जब स्वास्थ्य बन जाए कारोबार
स्वास्थ्य अब केवल सेवा नहीं, बल्कि तेजी से फैलता हुआ कारोबार बन चुका है। बढ़ती बीमारियों ने दवाइयों, अस्पतालों, जांच और बीमा उद्योग को अभूतपूर्व विस्तार दिया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि हमारी...

इलाज का चक्रव्यूह
मनीष गोधा,
वरिष्ठ पत्रकार
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भारतीय संस्कृति में स्वास्थ्य को सबसे बड़ा धन माना गया है। हमारी परंपरा ने हमेशा रोग होने के बाद इलाज नहीं, बल्कि रोग से बचाव को प्राथमिकता दी। विडंबना यह है कि आज हमारी पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था का केंद्र बचाव नहीं, बल्कि इलाज बन गया है। परिणाम यह है कि दवाइयों, अस्पतालों, जांच और स्वास्थ्य बीमा का बाजार लगातार फैलता जा रहा है, जबकि स्वस्थ जीवनशैली हमारी प्राथमिकताओं से दूर होती जा रही है।
आंकड़े बताते हैं कि स्वस्थ रहने की कीमत आज पहले से कहीं अधिक हो चुकी है। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के ट्रस्ट इंडिया ब्रांड इक्विटी फाउंडेशन (आईबीईएफ) के अनुसार, भारत का हेल्थकेयर सेक्टर वर्ष 2016 में 9.43 हजार करोड़ रुपये का था, जो 2023 में बढ़कर 31.88 लाख करोड़ रुपये हो गया। वर्ष 2025 तक इसके लगभग 54.67 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। वर्ष 2022 में देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 3.3 प्रतिशत हिस्सा स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च हुआ, जिसके 2030 तक बढ़कर 5 प्रतिशत तक पहुंचने की संभावना है। इसी तरह वित्तीय वर्ष 2024 में हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम 1.09 लाख करोड़ रुपये था, जो 2025 में बढ़कर 1.19 लाख करोड़ रुपये हो गया। ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर खड़ा यह बाजार लगातार विस्तार कर रहा है।
अन्य अध्ययनों के अनुसार भारत के हेल्थकेयर बाजार में सबसे बड़ी हिस्सेदारी अस्पतालों और क्लीनिकों की है, जिसका आकार लगभग 98 अरब डॉलर है। भारतीय दवा उद्योग का बाजार करीब 50 अरब डॉलर और स्वास्थ्य एवं वेलनेस क्षेत्र का बाजार 160 अरब डॉलर से अधिक आंका गया है। भले ही ये अलग-अलग स्रोतों के अनुमान हों, लेकिन वे एक ही सच्चाई की ओर संकेत करते हैं कि स्वास्थ्य सेवाओं का यह विशाल बाजार अब हमारे खान-पान, जीवनशैली, उपचार और यहां तक कि जीवन के अंतिम चरण तक को प्रभावित कर रहा है।
किन बीमारियों ने खड़ा किया इलाज का यह विशाल बाजार?
