स्वास्थ्य जांच के नाम पर कारोबार
बीमारी की सही पहचान के लिए जांच जरूरी है, लेकिन अनावश्यक टेस्ट, कमीशन की संस्कृति और मानकों की अनदेखी ने कई डायग्नोस्टिक सेंटरों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए...

जांच का जाल
आज चिकित्सा विज्ञान ने बीमारी की पहचान को पहले से कहीं अधिक सटीक और आसान बना दिया है। आधुनिक जांच तकनीकों ने अनेक गंभीर रोगों का समय रहते पता लगाना संभव बनाया है। लेकिन इसी के साथ स्वास्थ्य जांच का एक ऐसा बाजार भी तेजी से विकसित हुआ है, जहां कई बार जरूरत से ज्यादा जांचें मरीज पर थोप दी जाती हैं। कहीं फुल बॉडी चेकअप के आकर्षक पैकेज हैं तो कहीं मामूली बीमारी में भी लंबी-चौड़ी जांच सूची। कुछ मामलों में जांच की गुणवत्ता और रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठे हैं। ऐसे में यह समझना जरूरी हो जाता है कि जांचें इलाज का महत्वपूर्ण आधार हैं, लेकिन उनका उद्देश्य केवल बीमारी की सही पहचान होना चाहिए, न कि मरीज पर अनावश्यक आर्थिक बोझ डालना।
Table Of Content
आजादी के बाद देश ने चिकित्सा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। स्वास्थ्य सेवाओं का नेटवर्क बढ़ा है, डॉक्टरों और नर्सिंगकर्मियों की संख्या में इजाफा हुआ है। बीमारी की जांच के लिए आधुनिक तकनीकों का व्यापक इस्तेमाल होने लगा है। लेकिन इस चमक के पीछे एक परेशान करने वाला सच भी छिपा है। कई जगह अनावश्यक जांचें कराई जा रही हैं, डायग्नोस्टिक सेंटर महज व्यावसायिक प्रतिष्ठान की तरह चल रहे हैं। कुछ मामलों में तो बिना नमूने की जांच किए ही रिपोर्ट तैयार करने की शिकायतें भी सामने आई हैं।
चिकित्सा से जुड़े हर व्यक्ति और संस्थान का मूल उद्देश्य मरीज की सेवा करना है, लेकिन लाभ का दबाव, कमीशन की संस्कृति और बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण कई जगह प्राथमिकताएं बदल गई हैं। अनावश्यक जांचों को बढ़ावा देकर जांच-उद्योग खड़ा कर दिया गया है। कभी फुल बॉडी चेकअप के नाम पर, तो कभी छोटे-से संक्रमण में भी महंगी जांचें सामान्य होती जा रही हैं। कई बार सामान्य बीमारी में भी ऐसी जांचें लिख दी जाती हैं, जो इलाज बदलने में निर्णायक भूमिका नहीं निभातीं। इससे दोहरा नुकसान होता है। एक ओर मरीज की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है, दूसरी ओर वास्तविक आवश्यक जांचों का महत्व कम हो जाता है।
यह समझना जरूरी है कि हर जांच का अपना वैज्ञानिक महत्व होता है। लेकिन जब जांच का चयन चिकित्सकीय आवश्यकता के बजाय आर्थिक लाभ के आधार पर होने लगे, तब समस्या गंभीर हो जाती है। अब तो कई मरीजों में भी यह धारणा बनने लगी है कि जितनी अधिक जांचें होंगी, इलाज उतना बेहतर होगा, जबकि बेहतर इलाज का अर्थ सही समय पर सही जांच है, न कि अधिक से अधिक जांचें।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि जांचें बीमारी की पहचान का माध्यम हैं, बीमारी पैदा करने का नहीं। इसलिए हर व्यक्ति को यह समझना चाहिए कि कौन-सी जांच कब जरूरी है, किसे डॉक्टर की सलाह के बिना नहीं कराना चाहिए और किन जांचों को नियमित अंतराल पर कराना लाभदायक हो सकता है।
कब कराएं जांच
जयपुर स्थित महात्मा गांधी चिकित्सा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. संदीप नरूला बताते हैं कि मोटे तौर पर जांचों को दो वर्गों में बांटा जा सकता है। पहली श्रेणी नॉन-इन्वेसिव जांचों की होती है, जिन्हें सामान्य या छोटे टेस्ट भी कहा जाता है। इनमें खून, पेशाब, शुगर, लिवर, किडनी, कोलेस्ट्रॉल और ईसीजी जैसी जांचें शामिल हैं। इन जांचों में शरीर के भीतर किसी उपकरण या प्रक्रिया का उपयोग नहीं किया जाता, इसलिए इन्हें तुलनात्मक रूप से सुरक्षित और सामान्य माना जाता है।
