सुरक्षा का वादा, भरोसे की परीक्षा
बढ़ते इलाज खर्च के दौर में स्वास्थ्य बीमा हर परिवार की जरूरत बन गया है। लेकिन कैशलेस इलाज में देरी, क्लेम विवाद और जटिल शर्तों ने कई बीमाधारकों का भरोसा डगमगाया है। जरूरत बीमा से दूरी बनाने की नहीं,...

बीमा का सच
हरीश मलिक,
वरिष्ठ पत्रकार
Table Of Content
- बीमा का सच
- कैशलेस, लेकिन कितना सहज?
- क्लेम विवाद क्यों बढ़ते हैं?
- छोटे अक्षरों में छिपी बड़ी बातें
- एजेंट की भूमिका केवल बिक्री तक क्यों?
- कुछ निजी अस्पताल भी कम जिम्मेदार नहीं
- मरीज का अधिकार है स्पष्ट जानकारी
- इलाज पहले, विवाद बाद में
- पारदर्शिता ही विश्वास की नींव
- आमजन भी रहें जागरूक
- बीमा सिस्टम में क्या बदलाव होना चाहिए?
आज के दौर में मध्यमवर्गीय परिवार पर सबसे बड़ा आर्थिक संकट तब आता है, जब घर का कोई सदस्य गंभीर बीमारी की चपेट में आ जाता है। हृदय रोग, कैंसर, किडनी प्रत्यारोपण, लिवर ट्रांसप्लांट या किसी बड़े हादसे का इलाज कुछ ही दिनों में लाखों रुपये खर्च करा देता है। ऐसे समय में स्वास्थ्य बीमा आर्थिक सुरक्षा का सबसे बड़ा संबल बन जाता है। लोग वर्षों तक प्रीमियम इसलिए भरते हैं, ताकि विपत्ति की घड़ी में उन्हें इलाज के लिए पैसों की चिंता न करनी पड़े। विशेष रूप से कैशलेस स्वास्थ्य बीमा का मूल उद्देश्य यही है कि मरीज बिना किसी आर्थिक बोझ व परेशानी के तत्काल अस्पताल में भर्ती हो सके और उसका उपचार निर्बाध रूप से हो। दुर्भाग्य से कुछ मामलों में वास्तविकता इससे अलग दिखाई देती है। जरूरत पड़ने पर मरीज और उसके परिजनों को कई बार ऐसी औपचारिकताओं से गुजरना पड़ता है कि बीमारी के साथ-साथ बीमा क्लेम को लेकर भी मानसिक तनाव बढ़ जाता है।
ऐसी परिस्थितियां बताती हैं कि नियामकीय व्यवस्था को और अधिक प्रभावी तथा जवाबदेह बनाने की आवश्यकता है, ताकि कैशलेस स्वास्थ्य बीमा वाले प्रत्येक बीमाधारक को बिना अनावश्यक बाधा समय पर उपचार मिल सके। साथ ही, बिना उचित कारण क्लेम में देरी करने, अनावश्यक आपत्तियां लगाने या मरीज को परेशान करने वाले अस्पतालों, बीमा कंपनियों और संबंधित एजेंसियों के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई भी सुनिश्चित हो।
कैशलेस, लेकिन कितना सहज?
स्वास्थ्य बीमा का सबसे बड़ा आकर्षण कैशलेस उपचार है। बीमा लेते समय लोगों को बताया जाता है कि सूचीबद्ध अस्पतालों में बिना तत्काल भुगतान के इलाज हो सकेगा। व्यवहार में यह सुविधा अधिकांश मामलों में उपलब्ध होती है, लेकिन कई बार अंतिम स्वीकृति मिलने में अनावश्यक समय लग जाता है। ऐसी स्थिति में मरीज के परिजनों को अस्पताल के बिलिंग काउंटर, बीमा कंपनी और थर्ड पार्टी एडमिनिस्ट्रेटर (टीपीए) के बीच बार-बार संपर्क करना पड़ता है। गंभीर बीमारी के समय हर मिनट महत्वपूर्ण होता है। यदि तकनीकी प्रक्रिया के कारण अनावश्यक विलंब हो, तो यह मानसिक तनाव कई गुना बढ़ा देता है।
बीमा कंपनियों का यह तर्क भी उचित है कि प्रत्येक दावे का सत्यापन आवश्यक होता है, ताकि फर्जी दावों पर रोक लगाई जा सके। लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि सत्यापन की प्रक्रिया वास्तविक मरीज के उपचार में बाधा न बने। तकनीकी जांच और मानवीय संवेदनशीलता के बीच संतुलन बनाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
क्लेम विवाद क्यों बढ़ते हैं?
