क्या बदलते भारत के साथ बदलेगी गांव की चौपाल?
गांव के लोग अदालतों के चक्कर लगाए बिना अपने विवाद वहीं सुलझा लेते थे। चौपाल केवल फैसले सुनाने की जगह नहीं थी, बल्कि विश्वास व संवाद की प्रतीक...

कभी चौपालें गांवों को जोड़ती थीं… अब कुछ फैसले सवाल खड़े कर रहे हैं
अगर आपसे पूछा जाए कि ‘पंच परमेश्वर’ शब्द क्यों बना होगा?
शायद इसलिए कि कभी गांव की चौपाल पर बैठने वाले पंचों से न्याय की उम्मीद की जाती थी। गांव के लोग अदालतों के चक्कर लगाए बिना अपने विवाद वहीं सुलझा लेते थे। चौपाल केवल फैसले सुनाने की जगह नहीं थी, बल्कि विश्वास, संवाद और सामाजिक समरसता का प्रतीक थी।
लेकिन समय बदल गया।
देश का संविधान मजबूत हुआ।
कानून विकसित हुए।
लोगों में अपने अधिकारों को लेकर जागरूकता बढ़ी। ऐसे में यह उम्मीद भी स्वाभाविक थी कि पंचायतों की सोच और कार्यप्रणाली भी समय के साथ आगे बढ़ेगी।
लेकिन क्या ऐसा हुआ है
राजस्थान के जालोर जिले से सामने आई एक खबर ने इस सवाल को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
कथित तौर पर एक लिव-इन रिलेशनशिप के मामले में पंचायत ने एक परिवार के सामाजिक बहिष्कार और 21 लाख रुपये के जुर्माने का फरमान सुनाया। यह मामला अब कानूनी बहस का विषय भी बन चुका है। लेकिन इससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या ऐसे फैसले गांवों को जोड़ते हैं या समाज में नई खाई पैदा करते हैं?
यहां एक बात साफ कर देना भी जरूरी है।
यह लेख किसी पंचायत या किसी पंच की नीयत पर सवाल नहीं उठा रहा। संभव है कि उनका उद्देश्य सामाजिक अनुशासन बनाए रखना रहा हो। लेकिन आज का भारत केवल परंपराओं से नहीं चलता। संविधान, कानून, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। इसलिए हर सामाजिक निर्णय को इन कसौटियों पर भी परखा जाना चाहिए।
दिलचस्प बात यह है कि देश में ऐसी पंचायतों की भी कमी नहीं है जिन्होंने अपने फैसलों से गांवों की तकदीर बदल दी।
राजस्थान के राजसमंद जिले का पिपलांत्री गांव इसका शानदार उदाहरण है। यहां बेटी के जन्म पर पेड़ लगाने की परंपरा शुरू हुई। पंचायत ने एक फैसले से पर्यावरण संरक्षण, महिला सम्मान और सामाजिक भागीदारी को एक साथ जोड़ दिया। आज यह गांव दुनिया भर में सकारात्मक सोच का प्रतीक माना जाता है।
महाराष्ट्र का हिवरे बाजार कभी सूखे, गरीबी और पलायन से जूझ रहा था। पंचायत ने जल संरक्षण, श्रमदान, नशामुक्ति और जनभागीदारी को अभियान बनाया। परिणाम यह हुआ कि आज वही गांव देश के सबसे सफल ग्रामीण विकास मॉडल में गिना जाता है।
महाराष्ट्र का मेंढा लेखा भी कम प्रेरणादायक नहीं है। यहां ग्रामसभा के फैसले संवाद और सर्वसम्मति से लिए जाते हैं। इस गांव ने दिखाया कि नेतृत्व का अर्थ आदेश देना नहीं, बल्कि लोगों का विश्वास जीतना है।
इन उदाहरणों से एक बात बिल्कुल स्पष्ट है।
पंचायत की असली ताकत लोगों को दंडित करने में नहीं, बल्कि उन्हें साथ लेकर चलने में है।
आज गांवों के सामने जल संकट, बेरोजगारी, शिक्षा, नशा, पलायन और पर्यावरण जैसी गंभीर चुनौतियां हैं। यदि पंचायतें अपनी ऊर्जा इन मुद्दों पर केंद्रित करें तो वे फिर से समाज की सबसे विश्वसनीय संस्था बन सकती हैं।
शायद अब समय आ गया है कि चौपाल भी खुद से एक सवाल पूछे—
क्या उसका काम फरमान सुनाना है… या भविष्य गढ़ना?
क्योंकि किसी भी गांव की पहचान उसके कठोर फैसलों से नहीं, बल्कि उसके खुशहाल, शिक्षित और संगठित समाज से बनती है।





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