आक्रोश युवाओं का, सियासत किसकी ?
लखनऊ, अलवर, दिल्ली, झारखंड और अब पटना की घटनाएं बता रही हैं कि युवा अब सवाल पूछ रहा है। उससे भी आगे, स्कूलों के बच्चे भी अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए सड़क पर उतर रहे हैं। यह आक्रोश राजनीति का मुद्दा...

Gen Z से Gen Alpha
मधुलिका सिंह,
वरिष्ठ पत्रकार
Table Of Content
- Gen Z से Gen Alpha
- जब स्कूल की बेटियां सवाल पूछने लगीं
- Gen Alpha ने भी खोल दिया मोर्चा
- सरकार के पास अब जवाब भी होना चाहिए
- परीक्षा अब सिर्फ परीक्षा नहीं
- Gen Z से Gen Alpha तक, एक ही सवाल
- छात्रों के गुस्से को भुनाने की कोशिश
- झारखंड ने दिखाया दूसरा पहलू
- असली बेचैनी भरोसे की है
- सरकारों के लिए भी संदेश
- आगे क्या?
- तो क्या यह पीढ़ी राजनीति बदल देगी?
किसी देश की राजनीति में बदलाव हमेशा चुनाव के नतीजों से दिखाई दे, यह जरूरी नहीं है। कई बार बदलाव उससे पहले ही दस्तक देने लगता है। सड़कों पर बैठे युवाओं में, विश्वविद्यालयों में उठ रहे सवालों में, सोशल मीडिया पर चल रही बहसों में और उन छोटी-छोटी घटनाओं में, जिन्हें हम अक्सर स्थानीय मामला समझकर आगे बढ़ जाते हैं। आज भारत में ऐसी ही कुछ घटनाओं को ध्यान से देखने की जरूरत है। युवा अब केवल यह नहीं पूछ रहा कि अगली बार वोट किसे देना है। वह उससे पहले के सवाल पूछ रहा है कि परीक्षा ठीक से होगी या नहीं, भर्ती समय पर होगी या नहीं, मेहनत का परिणाम उसके हाथ में होगा या किसी और के फैसले में। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या व्यवस्था भरोसे लायक है?
लेकिन अगस्त 2026 की तस्वीर में एक नया और ज्यादा महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई दे रहा है। सवाल पूछने वाली पीढ़ी अब केवल Gen Z नहीं है। Gen Alpha, यानी वे बच्चे जो अभी मतदान की उम्र तक भी नहीं पहुंचे हैं, वे भी स्कूल, शिक्षक, सड़क, पानी, भोजन और बुनियादी सुविधाओं को लेकर आवाज उठाने लगे हैं। यही वह बिंदु है जहां यह कहानी केवल युवा आक्रोश की नहीं रह जाती। यह आने वाली पीढ़ी के नागरिक-बोध की कहानी बन जाती है।
जब स्कूल की बेटियां सवाल पूछने लगीं
लखनऊ की घटना को ही देखिए। 17 अगस्त 2026 को जयप्रकाश नारायण सर्वोदय विद्यालय की छात्राएं शिक्षकों की कमी और छात्रावास की व्यवस्थाओं को लेकर स्कूल से बाहर निकलीं और सड़क पर प्रदर्शन किया। उनकी शिकायत सीधी थी कि शिक्षक नहीं हैं तो पढ़ाई और परिणाम कैसे आएगा? अलवर में भी अगस्त 2026 में थानागाजी क्षेत्र के एक राजकीय विद्यालय की छात्राओं ने जर्जर भवन, शिक्षकों की कमी और सड़क की समस्या को लेकर आवाज उठाई। प्रशासन को हस्तक्षेप करना पड़ा। इन घटनाओं में एक गहरी समानता है। ये बच्चे राजनीति की भाषा में नहीं, अपने रोजमर्रा के अनुभव की भाषा में सवाल कर रहे हैं। उनके लिए विकास कोई चुनावी भाषण नहीं है। विकास का अर्थ है कि स्कूल की छत ठीक हो, शिक्षक हों, सड़क हो, पानी मिले और पढ़ाई हो। और अब यह सवाल केवल राजस्थान या उत्तरप्रदेश तक सीमित नहीं है।
Gen Alpha ने भी खोल दिया मोर्चा
अगस्त में उत्तरप्रदेश के महोबा में स्कूली बच्चों ने जलभराव और खराब सड़क के विरोध में झांसी-मिर्जापुर हाईवे तक जाम कर दिया। हमीरपुर में बच्चे कई किलोमीटर चलकर कलेक्ट्रेट पहुंचे और गांवों को जोड़ने वाली सड़क की मांग उठाई। उन्नाव में बच्चों ने शिक्षकों की कमी और स्कूल में मिलने वाले भोजन की गुणवत्ता को लेकर प्रदर्शन किया।
