एक दीप भीतर भी
इस दिवाली खुद से पूछें कि बीते साल अपनों को कितना समय दिया? किसका दिल दुखाया, जाने में या अनजाने में? किसकी मदद कर सकते थे, पर टाल...

अपनी बात
घर चमक रहा है, बाजार चमक रहा है। बस मन का कोना हर बार अछूता रह जाता है।
हर साल दिवाली से पहले हमारे घरों में एक अघोषित अभियान चलता है। जाले उतरते हैं, पुराना सामान बाहर आता है, दीवारें नए रंग में नहाती हैं। नजर इस पर भी रहती है कि पड़ोसी की झालर कहीं हमारी झालर से लंबी तो नहीं। घर चमकता है, बाजार चमकता है। बस एक कोना हर बार अछूता रह जाता है, मन का कोना।
पिछली बार आपने दिवाली से पहले किसी पुराने झगड़े की सफाई कब की थी? जवाब शायद असुविधाजनक होगा।
हम स्टोर रूम की धूल तो झाड़ लेते हैं, पर बरसों पुरानी नाराजगी को संदूक में सहेजकर रखते हैं, जैसे वह कोई पुश्तैनी गहना हो।
पहले फोन की प्रतीक्षा
असल दिक्कत यह है कि मन की सफाई में कोई ठेकेदार नहीं मिलता। घर की पुताई कोई और कर देता है, यह काम खुद करना पड़ता है। और इसकी शुरुआत वहीं से होती है, जहां सबसे ज्यादा तकलीफ होती है। अपनी गलती मानने से। हम दूसरों की चूक पर फौरन फैसला सुना देते हैं, पर अपनी बारी आने पर अचानक वकील बन जाते हैं।
मतभेद होता है तो इंतजार करते हैं कि पहला फोन सामने वाला करे। वह भी यही इंतजार करता है। नतीजा यह कि दो लोग बरसों एक-दूसरे की प्रतीक्षा में बिता देते हैं, और रिश्ता बीच में पड़ा सूखता रहता है।
“माफी मांगना सबसे महंगा सौदा है, क्योंकि इसमें अहंकार चुकाना पड़ता है।”
माफी मांगना कमजोरी नहीं है। जो इसे चुका देता है, वह अक्सर फायदे में रहता है।
खर्च की होड़, खुशी की कीमत
दिवाली धीरे-धीरे खर्च की प्रतियोगिता बनती जा रही है। महंगे तोहफे, भारी सजावट, और सोशल मीडिया पर दिखाई जाने वाली रोशनी। जिस दौर में रसोई का बजट हर महीने नई परीक्षा लेता है, उसमें त्योहार की खुशी को बिल की रकम से नापना न सिर्फ गलत है, बल्कि अन्यायपूर्ण भी। जो परिवार इस दौड़ में पीछे रह जाता है, उसे बेवजह यह एहसास कराया जाता है कि उसकी दिवाली अधूरी रह गई।
सच यह है कि किसी रूठे को मना लेना, बुजुर्ग माता-पिता के पास दो घंटे बैठ जाना या बच्चों के साथ जमीन पर बैठकर दीये सजाना, इन पर कोई जीएसटी नहीं लगता, और खुशी इन्हीं से बनती है।
“किसी रूठे को मना लेने पर कोई जीएसटी नहीं लगता।”
यहां एक सुविधाजनक तर्क दिया जाता है कि खर्च करना तो अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा है। बात ठीक है, पर शर्त यह है कि पैसा कहां जा रहा है। जब आप अपने शहर के कुम्हार से दीये, मोहल्ले के दुकानदार से मिठाई और स्थानीय कारीगर से सजावट खरीदते हैं, तो आपकी दिवाली किसी और के घर का चूल्हा भी जलाती है। यही त्योहार का असली अर्थशास्त्र है, जो किसी बजट भाषण में नहीं मिलेगा।
धुएं का हिसाब
और पटाखे? हर साल बहस वही होती है, और हर साल धुआं भी वही होता है। हम पर्यावरण पर चिंता सार्वजनिक रूप से जताते हैं और छत पर चुपचाप अनार जलाते हैं। पर जरा सोचिए। जिस धुएं से किसी बुजुर्ग की सांस फूलती है, किसी बीमार की रात बेचैन होती है और किसी नन्हे बच्चे की खांसी बढ़ती है, वह आपकी खुशी की कीमत नहीं हो सकती। रोशनी का त्योहार अगर किसी की सांस पर भारी पड़े, तो कहीं न कहीं हमने मतलब ही उलट दिया है।
“खुशी के नाम पर किसी की सांस छीनना, उत्सव नहीं, संवेदनहीनता है।”
दिवाली अच्छाई की जीत का पर्व है। लेकिन अच्छाई की जीत किसी और की हार से नहीं होती। वह तब होती है जब हम अपने भीतर के क्रोध की जगह धैर्य, नफरत की जगह प्रेम और अहंकार की जगह विनम्रता को चुनते हैं। यह आसान नहीं है। पर क्या कभी कोई जरूरी चीज आसान रही है?
तो इस बार एक छोटा-सा हिसाब कीजिए, किसी बही-खाते में नहीं, अपने भीतर। ये सवाल न रंगीन हैं, न सजे-धजे, पर इन्हीं में असली सफाई छिपी है।
दीवारों का रंग अगले साल फिर फीका पड़ जाएगा, दीये भी बुझ जाएंगे। पर एक टूटा रिश्ता अगर जुड़ गया, तो उसकी रोशनी बहुत देर तक टिकेगी। घर में दीप जरूर जलाइए, पर एक दीप भीतर भी रखिए। क्योंकि घर तो सब सजा लेते हैं, उजाला वही है जो मन तक पहुंचे।






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