमी अभ्यर्थियों का डिजिटल डेटाबेस: एसओजी के पास वर्तमान में 2000 से अधिक ऐसे डमी अभ्यर्थियों का डेटा मौजूद है, जो असली उम्मीदवारों की जगह परीक्षा में बैठे थे। अब तक 150 से अधिक जालसाजों को दबोचा जा चुका है।
2. बैक-डेट डिग्री का कॉरपोरेट धंधा: जांच में चुरू के एक निजी विश्वविद्यालय की संलिप्तता सामने आई है, जो मोटी रकम लेकर ‘बैक-डेट’ (पुरानी तारीखों) की फर्जी डिग्रियां बांट रहा था। यानी गणित सीधा है। अगर आप परीक्षा पास नहीं कर सकते, तो पैसे फेंकिए, सिस्टम आपके लिए फर्जी डिग्री भी तैयार रखेगा और रिकॉर्ड रूम में सांठगांठ कर फोटो भी बदल दी जाएगी।
राजस्थान में पेपर लीक का ‘क्रॉनिक’ इतिहास
2021 (REET लेवल-2): पेपर लीक के बाद परीक्षा रद्द, इतिहास में पहली बार किसी बड़ी परीक्षा को इस स्तर पर रद्द करना पड़ा।
2022 (कांस्टेबल भर्ती): मजबूत सुरक्षा के दावों के बीच पेपर लीक हुआ, एक शिफ्ट की परीक्षा दोबारा करानी पड़ी।
2022 (वरिष्ठ अध्यापक-जीके): परीक्षा से ठीक पहले उदयपुर में बस के भीतर पेपर हल करते हुए अभ्यर्थी पकड़े गए, परीक्षा रद्द।
2024 (सब-इंस्पेक्टर भर्ती-2021): एसओजी जांच में खुलासा कि थानेदारों की पूरी खेप ही डमी और पेपर लीक के दम पर भर्ती हो गई; आरपीएससी के पूर्व सदस्य कटारा के बाद अब शीर्ष नेतृत्व तक आंच।
राजनीतिक नूराकुश्ती: युवाओं के दर्द पर सिकती रोटियां
इस पूरे महाघोटाले पर राजस्थान की सियासत में आरोप-प्रत्यारोप का घिनौना दौर जारी है, लेकिन नैतिक जवाबदेही से दोनों प्रमुख दल चतुराई से बच रहे हैं। भाजपा प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ का सीधा हमला है कि पिछली गहलोत सरकार के कार्यकाल में 17 पेपर लीक हुए और आरपीएससी के चेयरमैन तक इसमें शामिल थे। दूसरी तरफ, पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अपने कार्यकाल की खामियों पर मौन साधकर मुद्दे को राष्ट्रीय फलक पर ले जा रहे हैं। वे केंद्र सरकार को घेरते हुए नीट पेपर लीक के मद्देनजर एनटीए को तत्काल भंग करने की मांग कर रहे हैं।
इस राजनीतिक फुटबॉल के बीच पिस रहा है वह आम छात्र, जिसके माता-पिता पेट काटकर, कर्ज लेकर जयपुर-अजमेर के कोचिंग सेंटरों की फीस और कमरों का किराया भरते हैं। बार-बार पेपर रद्द होने से छात्रों का मानसिक संतुलन और हौसला टूट रहा है, और हजारों युवा ओवर एज हो गए, यानी परीक्षा देने की अधिकतम आयु सीमा पार कर चुके हैं।
नया ट्रेंड: ‘शैडो इन्वेस्टर्स’ और ‘पोस्ट-एग्जाम क्लीनअप’
इस पूरे घटनाक्रम में जो सबसे खतरनाक और नया ट्रेंड उभर कर आता है, वह है भर्ती घोटालों का ‘कॉर्पोरेटाइजेशन’। अब यह काम कुछ स्थानीय सटोरियों या दलालों का नहीं रह गया है, बल्कि इसे एक सुनियोजित बिजनेस मॉडल की तरह चलाया जा रहा है:
1. शैडो इन्वेस्टर्स (सफेदपोश फाइनेंसर): सूत्रों के अनुसार, इन घोटालों के पीछे कुछ बड़े सफेदपोश ‘शैडो इन्वेस्टर्स’ हैं, जो कोचिंग सेंटरों, निजी विश्वविद्यालयों और भ्रष्ट नौकरशाहों के इस नापाक गठजोड़ को बकायदा ‘फंड’ करते हैं। ये लोग एडवांस में करोड़ों रुपए लगाकर पूरा पेपर या रिकॉर्ड रूम का एक्सेस ब्लॉक बुक करते हैं, और बाद में अभ्यर्थियों से मुनाफे के साथ इसकी ‘रिटेल वसूली’ करते हैं।