मध्यप्रदेश में तो Gen Alpha के विरोध प्रदर्शनों की एक श्रृंखला दिखाई दी। विदिशा के सिरोंज में छात्राएं बस किराया बढ़ाने के विरोध में सड़क पर उतरीं। उज्जैन में स्कूलों से जुड़े फैसलों को लेकर बच्चों ने प्रशासन के सामने अपनी बात रखी। इन प्रदर्शनों की खास बात यह थी कि इनके पीछे पारंपरिक छात्र संगठन या राजनीतिक दल नहीं थे। स्कूल के बच्चे खुद सामने आए।
महाराष्ट्र के धाराशिव में कक्षा दस के विद्यार्थियों ने वर्षों से खाली पड़े शिक्षकों के पदों को लेकर प्रशासनिक कार्यालय के बाहर धरना दिया। नासिक में बच्चों ने खराब सड़कों की स्थिति पर अपनी तरह से रिपोर्ट तैयार कर सवाल उठाया। राजस्थान में भी स्कूली बच्चों और छात्राओं की आवाज बुनियादी सुविधाओं को लेकर सामने आई। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार उत्तरप्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में Gen Alpha से जुड़े ऐसे प्रदर्शन सामने आए हैं। यह सिर्फ इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि बच्चे सड़क पर उतर आए। महत्वपूर्ण यह है कि उन्होंने अपने अधिकार और अपनी जरूरत के बीच संबंध समझना शुरू कर दिया है।
सरकार के पास अब जवाब भी होना चाहिए
उत्तरप्रदेश की एक ताजा घोषणा इस बदलती तस्वीर का दूसरा पहलू दिखाती है। राज्य सरकार ने 3,126 परिषदीय प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों के पुनर्निर्माण और मरम्मत के लिए कुल 604 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। इनमें 2,243 प्राथमिक विद्यालयों के लिए 344.52 करोड़ और 883 उच्च प्राथमिक विद्यालयों के लिए 259.95 करोड़ रुपये निर्धारित हैं। बेसिक शिक्षा विभाग ने पहली किश्त के रूप में 302 करोड़ रुपये जारी भी कर दिए हैं। इसे केवल सरकारी उपलब्धि के रूप में देखना अधूरा होगा। इसे बच्चों की शिकायतों के संदर्भ में भी देखना चाहिए।
क्योंकि लोकतंत्र की असली परीक्षा यही है कि किसी बच्चे को स्कूल की छत, शिक्षक, सड़क या भोजन के लिए सड़क पर क्यों उतरना पड़ा? और अगर वह उतरता है तो प्रशासन कितनी जल्दी उसकी बात सुनता है? सरकारें योजनाएं बनाती हैं, बजट आवंटित करती हैं और परियोजनाएं घोषित करती हैं। लेकिन नागरिक उन योजनाओं का परिणाम अपने अनुभव से मापता है। Gen Alpha शायद इसी अनुभव से राजनीति को समझना शुरू कर रहा है।
परीक्षा अब सिर्फ परीक्षा नहीं
Gen Z के लिए प्रतियोगी परीक्षा केवल दो-तीन घंटे का प्रश्नपत्र नहीं है। उसके पीछे कई साल की मेहनत, परिवार की उम्मीद, कोचिंग का खर्च और अक्सर घर से दूर किसी शहर में रहना जुड़ा होता है। इसलिए जब परीक्षा में गड़बड़ी, पेपर लीक या भर्ती में अनियमितता की बात सामने आती है तो युवा इसे केवल प्रशासनिक समस्या नहीं, अपने साथ हुए धोखे की तरह देखता है।
पटना में अगस्त 2026 का छात्र आंदोलन इसका ताजा उदाहरण है। शिक्षक भर्ती परीक्षा TRE-4 के विज्ञापन में देरी, प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता और भर्ती प्रक्रिया से जुड़े सवालों को लेकर छात्रों ने गर्दनीबाग में आंदोलन तेज किया। छात्रों ने एकल परीक्षा प्रणाली और नेगेटिव मार्किंग समाप्त करने जैसी मांगें भी उठाईं। इससे पहले NEET से जुड़े विवाद और पुलिस कार्रवाई के खिलाफ भी पटना में छात्रों ने प्रदर्शन किया था। अगस्त की शुरुआत में सैकड़ों छात्रों और युवा कार्यकर्ताओं ने मुख्यमंत्री आवास की ओर मार्च किया, जिसे पुलिस ने पानी की बौछारों से रोक दिया।
