आधुनिकता में खो गई पारम्परिक दीपावली
शायद हमें परंपरा को वैसे ही जीवित रखने की जरूरत नहीं, जैसे वह पचास साल पहले थी। जरूरत है उसकी आत्मा को बचाने की- साझा भोजन, साझा पूजा, साझा रोशनी और साझा मुस्कान...

तब घर केवल सजता नहीं था, वह जागता था
हर साल जब दिवाली आती है तो आंखों में बचपन की वो यादें तैरने लगती है, जिनसे शायद हमारे बाद की पीढ़ी का काम ही नहीं पड़ा। न तो इस पीढ़ी ने वो परम्पराएं देखी हैं और न ही वो उल्लास महसूस किया है, जो हमारे दौर में चेहरे पर साफ नजर आता था। पारम्परिक व्यंजनों के नाम सुनते ही आज की पीढ़ी कहती है, ये क्या होता है।
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खैर, कोशिश करता हूं आपको नोस्टालजिक दौर में ले जाने की। दीपावली की उल्लास वैसे तो दशहरा के तुरंत बाद दिखने लगता था। घरों में साफ-सफाई और लिपाई-पुताई में घर-परिवार के सभी लोगों की मेहनत लगती थी। आज की तरह कोई काम ठेके पर देने की परम्परा नहीं थी। आंखें बंद करते ही वही पुराना आंगन सामने आ जाता है। गोबर से लीपा हुआ नम और माटी की महक बिखेरता आंगन। उस पर गेरू और खड़िया के मांडणे। मुख्य द्वार से कोठार तक लक्ष्मी जी के पगलिए। दीवारों पर नील मिले चूने की सफेदी और कंवळों पर टिमटिमाते दीपक। यह आज भी मेरे बचपन की सबसे सुंदर तस्वीर है।
तब घर केवल सजता नहीं था, वह जागता था। दीपावली से कई दिन पहले ही घर में खास तरह का उल्लास फैलने लगता था। पिताजी बाजार से पूजन सामग्री के साथ मिट्टी के दीए, बाती और अन्य सामान लाते। मां और परिवार की अन्य महिलाएं परिवार के पुरुष सदस्यों के साथ कळी-चूने से पुताई करती। गोबर और बालू मिट्टी के गारे से फर्श लीपतीं और आपस में बातें करती हुए पारम्परिक लोक गीत गुनगुनाती। गेरूआ रंग से मांडणे मांडती। हम बच्चे इधर-उधर दौड़ते। कभी रंग में हाथ गंदा कर देते। कभी मांडणों पर पैर रखने के लिए डांट खाते।
मुख्य द्वार की दीवार जिसे कंवळा कहा जाता था, वहां चित्रकारी होती। मुख्य दरवाजे के दोनों ओर स्वास्तिक बनाया जाता। शुभ-लाभ जैसे बीजाक्षर उकेरे जाते। सबसे अलहदा होते थे लक्ष्मी जी के पदचिह्न, जिन्हें पगलिया कहा जाता था। मुख्य द्वार से कोठार तक छोटे-छोटे पदचिह्न बनाए जाते थे, मानो मां लक्ष्मी के कदमों का इंतजार हो। बचपन में मैं सोचता था कि लक्ष्मी जी सच में उन पगलियों पर चलकर घर में आएंगी।
अब न तो कच्चे फर्श हैं और न ही वे दीवारें, जिन्हें चित्रों से सजाया जा सके। मांडणे आज भी बनते हैं, लेकिन बने बनाए चित्र लाकर चिपका दिए जाते हैं। पगलियों के रूप में प्लास्टिक के स्टीकर आ गए हैं। त्योंहार की सामूहिकता बाजार ने छीन ली है। सजावट भी आर्टिफिशियस फूलों से होने लगी है। त्योहार का उल्लास जैसे बंद कमरों और सीमित परिवार में कहीं खो गया है।
न वे व्यंजन, न वह मिठास