स्वास्थ्य बीमा को लेकर सबसे अधिक असंतोष क्लेम से जुड़ा दिखाई देता है। कई बार बीमाधारकों को लगता है कि उनकी अपेक्षा के अनुरूप भुगतान नहीं हुआ या उनका दावा स्वीकार नहीं किया गया। दूसरी ओर, बीमा कंपनियां पॉलिसी की शर्तों, अपवादों और दस्तावेजों के आधार पर निर्णय लेने की बात कहती हैं।
यहीं सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है। यदि किसी दावे में वास्तव में कमी है, तो उसे अस्वीकार करने का अधिकार बीमा कंपनी के पास होना चाहिए। लेकिन यदि वही मामला बाद में अतिरिक्त दस्तावेज, पुनर्विचार या शिकायत निवारण की प्रक्रिया के बाद स्वीकार हो जाता है, तो यह स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि प्रारंभिक स्तर पर अधिक स्पष्ट और संवेदनशील निर्णय क्यों नहीं लिया गया। ऐसी स्थितियां बीमाधारकों का भरोसा कमजोर करती हैं।
छोटे अक्षरों में छिपी बड़ी बातें
स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी के दस्तावेज में अनेक नियम, प्रतीक्षा अवधि, सह-भुगतान, कमरे के किराये की सीमा और अन्य शर्तें लिखी होती हैं। समस्या यह नहीं कि शर्तें हैं, बल्कि यह है कि अधिकांश लोग उन्हें समझ ही नहीं पाते।
कई बार महत्वपूर्ण बातें छोटे अक्षरों में लिखी होती हैं। कानूनी और तकनीकी भाषा में तैयार दस्तावेज सामान्य व्यक्ति के लिए कठिन हो जाते हैं। अधिकांश लोग एजेंट के भरोसे पॉलिसी खरीद लेते हैं और पूरा दस्तावेज पढ़ नहीं पाते। संकट की घड़ी में जब उन्हें किसी शर्त का पता चलता है, तो स्वाभाविक रूप से निराशा होती है। यह स्थिति व्यवस्था की पारदर्शिता पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।
एजेंट की भूमिका केवल बिक्री तक क्यों?
स्वास्थ्य बीमा खरीदते समय अधिकांश लोग सीधे बीमा कंपनी के बजाय एजेंट या सलाहकार पर भरोसा करते हैं। ऐसे में एजेंट की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि एजेंट केवल प्रीमियम, बोनस और सुविधाओं की जानकारी दे, लेकिन अपवाद, प्रतीक्षा अवधि और सीमाओं पर पर्याप्त चर्चा न करे, तो बाद में विवाद की संभावना बढ़ जाती है।
एजेंट केवल पॉलिसी बेचने तक सीमित न रहे, बल्कि उसे मुख्य शर्तें, अपवाद और प्रतीक्षा अवधि सरल भाषा में समझानी चाहिए। दरअसल, बीमा खरीदते समय सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि “प्रीमियम कितना है?”, बल्कि यह होना चाहिए कि “किन परिस्थितियों में मुझे लाभ मिलेगा और किन परिस्थितियों में नहीं?”
कुछ निजी अस्पताल भी कम जिम्मेदार नहीं
बीमा दावों में बढ़ती जटिलताओं के लिए केवल बीमा कंपनियां ही जिम्मेदार नहीं हैं, बल्कि कुछ निजी अस्पतालों में सामने आई अनियमितताएं भी इस संकट की एक बड़ी वजह हैं। कई अस्पतालों पर अनावश्यक रूप से मरीजों को भर्ती दिखाने, ओपीडी मरीजों को आईपीडी में बदलने, इलाज की अवधि बढ़ाकर बिल बढ़ाने, गैर-जरूरी जांच और प्रक्रियाएं जोड़ने तथा फर्जी क्लेम के जरिए बीमा राशि हासिल करने जैसी अनियमितताओं के आरोप लग चुके हैं।
हाल ही में राजस्थान की आरजीएचएस योजना में सामने आए करोड़ों रुपये के कथित फर्जीवाड़े ने इस प्रवृत्ति की गंभीरता को उजागर किया है। ऐसे मामलों का सबसे बड़ा खामियाजा उन वास्तविक मरीजों को भुगतना पड़ता है, जिन्हें इलाज की सबसे अधिक आवश्यकता होती है। ऐसी अनियमितताओं के कारण बीमा कंपनियां कई मामलों में अधिक गहन जांच करती हैं। इसका परिणाम यह होता है कि वास्तविक मरीजों के क्लेम की मंजूरी में भी देरी हो जाती है और उपचार प्रभावित होने का खतरा बढ़ जाता है।
मरीज का अधिकार है स्पष्ट जानकारी
स्वास्थ्य बीमा में नियम और शर्तें स्वाभाविक हैं, लेकिन वे इतनी जटिल नहीं होनी चाहिए कि सामान्य व्यक्ति उन्हें समझ ही न सके। आज भी अनेक पॉलिसियों में मुख्य जानकारी छोटे अक्षरों और कानूनी भाषा में लिखी होती है, जिससे बीमाधारक यह नहीं समझ पाता कि कौन-सी बीमारी, कौन-सी सीमा और किन परिस्थितियों में दावा स्वीकार होगा।