19 अगस्त को छात्र और युवा मुद्दों को लेकर आरजेडी के मार्च के दौरान तेजस्वी यादव सहित नेताओं को हिरासत में लिया गया। 22 अगस्त को तेजस्वी यादव ने फिर छात्र आंदोलन का समर्थन करते हुए पेपर लीक रोकने, समय पर परीक्षाएं कराने, रोजगार बढ़ाने और पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया की मांग की। यहां एक बात साफ है कि पटना का आक्रोश केवल परीक्षा का नहीं है। यह उस पीढ़ी की बेचैनी है जिसे लगता है कि उसकी मेहनत और व्यवस्था के बीच भरोसे की कड़ी कमजोर हो रही है।
Gen Z से Gen Alpha तक, एक ही सवाल
यहीं पर Gen Z और Gen Alpha की आवाजें एक-दूसरे से जुड़ती हैं। एक तरफ पटना का युवा पूछ रहा है कि भर्ती कब होगी, परीक्षा निष्पक्ष होगी या नहीं? दूसरी तरफ महोबा का बच्चा पूछ रहा है कि स्कूल जाने की सड़क कब बनेगी?
मध्यप्रदेश की छात्रा पूछ रही है—स्कूल बस का किराया इतना क्यों बढ़ा? महाराष्ट्र का विद्यार्थी पूछ रहा है कि शिक्षक कब आएंगे? राजस्थान की छात्राएं पूछ रही हैं कि जर्जर स्कूल भवन में पढ़ाई कैसे होगी? लखनऊ की छात्राएं पूछ रही हैं कि शिक्षक और छात्रावास की व्यवस्था कब सुधरेगी? उम्र अलग है। सवालों का स्तर अलग है। लेकिन मूल चिंता एक है कि व्यवस्था मेरे भविष्य को कितनी गंभीरता से लेती है? यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा संकेत है।
छात्रों के गुस्से को भुनाने की कोशिश
जब युवा सड़क पर आता है तो राजनीति उससे दूर नहीं रह सकती। पटना में विपक्षी दल छात्र आंदोलन के समर्थन में सामने आए। महाराष्ट्र में Gen Z प्रदर्शनों के बाद राजनीतिक दलों के युवा संगठनों ने कॉलेज परिसरों में अपनी सक्रियता बढ़ाई और सदस्यता अभियान तेज किए। यही राजनीति का स्वाभाविक चरित्र है। जहां असंतोष होगा, वहां राजनीतिक दल अपनी जगह बनाने की कोशिश करेंगे। लेकिन यहां युवाओं को सबसे ज्यादा सावधान रहने की जरूरत है।
आंदोलन वास्तविक हो सकता है और राजनीति उसके आसपास हो सकती है। दोनों बातें एक साथ सच हो सकती हैं। इसलिए किसी नेता ने समर्थन किया है तो उसका स्वागत कीजिए, लेकिन अपनी आवाज उसके हवाले मत कीजिए। किसी दल ने रोजगार का वादा किया है तो पूछिए कि कितने रोजगार, कब और कैसे? किसी सरकार ने स्कूलों के लिए 604 करोड़ रुपये दिए हैं तो अगला सवाल होना चाहिए कि कितने स्कूलों का काम पूरा हुआ, गुणवत्ता कैसी रही और बच्चों को इसका लाभ कब मिलेगा? यही सवाल लोकतंत्र को नारे से नीति की तरफ ले जाता है।
झारखंड ने दिखाया दूसरा पहलू
झारखंड का आंदोलन इस कहानी का दूसरा पहलू बताता है। भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर छात्रों का आंदोलन चला। सरकार ने कुछ भर्ती परीक्षाओं और प्रक्रियाओं को रद्द करने तथा मामलों की जांच कराने के फैसले किए। लेकिन इसके बाद उन अभ्यर्थियों की चिंता भी सामने आई जिन्होंने ईमानदारी से परीक्षा पास की थी। अगर पूरी प्रक्रिया रद्द होती है तो उनकी मेहनत का क्या होगा?