सवाल यह है कि संयमित और अपेक्षाकृत स्वस्थ जीवन जीने वाला भारतीय समाज आखिर स्वास्थ्य सेवाओं के इस विशाल बाजार के चंगुल में फंसा कैसे? इसका उत्तर बहुत कठिन नहीं है। हम आज भी अपनी पिछली पीढ़ियों की उस जीवनशैली को याद करते हैं, जिसमें संतुलित भोजन, नियमित शारीरिक श्रम और प्रकृति के साथ सामंजस्य था। लेकिन समय के साथ हमारी दिनचर्या, खान-पान और जीवनशैली तेजी से बदलती गई। विडंबना यह है कि जिन परिस्थितियों ने इन रोगों को बढ़ावा दिया, उन्हीं के इर्द-गिर्द विकसित हुआ स्वास्थ्य बाजार अब उनके उपचार का सबसे बड़ा केंद्र बन गया है।
आज हृदय रोग, मधुमेह, मोटापा और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। इनमें से अधिकांश गैर-संचारी रोग अब कम उम्र में भी दिखाई देने लगे हैं। इन रोगों का उपचार प्रायः उन्हें पूरी तरह समाप्त करने के बजाय लंबे समय तक नियंत्रित रखने पर केंद्रित रहता है। परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में लोगों को वर्षों, बल्कि कई बार जीवनभर दवाइयों, नियमित जांचों और चिकित्सकीय निगरानी पर निर्भर रहना पड़ता है।
अब सवाल यह है कि इन बीमारियों ने कितना बड़ा बाजार खड़ा कर दिया है और इनका समाज व अर्थव्यवस्था पर कितना गहरा असर पड़ रहा है। चिकित्सा विज्ञान में इन्हें गैर-संचारी रोग (नॉन-कम्युनिकेबल डिजीज़—एनसीडी) कहा जाता है। वर्ष 2017 की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति ने हृदय रोग, मधुमेह और श्वसन संबंधी बीमारियों के तेजी से बढ़ने को लेकर गंभीर चेतावनी दी थी। अब ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज की हालिया रिपोर्ट उन आशंकाओं को सही साबित करती है।
आज भारत में होने वाली कुल मौतों में लगभग 65 प्रतिशत मौतें हृदय रोग, मधुमेह, कैंसर और श्वसन संबंधी बीमारियों के कारण हो रही हैं। वर्ष 1990 में इन रोगों से होने वाली मौतों का हिस्सा 37.9 प्रतिशत था, जो 2023 तक बढ़कर 63 प्रतिशत से अधिक हो गया। इससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि इन बीमारियों के कारण लगभग 25 प्रतिशत मौतें 30 से 70 वर्ष की आयु के बीच हो रही हैं। यानी देश की सबसे उत्पादक और कार्यशील आबादी का बड़ा हिस्सा समय से पहले इन रोगों की चपेट में आकर असमय मृत्यु का शिकार बन रहा है।
इन बीमारियों का असर केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था पर भी भारी पड़ रहा है। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार, गैर-संचारी रोगों और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के कारण वर्ष 2030 तक भारत को लगभग 4.58 ट्रिलियन डॉलर का आर्थिक नुकसान हो सकता है। इनमें अकेले हृदय रोगों से 2.17 ट्रिलियन डॉलर और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से 1.03 ट्रिलियन डॉलर के नुकसान का अनुमान लगाया गया है।
अब कुपोषण नहीं, मोटापा बड़ी चुनौती
भारत लंबे समय तक कुपोषित देशों की श्रेणी में गिना जाता रहा। एक समय कुपोषण और कम वजन देश की सबसे बड़ी स्वास्थ्य समस्याओं में शामिल थे, लेकिन हाल के अध्ययन बताते हैं कि अब मोटापा उससे भी बड़ी चुनौती बनकर उभर रहा है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस) के अनुसार, पिछले सर्वेक्षण की तुलना में पुरुषों में मोटापा 44 प्रतिशत और महिलाओं में 41 प्रतिशत बढ़ा है।
वर्ष 2019 में भारत में मोटापे का आर्थिक प्रभाव लगभग 2.4 लाख करोड़ रुपये आंका गया था, जिसके 2030 तक बढ़कर 6.7 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, मशीनीकरण, बढ़ता स्क्रीन टाइम और शहरी कार्यशैली के कारण 31 प्रतिशत से अधिक वयस्क तथा लगभग 80 प्रतिशत किशोर पर्याप्त शारीरिक गतिविधि नहीं कर पा रहे हैं।
तंबाकू ने बढ़ाया कैंसर का खतरा
भारत में हर वर्ष कैंसर के लगभग 16 लाख नए मामले सामने आते हैं, जबकि करीब 9 लाख लोगों की इस बीमारी से मृत्यु हो जाती है। अनुमान है कि लगभग हर नौ में से एक भारतीय को अपने जीवनकाल में कैंसर होने का खतरा रहता है। चिंता की बात यह है कि लगभग 60 से 70 प्रतिशत मामलों का पता तब चलता है, जब बीमारी एडवांस स्टेज में पहुंच चुकी होती है।