यह स्थिति बदलनी होगी। जिस प्रकार दवा के पत्ते पर उसकी मात्रा, सावधानियां और दुष्प्रभाव स्पष्ट लिखे जाते हैं, उसी प्रकार स्वास्थ्य बीमा की मुख्य शर्तें भी पहले पृष्ठ पर बड़े, स्पष्ट और आसानी से पढ़े जा सकने वाले अक्षरों में लिखी जानी चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह जानकारी सरल हिंदी में और बड़े, स्पष्ट अक्षरों में उपलब्ध कराना अनिवार्य होना चाहिए। अधिकांश उपभोक्ताओं को वही भाषा समझ आती है, जिसमें वे अपना दैनिक जीवन जीते हैं।
इलाज पहले, विवाद बाद में
स्वास्थ्य बीमा व्यवस्था में सबसे अधिक मानवीय सुधार इसी क्षेत्र में किया जा सकता है। यदि अस्पताल और बीमा कंपनी के बीच किसी तकनीकी बिंदु पर मतभेद है, तो वह मरीज के उपचार में बाधा नहीं बनना चाहिए। जहां प्रथम दृष्टया पॉलिसी लागू होती दिखाई देती हो, वहां “पहले उपचार, बाद में विवाद” का सिद्धांत अपनाने पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। यदि बाद में किसी अतिरिक्त दस्तावेज या स्पष्टीकरण की आवश्यकता हो, तो वह प्रक्रिया अलग से पूरी की जा सकती है।
पारदर्शिता ही विश्वास की नींव
बीमा कंपनी यदि किसी दावे को पूरी तरह या आंशिक रूप से स्वीकार करती है, तो उसका आधार स्पष्ट होना चाहिए। यदि किसी कारण से दावा अस्वीकार किया जाता है, तो उसका कारण भी सरल हिंदी में लिखा जाना चाहिए, ताकि बीमाधारक समझ सके कि निर्णय किस आधार पर लिया गया है। जटिल कानूनी भाषा में लिखे गए उत्तर उपभोक्ता की समस्या का समाधान नहीं करते, बल्कि भ्रम और बढ़ाते हैं।
आमजन भी रहें जागरूक
बीमा व्यवस्था में जितनी जिम्मेदारी कंपनियों की है, उतनी ही जागरूकता उपभोक्ताओं की भी आवश्यक है। पॉलिसी खरीदते समय केवल कम प्रीमियम देखकर निर्णय नहीं लेना चाहिए। यह देखना भी जरूरी है कि बीमा राशि पर्याप्त है या नहीं, कौन-सी बीमारियां शामिल हैं, किन परिस्थितियों में दावा नहीं मिलेगा, नेटवर्क अस्पताल कौन-से हैं और दस्तावेजों की क्या आवश्यकता होगी।
अस्पताल में भर्ती होने पर सभी जांच रिपोर्ट, बिल और चिकित्सकीय अभिलेख सुरक्षित रखने चाहिए। यदि किसी निर्णय से असहमति हो, तो उसका लिखित कारण मांगना चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर उपलब्ध शिकायत निवारण व्यवस्था का उपयोग करना चाहिए। जागरूक उपभोक्ता न केवल अपने अधिकारों की बेहतर रक्षा कर सकता है, बल्कि अनावश्यक विवादों से भी बच सकता है।
बीमा सिस्टम में क्या बदलाव होना चाहिए?
स्वास्थ्य बीमा व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और विश्वसनीय बनाने के लिए कुछ व्यावहारिक सुधार आवश्यक हैं। सबसे पहले प्रत्येक पॉलिसी के पहले पृष्ठ पर मुख्य शर्तें, अपवाद, प्रतीक्षा अवधि और सह-भुगतान सहित सभी महत्वपूर्ण जानकारियां बड़े, स्पष्ट अक्षरों में सरल हिंदी में देना अनिवार्य किया जाए।
दूसरा, बीमा एजेंट यह प्रमाणित करे कि उसने ग्राहक को पॉलिसी की प्रमुख शर्तें समझाई हैं।
तीसरा, गंभीर और आपातकालीन मामलों में त्वरित निर्णय हो, जिससे इलाज में देरी न हो।
चौथा, शिकायतों के निस्तारण की प्रक्रिया सरल, समयबद्ध और उपभोक्ता हितैषी बनाई जाए।
पांचवां, बीमा कंपनियों की जवाबदेही के साथ ही फर्जी बिलिंग और बीमा धोखाधड़ी करने वाले अस्पतालों के विरुद्ध भी कठोर कार्रवाई हो।
स्वास्थ्य बीमा तभी अपने उद्देश्य को पूरा करेगा, जब वह कागजों में दर्ज एक अनुबंध भर न रहकर बीमारी की सबसे कठिन घड़ी में विश्वास का सच्चा सहारा बने। यही बीमाधारकों की उचित अपेक्षा है और यही एक भरोसेमंद, पारदर्शी तथा संवेदनशील स्वास्थ्य व्यवस्था की पहचान भी है। आखिर बीमा का वास्तविक मूल्य पॉलिसी के कागजों से नहीं, बल्कि संकट की घड़ी में निभाए गए भरोसे से तय होता है।






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