20 अगस्त को झारखंड हाईकोर्ट ने 11वीं से 13वीं जेपीएससी परीक्षा और उससे जुड़े नियुक्ति आदेशों को रद्द करने के सरकारी फैसले पर रोक लगा दी। इससे चयनित अभ्यर्थियों को राहत मिली। यहां आंदोलन की मांग और निर्दोष अभ्यर्थियों के अधिकार, दोनों सामने आते हैं। यही लोकतंत्र की जटिलता है। सड़क सवाल पूछती है, सरकार फैसला करती है और अंततः न्यायपालिका यह देखती है कि फैसला न्यायपूर्ण है या नहीं।
असली बेचैनी भरोसे की है
इन घटनाओं को थोड़ा पीछे हटकर देखें तो तस्वीर साफ होती है। युवा केवल नौकरी नहीं, निष्पक्ष अवसर मांग रहा है। Gen Alpha केवल बेहतर स्कूल नहीं, यह भरोसा मांग रहा है कि उसकी समस्या छोटी समझकर टाल नहीं दी जाएगी। युवा बेरोजगारी से परेशान है। बच्चा खराब सड़क से परेशान है। छात्र शिक्षक की कमी से परेशान है। अभ्यर्थी परीक्षा की अनिश्चितता से परेशान है। इन सभी परेशानियों के बीच एक शब्द बार-बार सामने आता है, भरोसा। जब बार-बार परीक्षा टलती है, भर्ती अटकती है, शिक्षक नहीं आते या स्कूल की बुनियादी सुविधा के लिए बच्चे सड़क पर उतरते हैं, तब समस्या केवल सुविधा की नहीं रहती। व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल उठता है।
सोशल मीडिया ने इस बदलाव को और तेज कर दिया है। पहले किसी विद्यार्थी को अपनी बात बड़े मंच तक पहुंचाने के लिए संगठन या अखबार चाहिए होता था। आज उसके हाथ में मोबाइल है। कुछ घंटों में स्थानीय समस्या राष्ट्रीय मुद्दा बन सकती है। यह ताकत है, लेकिन जिम्मेदारी भी है। क्योंकि सोशल मीडिया पर सच जितनी तेजी से फैलता है, गलत सूचना भी उतनी ही तेजी से फैलती है। इसलिए हर वायरल पोस्ट से पहले सवाल होना चाहिए कि स्रोत क्या है? प्रमाण क्या है? और फायदा किसे हो रहा है?
सरकारों के लिए भी संदेश
सरकारों को भी इस बदलती मनःस्थिति को समझना होगा। हर आंदोलन को साजिश बताकर खारिज करना आसान है। लेकिन शिकायत सही है तो फर्क नहीं पड़ता कि उसे पहले किसने उठाया।अगर गड़बड़ी हुई है तो जवाब देना होगा। अगर आरोप गलत हैं तो प्रमाण के साथ खंडन करना होगा। और आंदोलनकारियों को भी समझना होगा कि हर फैसला गलत नीयत से नहीं होता। आंदोलन की ताकत केवल सड़क पर नहीं, संवाद में भी होती है। विशेष रूप से Gen Alpha के मामले में सरकारों और प्रशासन को अलग संवेदनशीलता की जरूरत है। जो बच्चे अभी वोट भी नहीं दे सकते, यदि वे स्कूल की बुनियादी सुविधाओं के लिए सड़क पर उतर रहे हैं तो यह प्रशासन के लिए चेतावनी भी है और अवसर भी। उन्हें केवल शांत कराने की नहीं, सुनने की जरूरत है।
आगे क्या?