देश में कैंसर के लगभग 27 प्रतिशत मामले तंबाकू के सेवन से जुड़े हैं। धूम्रपान, गुटखा, खैनी और अन्य तंबाकू उत्पाद आज भी कैंसर के सबसे बड़े कारणों में शामिल हैं। कैंसर के बढ़ते मामलों के साथ उपचार, दवाओं, रेडियोथेरेपी, कीमोथेरेपी और अत्याधुनिक चिकित्सा उपकरणों का बाजार भी लगातार विस्तार कर रहा है।
सांस की बीमारियां बन रहीं गंभीर संकट
क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज़ (सीओपीडी) सभी दीर्घकालिक श्वसन रोगों का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा है। इसके प्रमुख कारणों में घरों में ठोस ईंधन से निकलने वाला धुआं, शहरी वायु प्रदूषण और तंबाकू का सेवन शामिल हैं।
स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर 2024 के अनुसार, भारत में वायु प्रदूषण के कारण हर वर्ष 20 लाख से अधिक लोगों की मौत होती है। बढ़ते प्रदूषण और श्वसन रोगों के कारण इन्हेलर, ऑक्सीजन उपकरण तथा श्वसन संबंधी दवाओं का बाजार भी तेजी से बढ़ रहा है। वर्तमान में यह बाजार 4 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक का है और लगभग 7 प्रतिशत की वार्षिक दर से विस्तार कर रहा है।
डायबिटीज का बढ़ता दायरा
बदलती जीवनशैली ने मधुमेह को देश की सबसे बड़ी स्वास्थ्य चुनौतियों में शामिल कर दिया है। भारत में लगभग 10 करोड़ लोग मधुमेह और 13.1 करोड़ लोग प्री-डायबिटीज से प्रभावित हैं। सबसे बड़ी चिंता यह है कि लगभग आधे मरीजों को लंबे समय तक यह पता ही नहीं चलता कि वे इस बीमारी से पीड़ित हैं। जब तक बीमारी का पता चलता है, तब तक कई मामलों में शरीर के महत्वपूर्ण अंग प्रभावित हो चुके होते हैं।
मधुमेह रोगियों की बढ़ती संख्या के साथ दवाओं, इंसुलिन, ग्लूकोमीटर, कंटीन्यूअस ग्लूकोज मॉनिटरिंग सिस्टम और अन्य चिकित्सा उपकरणों का बाजार भी तेजी से विस्तार कर रहा है। अनुमान है कि इस क्षेत्र का बाजार वर्तमान 5.4 अरब डॉलर से बढ़कर वर्ष 2034 तक लगभग 15 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है।
हर घर तक पहुंच चुका हृदय रोग
विभिन्न अध्ययनों के अनुसार, भारत में होने वाली कुल मौतों में लगभग 32 प्रतिशत हृदय रोगों के कारण होती हैं। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के आंकड़ों के अनुसार, पिछले सात वर्षों में हृदय रोगों के मामले लगभग तीन गुना बढ़कर प्रति एक लाख आबादी पर 3,891 तक पहुंच गए हैं।
बढ़ते मरीजों की संख्या के कारण हृदय चिकित्सा से जुड़े अस्पतालों, एंजियोप्लास्टी, बाईपास सर्जरी, स्टेंट, पेसमेकर, जांच उपकरणों और दवाओं का बाजार भी लगातार विस्तार कर रहा है। हृदय रोग संबंधी दवाओं का बाजार 10.7 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर के साथ 2,600 करोड़ रुपये का आंकड़ा पार कर चुका है।
मानसिक स्वास्थ्य भी संकट में
जीवनशैली और खान-पान में बदलाव के साथ तनाव, अवसाद, चिंता और अन्य मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं में भी तेजी से वृद्धि हुई है। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार, वर्ष 2013 से 2023 के बीच एंग्जायटी डिसऑर्डर के मामलों में 63 प्रतिशत और डिप्रेशन के मामलों में 26 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।
एक समय मानसिक रोगों के उपचार को लेकर समाज में झिझक और जागरूकता की कमी थी। लोग मनोचिकित्सक के पास जाने से बचते थे, लेकिन अब स्थिति तेजी से बदल रही है। जागरूकता बढ़ने के साथ परामर्श सेवाओं, मनोचिकित्सा, एंटी-डिप्रेसेंट दवाओं, ऑनलाइन काउंसिलिंग और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का बाजार भी तेजी से विस्तार कर रहा है। वर्ष 2025 में इसका अनुमानित आकार लगभग 21 अरब डॉलर था, जो 2034 तक बढ़कर 27 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है।
इन सभी उदाहरणों से स्पष्ट है कि जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां केवल स्वास्थ्य का संकट नहीं रह गई हैं। उन्होंने दवाइयों, अस्पतालों, चिकित्सा उपकरणों, जांच, बीमा और स्वास्थ्य सेवाओं का एक विशाल आर्थिक तंत्र खड़ा कर दिया है, जो हर वर्ष और अधिक विस्तृत होता जा रहा है। इसी कारण अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था का केंद्र केवल इलाज होना चाहिए, या फिर बीमारी होने से पहले उसे रोकने पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए?