दूसरी श्रेणी में इन्वेसिव जांचें आती हैं, जिन्हें बड़े या जटिल टेस्ट कहा जाता है। इनमें शरीर के भीतर किसी प्रकार की प्रक्रिया, उपकरण या चीरा लगाकर जांच की जाती है। ऐसे टेस्ट केवल डॉक्टर की स्पष्ट सलाह पर ही कराए जाने चाहिए। इन्हें सामान्य जांच समझकर या किसी लैब के कहने पर नहीं कराना चाहिए।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों से बातचीत में यह बात सामने आई कि यदि कोई व्यक्ति सामान्य रूप से स्वस्थ है, उसे कोई बड़ी बीमारी नहीं है, उसकी जीवनशैली संतुलित है, वह नियमित व्यायाम करता है और नशे से दूर रहता है। साथ ही परिवार में भी किसी गंभीर बीमारी का इतिहास नहीं है, तो 35 वर्ष की उम्र से पहले उसे बार-बार जांच कराने की आवश्यकता नहीं होती। हालांकि 35 वर्ष के बाद हर दो से तीन वर्ष में कुछ बुनियादी जांचें कराई जा सकती हैं। इनमें सीबीसी, एलएफटी, केएफटी, लिपिड प्रोफाइल और ईसीजी जैसी जांचें शामिल हैं।
यदि किसी व्यक्ति के परिवार में मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, थायरॉइड या किसी गंभीर बीमारी का इतिहास है, तो उसे 30 वर्ष की उम्र के बाद नियमित जांच शुरू कर देनी चाहिए। ऐसे लोग हर दो से तीन वर्ष में सामान्य जांच करा सकते हैं। 40 वर्ष के बाद यह अंतराल और कम कर देना चाहिए, जबकि 50 वर्ष की उम्र के बाद सालाना स्वास्थ्य जांच अधिक उपयुक्त मानी जाती है।
प्रोफेसर डॉ. संदीप नरूला कहते हैं कि आज एक बड़ी समस्या यह भी है कि कुछ लोग जांच को अनावश्यक मानकर टाल देते हैं। वे डॉक्टर की लिखी सामान्य जांचें भी नहीं कराते। यह उतना ही नुकसानदायक है, जितना बिना जरूरत जांच कराना। कई बीमारियां शुरुआती अवस्था में केवल जांच के माध्यम से ही पकड़ में आती हैं। यदि समय रहते जांच न हो, तो बीमारी चुपचाप बढ़ती रहती है।
उदाहरण के लिए, कई लोग वर्षों तक मधुमेह या उच्च रक्तचाप की दवा तो लेते रहते हैं, लेकिन बीच में न डॉक्टर को दिखाते हैं और न ही आवश्यक जांच कराते हैं। ऐसा करना खतरनाक हो सकता है। समय के साथ बीमारी की स्थिति बदल सकती है, दवा की मात्रा में बदलाव की जरूरत पड़ सकती है या दूसरी स्वास्थ्य समस्याएं भी जुड़ सकती हैं। इसलिए इलाज शुरू होने के बाद नियमित फॉलो-अप और तय समय पर जांच कराना भी उतना ही जरूरी है, जितना दवा लेना।
जांच या कारोबार?
मरीज अक्सर डॉक्टर पर भरोसा करके जांच कराता है। वह यह मानकर चलता है कि जो भी जांच लिखी गई है, वह उसके उपचार के लिए आवश्यक होगी। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में कई रिपोर्टों, अदालती टिप्पणियों और विशेषज्ञों ने इस बात पर चिंता जताई है कि कुछ अस्पतालों और निजी स्वास्थ्य संस्थानों में गैरजरूरी जांचों को बढ़ावा दिया जाता है। कुछ मीडिया रिपोर्टों में यह भी सामने आया है कि कुछ निजी अस्पतालों में डॉक्टरों पर अधिक जांचें और सर्जरी कराने का दबाव बनाया जाता है।
स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि इस प्रवृत्ति के पीछे कई बार कमीशन की व्यवस्था भी एक कारण बनती है। समय-समय पर ऐसे आरोप लगते रहे हैं कि कुछ डॉक्टर मरीजों को उन्हीं डायग्नोस्टिक सेंटरों में भेजते हैं, जिनसे उनका व्यावसायिक संबंध होता है। ऐसी शिकायतें भी सामने आती रही हैं कि कुछ चिकित्सक सरकारी लैब की रिपोर्ट स्वीकार करने के बजाय मरीज को दोबारा किसी निजी लैब से जांच कराने की सलाह देते हैं। हालांकि यह पूरी चिकित्सा व्यवस्था की तस्वीर नहीं है, लेकिन ऐसी प्रवृत्तियां मरीजों का भरोसा कमजोर करती हैं।