2. डिजिटल एविडेंस क्लीनिंग (सबूतों का डिजिटल सफाचट): मानसिंह मीणा का पकड़ा जाना यह साबित करता है कि माफिया अब केवल परीक्षा पास कराने तक नहीं रुकता, उनका एक विंग केवल ‘पोस्ट-एग्जाम क्लीनअप’ यानी परीक्षा के बाद सबूत मिटाने के लिए काम करता है। आरपीएससी के आईटी सेल और रिकॉर्ड रूम के भीतर बैठे लोगों को मोटी घूस देकर यह सुनिश्चित किया जाता है कि यदि भविष्य में आरटीआई या कोर्ट केस हो, तो भी मुख्य सर्वर और फाइलों से सबूत गायब मिलें। जानकारों के मुताबिक, यह सीधे तौर पर ‘स्टेट-स्पॉन्सर्ड साइबर क्राइम’ का मामला है जिसकी फॉरेंसिक जांच होनी चाहिए।
मरहम-पट्टी नहीं, गहरी ‘सर्जरी’ की जरूरत
आरपीएससी और राजस्थान के परीक्षा तंत्र को वेंटिलेटर से बाहर निकालने के लिए अब केवल कुछ क्लर्कों की गिरफ्तारियों या निलंबन जैसी ‘कॉस्मेटिक सर्जरी’ से काम नहीं चलेगा। इस सड़ चुके सिस्टम के आमूलचूल शुद्धिकरण की दरकार है। प्रशासनिक और तकनीकी एक्सपर्ट्स जितेन्द्र कुमार शर्मा और डॉ. विकास अग्रवाल के अनुसार, इसके लिए तत्काल तीन कड़े कदम उठाने होंगे:
1. अपरिवर्तनीय डिजिटल लॉग: आरपीएससी के रिकॉर्ड रूम और डेटा सर्वर को तुरंत ब्लॉकचेन जैसी उन्नत तकनीक से जोड़ा जाए। इससे कोई भी कर्मचारी या खुद अध्यक्ष भी बैक-डेट में जाकर किसी लॉग या डेटा को मिटा या बदल (एडिट) नहीं सकेगा।
2. अनिवार्य रोटेशन और ‘लीव’ पॉलिसी: गोपनीय शाखाओं और रिकॉर्ड रूम में बैठे कर्मचारियों को एक निश्चित अवधि से अधिक वहां न रहने दिया जाए। संवेदनशील पदों पर बैठे अधिकारियों की संपत्तियों का नियमित रूप से ‘थर्ड-पार्टी फॉरेंसिक ऑडिट’ अनिवार्य हो।
3. एंड-टू-एंड बायोमेट्रिक मिलान: आवेदन फॉर्म भरने से लेकर, परीक्षा हॉल में बैठने और अंत में विभाग में जॉइनिंग के समय तक अभ्यर्थी के फिंगरप्रिंट और ‘फेशियल रिकग्निशन’ को कानूनी रूप से अनिवार्य किया जाए, ताकि 2000 डमी अभ्यर्थियों का यह समानांतर साम्राज्य हमेशा के लिए ध्वस्त हो सके।
अपनाया जाए अन्य राज्यों का सख्त मॉडल
राजस्थान को भी उत्तराखंड और केंद्र सरकार के नए सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम की तर्ज पर पूर्णतः सख्त रुख अपनाना होगा। नए राष्ट्रीय कानूनों के तहत पेपर लीक और संगठित अपराध में शामिल माफियाओं के लिए 10 साल तक की कठोर जेल और एक करोड़ तक के जुर्माने का प्रावधान है। इसके अलावा, संलिप्त पाए जाने पर पूरी संस्था की संपत्ति कुर्क करने जैसे कड़े प्रावधान आरपीएससी के आंतरिक तंत्र पर भी लागू करना होगा।
जब तक सिस्टम के भीतर बैठे इन सफेदपोश अपराधियों और उन्हें राजनीतिक संरक्षण देने वाले बिचौलियों पर निर्णायक और प्राणघातक प्रहार नहीं होगा, तब तक राजस्थान के युवाओं का इस लोकतांत्रिक चयन प्रणाली पर विश्वास बहाल होना असंभव है।
युवाओं का दर्द
रानीवाड़ा (जालोर) से जयपुर आकर किसी तरह छोटे से कमरे में संघर्ष करते हुए तैयारी कर रहा हूं, अगर पेपर लीक हो जाए तो हमारे परिवार पर क्या गुजरेगी। अधिकतर युवाओं के माता-पिता पेट काटकर, कभी गहने गिरवी रखकर कोचिंग की फीस भेजते हैं।
– संदीप राजपुरोहित, जालोर
हमारा संघर्ष सिर्फ किताबों से नहीं, बल्कि इस भ्रष्ट सिस्टम से है। जब पता चलता है कि 2 लाख में कोई क्लर्क फोटो बदल रहा है, तो लगता है कि हमारी सालों की मेहनत बेमानी थी।
– कैलाश प्रजापति, कोटपूतली







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