बचाव ही सबसे बड़ा उपचार, लेकिन प्राथमिकता क्यों नहीं?
भारतीय जीवन-दर्शन और आयुर्वेद की मूल अवधारणा हमेशा रोग होने के बाद उपचार करने के बजाय रोगों से बचाव पर आधारित रही है। आधुनिक वैज्ञानिक शोध भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर अनेक गैर-संचारी रोगों के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसके बावजूद हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था का बड़ा हिस्सा आज भी उपचार-केंद्रित दिखाई देता है, जबकि बचाव आधारित मॉडल को अपेक्षित महत्व नहीं मिल पाया है।
ऐसे हालात में स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि यदि समाज में लोग कम बीमार पड़ें, स्वस्थ जीवनशैली अपनाएं और उपचार की आवश्यकता ही कम हो जाए, तो इस पूरे स्वास्थ्य उद्योग की दिशा और स्वरूप क्या होगा? यह प्रश्न केवल आर्थिक नहीं, बल्कि स्वास्थ्य नीति और सामाजिक प्राथमिकताओं से भी जुड़ा हुआ है। इसीलिए दुनिया भर के अनेक सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ अब ‘प्रिवेंशन फर्स्ट’ यानी ‘पहले बचाव’ की अवधारणा पर जोर दे रहे हैं। उनका मानना है कि स्वास्थ्य व्यवस्था का उद्देश्य केवल बीमार व्यक्ति का इलाज करना नहीं, बल्कि समाज को बीमार होने से बचाना भी होना चाहिए।
इस दिशा में संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, योग, पर्याप्त नींद, तनाव प्रबंधन, तंबाकू और शराब से दूरी, स्वच्छ पर्यावरण तथा समय-समय पर स्वास्थ्य जांच जैसी आदतें अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। ये उपाय न केवल व्यक्ति को स्वस्थ रखते हैं, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ते आर्थिक बोझ को भी कम कर सकते हैं।
आयुर्वेद, योग, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी जैसी पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियां भी रोगों की रोकथाम और दीर्घकालिक स्वास्थ्य संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। आवश्यकता इस बात की है कि सभी चिकित्सा पद्धतियों का वैज्ञानिक मूल्यांकन हो और जहां उनके लाभ प्रमाणित हों, वहां उन्हें मुख्यधारा की स्वास्थ्य नीति का हिस्सा बनाया जाए।
आज सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि हमारे पास कितने अस्पताल, दवाइयां या जांच सुविधाएं हैं। असली सवाल यह है कि हम बीमार क्यों पड़ रहे हैं और बीमार होने से पहले उन्हें रोकने के लिए क्या कर रहे हैं? यदि स्वास्थ्य नीति का केंद्र उपचार के साथ-साथ बचाव भी बने, तो न केवल करोड़ों लोगों का जीवन बेहतर होगा, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ता आर्थिक बोझ भी काफी हद तक कम किया जा सकेगा।
यह पूरी चर्चा केवल स्वास्थ्य सेवाओं के बढ़ते बाजार की नहीं है, बल्कि हमारी बदलती जीवनशैली और स्वास्थ्य संबंधी प्राथमिकताओं की भी है। यदि बीमारी होने के बाद इलाज पर होने वाले खर्च का एक छोटा-सा हिस्सा भी स्वस्थ जीवनशैली, पोषण, व्यायाम, योग, नशामुक्ति और जन-जागरूकता पर निवेश किया जाए, तो आने वाले वर्षों में करोड़ों लोगों को गैर-संचारी रोगों से बचाया जा सकता है। स्वास्थ्य का भविष्य केवल बेहतर अस्पतालों में नहीं, बल्कि ऐसे समाज के निर्माण में है जहां लोगों को अस्पताल जाने की जरूरत ही कम पड़े।






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