अनावश्यक जांचों पर प्रभावी रोक लगाने के लिए निजी अस्पतालों और डायग्नोस्टिक केंद्रों की जवाबदेही तय करना जरूरी है। जांच लिखने के स्पष्ट वैज्ञानिक मानक विकसित हों, उनकी नियमित समीक्षा हो और आवश्यकता पड़ने पर डॉक्टरों के पर्चों का ऑडिट भी किया जाए। इससे मरीजों के हितों की बेहतर सुरक्षा हो सकेगी।
डायग्नोस्टिक सेंटरों की गुणवत्ता पर सवाल क्यों
आधुनिक मशीनों की मदद से आज ब्लड, यूरिन और अन्य कई जांचें कम समय में संभव हो गई हैं। इसके कारण डायग्नोस्टिक सेवाओं के क्षेत्र में तेजी से निवेश बढ़ा है। सैंपल कलेक्शन सेंटरों का विस्तार हुआ है और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित रिपोर्टिंग जैसी नई तकनीकों ने इस कारोबार को नई गति दी है। लेकिन आधुनिक साज-सज्जा और कम समय में रिपोर्ट देने के दावों के बीच कई प्रयोगशालाओं की गुणवत्ता को लेकर गंभीर सवाल भी उठते रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि प्रशिक्षित टेक्नीशियन की कमी, नमूना संग्रह में लापरवाही, तापमान नियंत्रण के मानकों का पालन न होना, उपकरणों का समय-समय पर कैलिब्रेशन नहीं होना और डेटा प्रबंधन की कमजोर व्यवस्था जैसी कमियां जांच रिपोर्ट की विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकती हैं। एक गलत जांच रिपोर्ट के आधार पर मरीज का उपचार भी गलत दिशा में जा सकता है, जिसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
इन्हीं चुनौतियों को देखते हुए क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट, 2010 बनाया गया था, ताकि अस्पतालों और डायग्नोस्टिक केंद्रों का संचालन निर्धारित मानकों के अनुसार हो और मरीजों को गुणवत्तापूर्ण जांच सेवाएं मिल सकें। राजस्थान में भी इस कानून को मंजूरी मिल चुकी है और इसके नियम लागू किए जा चुके हैं। राज्य में प्रत्येक डायग्नोस्टिक सेंटर का क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट, 2010 के तहत पंजीकृत होना अनिवार्य है।
क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट, 2010 का नहीं हो रहा पालन
राजस्थान प्रैक्टिसिंग पैथोलॉजिस्ट्स सोसाइटी के सचिव डॉ. रोहित जैन का कहना है कि राज्य में अब भी बड़ी संख्या में ऐसे डायग्नोस्टिक सेंटर संचालित हो रहे हैं, जिनका क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट, 2010 के तहत पंजीकरण नहीं है। कई केंद्र बिना योग्य पैथोलॉजिस्ट के ही चलाए जा रहे हैं। कुछ स्थानों पर केवल पैथोलॉजिस्ट के स्कैन किए गए हस्ताक्षरों के आधार पर काम चलाया जा रहा है, जबकि नियमों के अनुसार वहां योग्य पैथोलॉजिस्ट की उपस्थिति आवश्यक है।
वे बताते हैं कि कुछ जगहों पर लैब टेक्नीशियन ही पूरी व्यवस्था संभाल रहे हैं और रिपोर्ट पर हस्ताक्षर भी वही कर रहे हैं। जबकि कानून की भावना स्पष्ट है कि पैथोलॉजिकल प्रयोगशाला की स्थापना, संचालन और रखरखाव केवल ऐसे योग्य व्यक्ति के नेतृत्व में होना चाहिए, जिसके पास पैथोलॉजी में एम.डी. अथवा क्लिनिकल पैथोलॉजी का डिप्लोमा हो। इसके बावजूद कई स्थानों पर नियमों की अनदेखी की जा रही है, जिससे गलत रिपोर्ट जारी होने की आशंका बनी रहती है।
डॉ. रोहित जैन का कहना है कि किसी लैब या अस्पताल की फ्रेंचाइजी शाखा भी इन्हीं मानकों के अनुरूप संचालित होनी चाहिए। यदि कोई संस्थान राज्य में कई शाखाएं चला रहा है, तो प्रत्येक शाखा में योग्य पैथोलॉजिस्ट की उपस्थिति सुनिश्चित की जानी चाहिए। केवल किसी प्रतिष्ठित ब्रांड का नाम या बोर्ड लगाकर जांच व्यवस्था नहीं चलाई जा सकती।