युवा राजनीति से दूर नहीं रह सकता। शिक्षा, रोजगार, भर्ती, महंगाई और सार्वजनिक सुविधाओं से जुड़े फैसले राजनीति में ही तय होते हैं। इसलिए राजनीति से दूरी समाधान नहीं है। लेकिन राजनीतिक दलों से अपनी स्वतंत्रता बचाए रखना जरूरी है। किसी दल को वोट दीजिए। किसी नेता को पसंद कीजिए। लेकिन सवाल भी पूछिए।अगर युवा अपने पसंदीदा नेता से सवाल नहीं करता और केवल दूसरे दल से सवाल करता है तो वह नागरिक से समर्थक बन जाता है। लोकतंत्र को समर्थक नहीं, जागरूक नागरिक चाहिए।
Gen Z और Gen Alpha के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है। भीड़ जुटाना आसान है। जिम्मेदार नागरिक बनना कठिन। नारे लगाना आसान है। तथ्यों को समझना कठिन।किसी नेता के पीछे चलना आसान है। अपने विवेक के साथ खड़ा रहना कठिन।लेकिन लोकतंत्र की असली ताकत इसी कठिन रास्ते में है।
तो क्या यह पीढ़ी राजनीति बदल देगी?
शायद। लेकिन केवल इसलिए नहीं कि वह युवा है या उसके हाथ में सोशल मीडिया है।बदलाव तब आएगा जब वह राजनीतिक दलों से सवाल पूछने के साथ अपने विवेक की रक्षा करेगी। जब रोजगार का वादा करने वाले से पूछा जाएगा कि कितने और कब? जब सरकार स्कूल सुधारने के लिए 604 करोड़ रुपये देगी तो पूछा जाएगा कि काम जमीन पर कब दिखाई देगा? जब किसी परीक्षा की निष्पक्षता पर सवाल उठेगा तो पूछा जाएगा कि जवाबदेही किसकी है? और सबसे महत्वपूर्ण—जब सत्ता में कोई भी आए, उससे वही सवाल पूछे जाएंगे जो आज पूछे जा रहे हैं। लखनऊ की छात्राओं से लेकर अलवर की बेटियों तक, पटना के प्रतियोगी अभ्यर्थियों से लेकर झारखंड के नौकरी चाहने वालों तक और मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र तथा उत्तरप्रदेश के स्कूलों से सड़क पर उतरे Gen Alpha बच्चों तक—इन आवाजों में एक बात समान है।
युवा अब सवाल पूछ रहा है।यह लोकतंत्र के लिए अच्छी खबर है। लेकिन अगली परीक्षा युवाओं की है कि क्या वे अपने सवालों को नीति में बदल पाएंगे? क्या वे राजनीतिक समर्थन और राजनीतिक नियंत्रण के बीच फर्क कर पाएंगे? क्या वे किसी दल का समर्थन करते हुए भी उससे सवाल पूछ सकेंगे?अगर इसका जवाब हां है तो यह पीढ़ी केवल राजनीति का खेल नहीं बदलेगी, वह उसके नियम बदलने की शुरुआत करेगी। लोकतंत्र में सबसे शक्तिशाली युवा वह नहीं जो सबसे ज्यादा शोर करता है। सबसे शक्तिशाली वह है जो सवाल पूछता है, तथ्य जांचता है और किसी के कहने पर अपनी राय बदलने से पहले सोचता है।
आक्रोश युवाओं का है। भविष्य युवाओं का है। अब राजनीति का एजेंडा भी युवाओं के सवालों से तय होना चाहिए। तभी Gen Z से Gen Alpha तक की यह बेचैनी केवल विरोध की आवाज नहीं रहेगी, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के अगले अध्याय की शुरुआत बनेगी।






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