दीपावली के दो दिन पहले ही रसोई महकने लगती थी। मिठाई बाजार से लाने की परम्परा नहीं थी। मेहमानों को भी घर में बने व्यंजन ही परोसे जाते थे और ये व्यंजन लगभग हर घर में कॉमन ही होते थे, लेकिन हर घर में सामूहिक तैयारी नजर आती थी। मां आटे या बेसन की चक्की बनाने के लिए घी में सिकाई कर रही है। पास बैठी ताई या चाची चाशनी बना रही है। कोई सांकली, पापड़ी, खाजे बेल रहा है और कोई इन्हें तल रहा है। तलते हुए पापड़-खिचियों व गाळ की सेवों की चटचटाहट पूरे आंगन में गूंजती रहती थी। मुझे अब भी वह दृश्य याद है…चूल्हे के पास बैठी मां, चेहरे पर पसीना, हाथों में आटा और आंखों में वह खुशी, जो किसी बाजार से खरीदी गई चीज में कभी नहीं होती। हमें जब आटे की चक्की और अन्य मिष्ठान खाने को मिलते तो लगता था कि ये त्योंहार रोज-रोज क्यों नहीं आते। आज तो दुकानों पर हजारों किस्म की मिठाइयां मिल जाती हैं। सुंदर डिब्बे, चमकदार रैपिंग, विदेशी नाम, सब कुछ है, लेकिन वह स्वाद नहीं मिलता। मिठास में कमी नहीं हुई। कमी है उस मेहनत, साझेदारी और इंतजार की, जब पूरा परिवार एक ही चूल्हे के इर्द-गिर्द बैठता था।
पूजा भी तो बदल गई
दीपावली की शाम होते ही घर की सभी महिलाएं सज-धजकर तैयार हो जाती। थाली में दीपक सजाए जाते। कतारे में सजाए जाते और देखते ही देखते सारा घर दीयों की रोशनी से जगमग हो उठता था। बाहर पटाखों की गूंज और आसमां में बिखरती रंगीनियां अहसास करवाती थी कि आज दिवाली है। दीप जलाने के बाद पूजा होती तो पूरा परिवार एक साथ बैठा नजर आता। दादाजी सबसे पहले लक्ष्मी पूजन करवाते। प्रसाद में कील-बताशे, चपड़ा, शक्कर के बने महल-माळिया, लक्ष्मी जी के कंगन, अलग-अलग पशु-पक्षियों की बनी आकृतियां और शक्कर के मोतियों से बनी माला के साथ ऋतु फल और लड्डू चढ़ाए जाते। लक्ष्मीजी की आरती सभी लोग बारी-बारी से करते। इसके बाद दीवार पर कुंकुम से माताजी की त्रिशूलाकार आकृति, सूर्य-चंद्रमा व स्वास्तिक बनाए जाते। गुड़ के हलवा का भोग लगाकर गोटा यानी सूखा नारियल चढ़ाया जाता।
हठड़ी पूजन की लुप्त होती परम्परा
लक्ष्मी पूजन के साथ घरों में हठड़ी पूजन होता था। हठड़ी मिट्टी से बना चार मुंहा पात्र होता है। इसमें कील-बताशे, चने-फूलियां और मिठाई आदि डालकर पारम्परिक रूप से बनने वाली खाजलिया-सांकलियां व्यंजन से ढका जाता है। परिवार में जितने सदस्य होते हैं, उनके नाम की हठड़ी होती है। घर में नई बहू या नए बच्चे के जन्म के साथ ही इसमें नई हथड़ी जुड़ती जाती है। पूजा के वक्त हठड़ियां गिनी जाती थी, जैसे परिवार की गिनती की जा रही हो। उस दिन लगता था कि परिवार केवल लोगों से नहीं, उनके नामों से भी बनता है। हठड़ी पूजन केवल अनुष्ठान नहीं था; वह परिवार का विस्तार, उसकी पहचान और उसकी एकता का प्रतीक था। अब घरों में लोग कम रहते हैं। जो रहते भी हैं, वे अक्सर अलग-अलग शहरों में बिखर जाते हैं। हठड़ी पूजन कई घरों में अब एक याद भर रह गया है। कभी-कभी लगता है कि हमने तकनीक बढ़ा ली, पर परिवार की गिनती छोटी कर दी।
परिवार की रौनक दिखती थी