इसी प्रकार जिन अस्पतालों, नर्सिंग होम और क्लीनिकों में इन-हाउस पैथोलॉजिकल लैब संचालित हो रही हैं, वहां भी अंतिम रिपोर्ट जारी करने वाला व्यक्ति योग्य पैथोलॉजिस्ट ही होना चाहिए। जांच की गंभीरता को देखते हुए यह केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि मरीज की सुरक्षा से जुड़ी अनिवार्य शर्त है।
सुप्रीम कोर्ट ने भी इस विषय पर स्पष्ट रुख अपनाया है। 12 दिसंबर, 2017 को दिए गए अपने आदेश में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि केवल पैथोलॉजी में पोस्ट ग्रेजुएट योग्यता रखने वाला पंजीकृत मेडिकल प्रैक्टिशनर ही सभी प्रयोगशाला रिपोर्टों पर हस्ताक्षर कर सकता है। इस आदेश का स्पष्ट संदेश है कि जांच रिपोर्ट केवल तकनीकी दस्तावेज नहीं, बल्कि चिकित्सकीय जिम्मेदारी है। इसलिए उसकी प्रमाणिकता और गुणवत्ता सुनिश्चित करना अनिवार्य है।
राजस्थान हाईकोर्ट भी यह कह चुका है कि जो क्लिनिकल प्रतिष्ठान क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट, 2010 तथा केंद्र और राज्य सरकार द्वारा निर्धारित नियमों के विपरीत संचालित हो रहे हैं, उनकी पहचान की जाए। जिन संस्थानों के विरुद्ध शिकायतें लंबित हैं, उन पर समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए, ताकि मरीजों के स्वास्थ्य से किसी प्रकार का समझौता न हो।
अब आवश्यकता केवल कानून बनाने की नहीं, बल्कि उसके प्रभावी पालन की है। राज्य सरकार को व्यापक अभियान चलाकर बिना पंजीकरण वाले पैथोलॉजी केंद्रों की पहचान करनी चाहिए। नियमित निरीक्षण की व्यवस्था हो, मानकों का उल्लंघन करने वाले केंद्रों पर सख्त कार्रवाई की जाए और आवश्यकता पड़ने पर उनका संचालन बंद कराया जाए। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि प्रत्येक डायग्नोस्टिक सेंटर में योग्य पैथोलॉजिस्ट की वास्तविक उपस्थिति हो और सभी रिपोर्टें उनकी निगरानी तथा जिम्मेदारी में जारी हों।
सरकार के साथ-साथ चिकित्सा संस्थानों और चिकित्सकों की भी समान जिम्मेदारी है कि वे जांच को केवल उपचार का माध्यम मानें, आय बढ़ाने का साधन नहीं। मरीजों का विश्वास चिकित्सा व्यवस्था की सबसे बड़ी पूंजी है और यह विश्वास तभी बना रह सकता है, जब जांचें पूरी पारदर्शिता, वैज्ञानिक मानकों और नैतिक मूल्यों के अनुरूप की जाएं।
स्वास्थ्य जांच आधुनिक चिकित्सा की आधारशिला है। सही समय पर सही जांच अनेक गंभीर बीमारियों की समय रहते पहचान कर सकती है और मरीज का जीवन बचा सकती है। लेकिन यदि जांचें चिकित्सकीय आवश्यकता के बजाय व्यावसायिक हितों से संचालित होने लगें, तो सबसे अधिक नुकसान मरीज का ही होता है। इसलिए जरूरत इस बात की है कि अनावश्यक जांचों पर प्रभावी रोक लगे, डायग्नोस्टिक सेंटरों की गुणवत्ता सुनिश्चित हो, कानून का सख्ती से पालन कराया जाए और मरीजों को भी जागरूक बनाया जाए। आखिरकार, स्वास्थ्य जांच का उद्देश्य केवल रिपोर्ट तैयार करना नहीं, बल्कि मरीज को सही, सुरक्षित और विश्वसनीय उपचार तक पहुंचाना है।
मरीज रखें इन बातों का ध्यान
– डॉक्टर से यह जरूर पूछें कि लिखी गई जांच क्यों आवश्यक है।
– सामान्य जांच और विशेष जांच के बीच का अंतर समझें।
– जहां संभव हो, मान्यता प्राप्त और विश्वसनीय डायग्नोस्टिक सेंटर का ही चयन करें।
– किसी गंभीर रिपोर्ट पर आवश्यकता महसूस हो तो दूसरी चिकित्सकीय राय लेने में संकोच न करें।
– फुल बॉडी चेकअप पैकेज हर व्यक्ति के लिए जरूरी नहीं होते। उम्र, स्वास्थ्य और जोखिम के आधार पर ही जांच कराएं।
– इलाज शुरू होने के बाद डॉक्टर की सलाह के अनुसार नियमित फॉलो-अप और आवश्यक जांच अवश्य कराएं।






No Comment! Be the first one.