पूजा के बाद सभी लोग बुजुर्गों का आशीर्वाद लेते और साथ में मिलती थी खर्ची। बाद में परिवार के सभी लोग एक साथ बैठकर भोजन करते। इसकी भी जोधपुर में तो सभी घरों में एक ही तरह की डिश होती थी। रतालू, गोभी, आलू की सब्जी, गुड़ का हलवा, तेहरी (पुलाव) और पूरियां। परिवार के सभी सदस्य एक ही थाली में खाना खाते थे। बड़ा सा घेरा और फिर हंसी-विनोद, माहौल भी कुछ अलग लगता था। आज पारम्परिक सब्जी की जगह पनीर और शाही सब्जियों ने ले ली है। सभी डाइनिंग टेबल पर अलग-अलग प्लेट में खाना खाते हैं और हाथ में मोबाइल चलता रहता है, जैसे पास बैठे किसी से कोई मतलब ही नहीं हो। खैर, अब संयुक्त परिवार ही कहां बचे हैं, जहां परिवार की रौनक नजर आए।
खो गई बाजारों की रौनक
लक्ष्मी पूजन के बाद परिवार के सभी लोग रोशनी देखने निकलते थे। अंदरूनी शहर के बाजार और मुख्य सड़कों पर आकर्षक रोशनी व सजावट देखने वालों की भीड़ आधी रात बाद भी कम नहीं होती थी। दुकान पर पूजन करने के बाद व्यापारी भी रोशनी देखने वाले परिचितों का अभिवादन करते और रुकने पर सूखे मेवे या सुपारी-इलायची से मनुहार करते। किसी दुकान पर रुकते… किसी से दीवाली की बधाई लेते, किसी को बधाई देते। मुख्य रौनक सोजती गेट और नई सड़क पर नजर आती थी। दूर-दूर तक पैदल घूमने के बाद घर लौटने में घंटे लग जाते थे, लेकिन उस वक्त थकान नहीं, एक संतुष्टि होती थी। बाजार आज भी सजते हैं। दीपावली पर सजावट व रोशनी की तैयारियां होती हैं, लेकिन भीड़ और वह ठहराव नहीं रहा। लोग जल्दी लौट जाते हैं। फोन की स्क्रीन चमकती है। चेहरों से बातचीत कम हो गई है। रोशनी अब भी है, पर वह रोशनी नहीं जो आंखों से निकलकर दिल तक पहुंचती थी।
व्हाट्सएप की शुभकामनाएं
दिवाली के अगले दिन रामा-स्यामा के दिन पहले लोग घर-घर जाते थे। रिश्तेदारों से मिलना, पड़ोसियों को शुभकामनाएं देना और मिठाई व उपहारों का आदान-प्रदान त्योहार की असली परंपरा थी। अब वही काम एक संदेश से हो जाता है। सुबह फोन खोलता हूं तो दर्जनों शुभकामनाएं मिलती हैं। सुंदर चित्र, चमकते दीप, सुनहरे शब्द-सब कुछ है, लेकिन चेहरा किसी का दिखता नहीं। आवाज किसी की सुनाई नहीं देती। जो रिश्ता पैदल मिलने से बनता था, वह फॉरवर्ड किए गए संदेश से नहीं बनता।
समय बदला, हम बदले
मैं इसे किसी का दोष नहीं मानता। समय बदला है, जिंदगी व्यस्त हो गई है। फिर भी यह सच है कि जो गर्मजोशी हाथ मिलाने से आती थी, वह इमोजी से नहीं आती। फिर भी मैं निराश नहीं हूं। भले ही बहीखाते कम्प्यूटर पर लिखे जाने लगे हैं, लेकिन आज भी दीपावली पर बही-खातों की पूजा होती है। नई बही पर ‘श्री’ लिखा जाता हैं और व्यापारी नए वर्ष की शुरुआत करते हैं। शायद हमें परंपरा को वैसे ही जीवित रखने की जरूरत नहीं, जैसे वह पचास साल पहले थी। जरूरत है उसकी आत्मा को बचाने की—साझा भोजन, साझा पूजा, साझा रोशनी और साझा मुस्कान की। दीप तो आज भी जलते हैं, बस उन्हें फिर से खिड़कियों से बाहर, लोगों तक ले जाने की जरूरत है। क्योंकि दीपावली की असली रोशनी दीयों में नहीं थी। वह उस घर में थी, जहां हर सदस्य के नाम की हठड़ी थी, हर दरवाजे पर पगलियां थीं, और हर गली में किसी अपने से मिलने की उम्मीद थी।
आज भी जब दीपावली आती है, तो मैं खिड़की से बाहर देखता हूं। कहीं दूर दीये जलते दिखते हैं। और मन में एक ही सवाल उठता है कि क्या वे दीये अब भी वही कहानी कह रहे हैं, जो कभी हमारे घर कहते थे?






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